You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
अफ़ग़ानिस्तान: पति ने दिए ज़ख़्म तो रेस्तरां ने दिया सहारा
अफ़ग़ानिस्तान को महिलाओं के लिए सबसे ख़तरनाक जगहों में से एक माना जाता है.
एक अध्य्यन के मुताबिक़ इस देश की 87 प्रतिशत महिलाओं ने घरेलू हिंसा झेली है.
सोदाबा हैदर राजधानी काबुल में एक ऐसी जगह पहुंचीं जहां घरेलू हिंसा से भागकर आई महिलाओं को उम्मीद की किरण दिखाई जाती है.
जब वो घर से भागी
रसोई में काम करने वाली अरयान की शिफ्ट ख़त्म होने वाली है. जब वो अपना ऐप्रन और टोपी उतारती हैं तो उनके व्यक्तित्व की झलक नज़र आती है.
काली जींस पर रंगबिरंगी कुर्ती पहने अरयान की दोनों भौंहों के ठीक बीच में एक तिल है मानो जैसे किसी ने बिंदी लगाई हो.
वो टेबल पर एक नींबू पानी का ग्लास रखकर मेरे पास बैठ गईं. अरयान बेहद ख़ूबसूरत और आत्मविश्वास से लबरेज हैं. यक़ीन नहीं होता कि हम दोनों हमउम्र हैं.
वो 24 साल की हैं, लेकिन उन्हें देखकर लगता है मानो उनकी उम्र इससे कहीं ज़्यादा है. इसकी वजह है वो गुज़रे साल जो उन्होंने अपने पति की हिंसा सहते हुए गुज़ारे थे.
अरयान महज़ 16 साल की थीं जब उनके मां-बाप ने उनकी शादी एक ऐसे शख़्स से कर दी जिससे वो कभी मिली तक नहीं थीं.
शादी के कुछ ही समय बाद उनके पति और सास ने उन्हें पीटना शुरू कर दिया.
वो फंस गईं और इस उम्मीद में दिन काटने लगीं कि एक दिन सबकुछ ठीक हो जाएगा. लेकिन हालात बदतर होते गए.
जब तक उन्हें ये अहसास हुए कि वो एक अपमानजनक रिश्ते में हैं तब तक उनके तीन बच्चे हो चुके थे.
एक दिन जब अरयान के पति काम पर गए थे, उन्होंने अपने चेहरे के ताज़ा जख़्मों को देखा जो उनके पति ने दिए थे.
इसके बाद उन्होंने अपना सामान बांधा और बच्चों को लेकर पुलिस स्टेशन पहुंच गईं.
अफ़ग़ानिस्तान में घरेलू हिंसा की शिकायत लेकर आई महिलाओं को अक्सर पुलिस घर की इज़्ज़त का हवाला देकर वापस पति और परिवार के पास भेज देती है.
लेकिन अरयान को लगा था पुलिस उनके ज़ख्मों को देखकर हालात को समझेगी और ऐसा ही हुआ.
घरेलू हिंसा से उम्मीद की किरण तक
उन्हें एक महिला आश्रम में भेज दिया गया. तब से ही वो और उनके बच्चे वहां रह रहे हैं. यहां और भी कई महिलाएं रहती हैं जो घरेलू हिंसा से भाग कर आई हैं.
अरयान ने हमेशा सपना देखा था कि भविष्य में उनके पास एक ऐसी जगह होगी जहां वो बेख़ौफ़ होकर रह सकेंगीं, जहां उन्हें और बच्चों को उनके पति का डर नहीं होगा.
उनका इस सपने तक पहुंचने का रास्ता काबुल में सच हो गया. इसकी शुरुआत हुई पारंपरिक अफ़ग़ानी तरीक़े से सजे रेस्तरां बोस्त से.
ये वो जगह है जिसे घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं चलाती हैं. यहां महिलाएं पीड़ित नहीं बल्कि एक मज़बूत और स्वतंत्र इंसान होतीं हैं.
