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अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट का कितना रौब
अफ़ग़ानिस्तान में हाल के दिनों में कई हमले हुए हैं जिनके पीछे तथाकथित इस्लामिक स्टेट का हाथ माना जाता है. बीबीसी संवाददाता दाऊद आज़मी ने इस बात की पड़ताल की है कि इस्लामिक स्टेट से अफ़ग़ानिस्तान और आसपास के क्षेत्र को कितना और किस तरह का ख़तरा है.
कहां-कहां है आईएस
जनवरी 2015 में इस्लामिक स्टेट ने अपनी ख़ुरासान ब्रांच स्थापित करने की घोषणा की थी. ख़ुरासान एक पुराना नाम है जिसके दायरे में अफ़ग़ानिस्तान और आस-पास का इलाका आता है. तब ये पहला मौक़ा था जब इस्लामिक स्टेट ने अरब जगत से बाहर अपने पैर पसारने की आधिकारिक घोषणा की थी.
इस घोषणा के कुछ ही हफ्तों बाद इस्लामिक स्टेट ने अफ़ग़ानिस्तान के कम से कम पांच प्रांतों में अपनी मौजूदगी का अहसास कराया था. ये प्रांत हैं- हेलमंद, ज़ाबुल, फ़राह, लोगार और नंगरहार.
तब इसके साथ ही पहली बार ऐसा हुआ था जब इस्लामिक स्टेट ने अफ़ग़ान तालिबान को सीधी चुनौती दी. ऐसा करके इस्लामिक स्टेट अफ़ग़ान तालिबान लड़ाकों को खदेड़ना चाहता था और ये भी चाहता था कि तालिबान-अलक़ायदा गठबंधन में शामिल लड़ाके उसका हाथ थाम लें.
लेकिन स्थानीय समर्थन और राजनीतिक बल हासिल करने की इस क़वायद में इस्लामिक स्टेट को ज़बर्दस्त संघर्ष करना पड़ा और उसने अफ़ग़ान तालिबान सहित हर किसी को अपना शत्रु बना लिया.
फिर भी इस्लामिक स्टेट ने उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में अपने पैर जमाने की कोशिशें जारी रखी हैं ताकि वो मध्य एशिया, चेचन और चीनी वीगर उग्रवादियों से गठजोड़ कर सके.
इस्लामिक स्टेट के पास कितने लड़ाके
अफ़ग़ानिस्तान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के बाद इस्लामिक स्टेट को अमरीकी हवाई हमलों और अफ़ग़ान सेना की ज़मीनी कार्रवाई में अपने सैकड़ों लड़ाकों को खोना पड़ा है.
इतना ही नहीं, अफ़ग़ान तालिबान के साथ टकराव में भी इस्लामिक स्टेट के सैकड़ों लड़ाके मारे जा चुके हैं.
इनमें अफ़ग़ान-पाकिस्तान ब्रांच के संस्थापक नेता हाफ़िज़ सईद ख़ान और उनके ख़ास आदमी भी शामिल हैं. इनमें से अधिक अमरीकी ड्रोन हमलों में मारे गए.
फिर भी एक अनुमान के मुताबिक अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के 1000 से 5000 हज़ार तक लड़ाके हो सकते हैं.
जो लड़ाके मारे जा चुके हैं, उनकी भरपाई करने के लिए इस्लामिक स्टेट नए लड़ाकों को भर्ती करने की कोशिश कर रहा है.
इस्लामिक स्टेट के तौर-तरीक़े
अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट छापामार तरीके से लड़ रहा है. इनमें आत्मघाती हमले, चुनकर निशाना बनाना और उन्नत विस्फोटक उपकरण (आईईडी) का इस्तेमाल शामिल है.
इस्लामिक स्टेट का कहना है कि उसने अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में हाल के दिनों में कुछ बड़े जानलेवा हमले किए हैं. जुलाई 2016 में एक ऐसे ही हमले में काबुल में 80 लोग मारे गए थे.
तीन महीने बाद आशुरा के मौके पर काबुल में किए गए हमले में 30 लोग मारे गए थे. नवंबर 2016 में काबुल की एक मस्जिद पर हुए हमले में भी 30 से अधिक लोग मारे गए थे और ये इन सभी हमलों में अल्पसंख्यक शिया मुसलमानों को निशाना बनाया गया था.
आत्मघाती धमाके और बम हमलों के अलावा अपहरण और सिर कलम करना अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के जानेमाने तौर-तरीके रहे हैं.
शिया इस्लामिक स्टेट के निशाने पर क्यों?
इस्लामिक स्टेट ने पाकिस्तान में भी हमले किए हैं जहां वो शिया विरोधी कुछ गुटों के समर्थन पर निर्भर है. पाकिस्तान में उसने पहला बड़ा हमला मई 2015 में किया था जिसमें कराची में 40 शिया मुसलमान मारे गए थे.
इस साल फरवरी में सिंध सूबे के सेहवान कस्बे में सूफ़ियों के तीर्थ लाल शहबाज़ क़लंदर पर भी इस्लामिक स्टेट ने हमला किया जिसमें पुलिस के मुताबिक 90 लोग मारे गए हैं.
इस्लामिक स्टेट अफ़ग़ानिस्तान में सीरिया और इराक़ की तर्ज़ पर बहुसंख्यक सुन्नी और अल्पसंख्यक शियाओं में सांप्रदायिक लड़ाई कराना चाहता है. अफ़ग़ानिस्तान में शियाओं पर इस्लामिक स्टेट के हमलों ने मौजूदा संघर्ष में एक ख़तरनाक घालमेल कर दिया है.
क्षेत्रीय ताक़तें और इस्लामिक स्टेट
अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में इस्लामिक स्टेट का भविष्य सीरिया और इराक़ में उसकी दशा-दिशा पर निर्भर है.
पश्चिमी और अफ़ग़ान सैन्य अधिकारी इस बात की पुष्टि करते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान वाली शाखा इस्लामिक स्टेट के मुख्य नेतृत्व के संपर्क में रहती है और उसे वित्तीय मदद भी मिलती है.
दक्षिण और मध्य एशियाई देशों में सक्रिय इस्लामिक स्टेट भी उसके संपर्क में है. इस्लामिक स्टेट पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से बाहर अभी तक हमले भले ही नहीं कर पाया हो, लेकिन क्षेत्र में उससे सहानुभूति रखने वाले भी मौजूद हैं.
अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, भारत, कज़ाख़स्तान, किर्गिज़स्तान, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान जैसे देशों से कुल मिलाकर सैकड़ों लोग इस्लामिक स्टेट के समर्थन में लड़ने के लिए सीरिया और इराक़ जा चुके हैं.
ये सारी बातें अफ़ग़ानिस्तान के संघर्ष को और जटिल बना देती हैं और पूरे क्षेत्र के लिए ख़तरे की सूचना देती हैं.
यही वजह है कि रूस, चीन और ईरान जैसी क्षेत्रीय ताक़तें अपनी आंतरिक सुरक्षा में इस्लामिक स्टेट की सेंध को लेकर चिंतित हैं. इसीलिए उन्होंने अफ़ग़ान तालिबान से संपर्क साधा है जो इस्लामिक स्टेट से लड़ रहा है.
लेकिन परस्पर अविश्वास इन क्षेत्रीय ताक़तों को अफ़ग़ानिस्तान का संघर्ष ख़त्म करने के लिए सहमति पर पहुंचने से रोक रहा है.
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