वो 6 कारण जिनसे उत्तर कोरिया बना 'अछूत'

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दशकों से उत्तर कोरियाई समाज दुनिया का सबसे कटा हुआ और रहस्यमय समाज रहा है.
लोग इसे 'हर्मिट रेन' या अलग-थलग रहने वाला शासनकाल कहते हैं और इसके नेताओं को 'नासमझ' बताते रहे हैं.
जबकि उत्तर कोरिया का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय, दुनिया के लिए आज सबसे बड़ा ख़तरा है.
परमाणु शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा, नागरिकों पर होने वाले दमन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के कारण इसे 'अछूत राज्य' के रूप में देखा जाता रहा है.
सच्चाई ये है कि उत्तर कोरिया और इसके नेता यानी किम वंश पर अमरीका समेत बाकी दुनिया की किसी भी धमकी का असर नहीं हुआ है.
आइए जानते हैं वो कारण जिनके चलते क़रीब ढाई करोड़ की आबादी वाला ये देश 'अछूत' बन गया.

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1. डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ कोरिया का उदय
1905 से ही कोरियाई प्रायद्वीप पर नियंत्रण रखने वाले जापान के द्वितीय विश्वयुद्ध में हारने के बाद अमरीका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच इस बात पर समझौता हुआ कि यहां दोनों देशों का कब्ज़ा होना चाहिए.
प्योंगयांग में ब्रिटेन के पहले राजदूत और वर्तमान विदेश सचिव जेम्स होएर के अनुसार, "प्रायद्वीप को बांटने के लिए अमरीका ने नक्शे पर एक रेखा खींची और यहीं से दो देशों का जन्म हुआ."
तय हुआ कि उत्तरी हिस्से पर सोवियत संघ और दक्षिणी हिस्से पर अमरीका का कब्जा होगा.
इस तरह से किम-2 सुंग के नेतृत्व में डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ कोरिया की कम्युनिस्ट सरकार अस्तित्व में आयी.
लेकिन अमरीका और सोवियत संघ में बढ़ते तनाव के बीच उत्तर और दक्षिण कोरिया में युद्ध हो गया और दोनों देशों में तनाव चरम पर पहुंच गया.

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2- उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच तनाव
उस समय अमरीका ने उत्तर कोरिया के लगभग पूरे आसमान पर क़ब्ज़ा कर लिया और भारी बमबारी की जिसमें देश को काफी नुकसान उठाना पड़ा और बहुत ज़्यादा जानें गईं.
आज भी यहां बच्चों को इस तबाही के बारे में पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है.
दोनों देशों के बीच युद्ध को उस समय की दो महाशक्तियों के बीच के 'प्रॉक्सी वॉर' का उदाहरण माना गया.
हालांकि दोनों देशों के एकीकरण की बातें चलती रहीं लेकिन कोई नतीज़ा नहीं निकला.
उसके बाद से दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी तनाव की स्थिति बनी रही.
कोलंबिया विश्वविद्यालय के कोरिया रिसर्च सेंटर से जुड़े चार्ल्स आर्मस्ट्रांग कहते हैं कि उत्तर कोरियाई समाज एक स्थाई रूप से युद्ध की मानसिकता वाला है.

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3- युद्ध के बाद उत्तर कोरिया कैसे बचा रहा?
1970 के दशक तक उसे चीन, सोवियत संघ और पूर्वी यूरोपीय देशों से काफ़ी आर्थिक मदद मिलती रही.
जापानी शासन के दौरान यहां औद्योगिक विकास काफी हुआ था. इसके अलावा दक्षिण के मुकाबले इसे ज्यादा धनी इलाका माना जाता था.
क्षेत्रीय तनाव के कारण कोरिया गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सक्रिय सदस्य था.
1960 के दशक के अंतिम में उत्तर कोरिया की जीडीपी दक्षिण कोरिया से ज़्यादा थी. 1970 के दशक में यह अंतर समाप्त हो गया.

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4- यहां अलग थलग होने के क्या मायने हैं?
जेम्स होएरे कहते हैं, "सोवियत संघ का विघटन हो गया और रूस ने कह दिया कि दोस्तों के लिए क़ीमत अदा करने का समय जा चुका है."
दूसरी ओर चीन राज्य समर्थित पूंजीवाद की ओर बढ़ गया और उसने भी उत्तर कोरिया से भी माफी मांग ली.
किम-2 सुंग की सरकार के समय से ही यहां की तीन बुनियादी नीति थी- राजनीतिक आज़ादी, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सैन्य स्वायत्तता.

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5- क्या परमाणु शक्ति बनने की महत्वकांक्षा है अंतरराष्ट्रीय नाराज़गी का कारण?
नब्बे के दशक में उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के संकेत मिलने लगे थे, जिसने दुनिया के कान खड़े किए.
उस समय प्योंगयांग ने एनपीटी (परमाणु अप्रसार) समझौते से खुद को अलग करके घोषणा कि उसके पास परमाणु हथियार हैं.
2002 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने उत्तर कोरिया को 'बुराइयों की धुरी' वाले देशों में शुमार किया.
हालांकि राजनीतिक और आर्थिक रियायतों के एवज में परमाणु कार्यक्रम त्यागने के लिए उसे काफी मनाया गया लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.
देश में बहुत सारे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगे और देश की अर्थव्यवस्था के लिए अहम कोयला निर्यात पर भी पाबंदी लगाई गयी.
हालांकि जेम्स होएर के अनुसार, क्लिंटन के कार्यकाल में उत्तर कोरिया के परमाणु अड्डों पर हमले की रणनीति पर विचार किया गया था लेकिन उस समय माना गया कि इसके ख़तरे बहुत ज़्यादा हैं.

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6- क्या उत्तर कोरिया संकट का हल निकल पाएगा?
ये कहा जाता रहा है कि वर्तमान उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन से वार्ता करना असंभव है क्योंकि उन्हें नासमझ के तौर पर लिया जाता रहा है.
संयुक्त राष्ट्र नए अमरीकी राजदूत निक्की हेली ने उन्हें ऐसा ही कहा था.
लेकिन विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश करना नासमझी बिल्कुल नहीं है.
सियोल में योनसेई यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ने बीबीसी से कहा, "किम जोंग उन के पास अपनी सुरक्षा के लिए कोई सहयोगी नहीं है. जबकि उनके सामने आक्रामक महाशक्ति है, जिसने हाल के दिनों में पूरी दुनिया भर में कई स्वायत्त देशों पर हमले किए हैं."
उनके अनुसार, इराक़ पर हमले से उत्तर कोरियाईयों ने ये सबक हासिल किया कि अगर सद्दाम हुसैन वाक़ई सामूहिक नरसंहार के हथियार रखते तो बच जाते.
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