बोस्त में आठ महिलाएं हैं जो हर उम्र की है. यहां काम करके उन्हें अपनी जिंदगी की नया अध्याय लिखने की शक्ति मिलती है.
अफ़ग़ानिस्तान की सशक्त महिलाओं की दीवार
इस रेस्तरां का हर कोना शक्तिशाली महिलाओं की कहानी कहता है.
ये जगह महिला सशक्तिकरण की आवाज़ है. हर दीवार पर उन महिलाओं की तस्वीरें है जिनकी अपनी एक अनूठी कहानी है.
यहां क्वीन सोरया की तस्वीर है जो किंग अमानुल्लाह की पत्नी थीं, उन्होंनमे यूरोपीय फ़ैशन के कपड़े पहने हैं.
उनका मानना था कि महिलाओं को नक़ाब छोड़ देना चाहिए और एक पुरुष की एक ही पत्नी होनी चाहिए. वो शिक्षा मंत्री भी थीं. उन्होंने 1920 में देश में लड़कियों का पहला स्कूल खोला था.
यहां अफ़ग़ानिस्तान की वर्तमान प्रथम महिला रूला ग़नी की भी तस्वीर है जो क्रिश्चियन परिवार में पैदा हुईं लेबनानी महिला हैं.
रूला ने महिला अधिकारों की बात कर अफ़गान लोगों को हैरान कर दिया था.
यहां कुछ कम जाने पहचाने चेहरे भी हैं. एक अफ़ग़ानी महिला जिसकी हत्या इसलिए कर दी गई थी क्योंकि वो नौकरी करती थीं.
इस्लाम बीबी जो एक युवा पुलिस अधिकारी थीं और जिन्हें उनके भाई ने ही जान से मारने की धमकी दी थी.
और एक दिन जब वो काम पर जा रही थीं तब अनजान बंदूकधारियों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी थी. उनकी कहानी भुलाई नहीं गई है.
एक और दीवार है जो अपने आप में अफ़गानिस्तान का सम्मान करती है, इसमें तीन अलग-अलग महिलाओं की तस्वीरें हैं जो अफ़ग़ानिस्तान की चमकीली पारंपरिक पोशाकों में हैं. ये इस खंडित राज्य के हर एक प्रांत का प्रतीक हैं.
रूढ़िवादी समाज से परे एक अनोखा पहलू
यहां एक छोटा-सा स्टेज है जो कि हाथ से बने अफ़ग़ानी कालीन से सजा है. यहां महिला कलाकार बैठकर लंबी गर्दन वाले तारों के साज़ बजाती है. इसे तंबूर कहा जाता है.
या कभी गिटार और वॉयलिन भी बजाए जाते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के रूढ़िवादी समाज का ये बेहद असाधारण पहलू है, जहां ज़्यादातर लोगों का मानना है कि संगीत पर पाबंदी होनी चाहिए.
अरयान का तलाक़ हो चुका है. यहां बिताए अपने इन तीन महीनों को वो बेहद अहम मानती हैं जिसने उनकी ज़िंदगी बदल दी.
अब वो एक डरी हुई और असुरक्षित महिला नहीं हैं जो वो पहले थीं.
अब अरयान वो महिला नहीं हैं जिन्हें मारपीट से अपना बचाव करना पड़ता हो, जो थोड़ी-सी ऊंची आवाज़ में दुबक जाती हों.
लेकिन उनके पति की वजह से वो पुरुषों से हमेशा के लिए नफ़रत करने लगी हैं. उन्हें लगता है कि सारे पुरुष अत्याचारी होते हैं. हालांकि धीरे धीरे ये सोच थोड़ी बदल रही है.
इस रेस्तरां में वो हर रोज़ उन पुरुषों को देखती हैं जो अपने परिवार के साथ आते हैं, वो पुरुष जो नेकदिल और देखभाल करने वाले हैं.
और वो एक ऐसी चीज़ देखती हैं जिसका उन्होंने अपनी ज़िंदगी में कभी अनुभव नहीं किया और वो है प्यार.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)