रूस और अमरीका: अविश्वास और शक़ की एक सदी पुरानी दास्तां

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- Author, गॉर्डन कोरेरा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमरीकी चुनाव परिणामों को प्रभावित करने में रूस की भूमिका को लेकर इन दिनों सवाल खड़े किए जा रहे हैं.
लेकिन यह कोई नई बात नहीं है. रूस और और पश्चिमी देशों के बीच अविश्वास का लंबा इतिहास रहा है.
एक तरफ जहां ये दोनों पक्ष जासूसी और एक-दूसरे की खुफिया जानकारियों को चुराने का इल्जाम लगाते रहे हैं.
वहीं दूसरी ओर ये दोनों पक्ष एक-दूसरे को अस्थिर और उनके विपक्षियों के साथ मिलकर राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने का भी इल्जाम लगाते रहे हैं.

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एक-दूसरे पर आरोप लगाने का यह सिलसिला करीब एक सदी से चला आ रहा है.
इन दिनों अमरीका के राजनीतिक माहौल में रूस की भूमिका को लेकर कई तरह की बातें हो रही हैं लेकिन इस पर रूस की अपनी प्रतिक्रिया है.
आरोप-प्रत्यारोप की यह दास्तां शुरू होती है सौ साल पहले. 1917 में रूस में हुए बोल्शेविक क्रांति को ब्रिटेन ने पलटने की कोशिश की थी.
जासूसों की भूमिका
ब्रितानी खुफिया एजेंसी एमआई VI से जुड़े जासूसों पॉल ड्यूक्स और सिडनी रेइली की इस साजिश को रचने में महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है.

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इन दोनों जासूसों के ऊपर 'ऐस ऑफ स्पाइस' नाम की टीवी सीरिज़ भी बनी थी.
हालांकि रूस में लोकार्ट को सबसे ज्यादा याद किया जाता है. इसके उलट ब्रिटेन में लोग शायद ही कोई लोकार्ट के बारे में जानता हो.
रॉबर्ट ब्रूस लोकार्ट ब्रिटेन के राजनयिक थे और वो रूस में नियुक्त थे.
रसियन स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ ह्यूमनटीज के प्रोफेसर इवजीन सेरगेव का कहना है, "उस दौर की छाया अब तक रूस और पश्चिम के देशों के रिश्तों पर दिखती है."
वो कहते हैं, "सोवियत प्रोपेगेंडा ने उस दौर का इस्तेमाल यह दिखाने में किया कि बोल्शेविक सरकार को गिराने की ग़लत मंशा के साथ पूरा किया धरा था."
बोल्शेविक सरकार ने अपने खुफिया तंत्र को मजबूत बनाकर इस बाहरी हस्तक्षेप का मुकाबला करने की कोशिश की.
इसके लिए उसने अपने जासूस बाहर के देशों में भेजे ताकि वो भी उन देशों के ख़िलाफ़ साजिश रच सके.
शीत युद्ध का दौर
1920 की दशक में ब्रिटेन सबसे ज्यादा इस बात से डरा हुआ था कि कहीं रूस पूरी दुनिया में बोल्शेविक क्रांति के बीज ना फैला दें.

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कम्युनिस्ट इंटरनेशनल का एक संदेश जिसे जिनोवेव लेटर के नाम से जाना जाता है, ने इस धारणा को मज़बूत बनाया. हालांकि यह एक जाली दस्तावेज़ था.
इसके बाद दोनों खेमों के बीच शीत युद्ध का एक लंबा दौर चला.
शीत युद्ध के दौरान रूस की पश्चिम को अस्थिर करने की गतिविधियों को काफी गंभीरता से लिया गया.
रूस की पश्चिम को अस्थिर करने का डर और रूसी जासूसों की काबिलियत हमेशा से पश्चिम में लोकप्रिय दलील रही है.
यह डर शीत युद्ध के साथ भी ख़त्म नहीं हुआ.
नाटो के विस्तार को रूस ने अपने ख़िलाफ़ पश्चिमी साजिश को तौर पर देखा.
मौजूदा विवाद इसी लंबी कड़ी का ताज़ा उदाहरण है.
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