अफगानिस्तान-पाकिस्तान का झगड़ा क्या है
- Author, वुसतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
जब-जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान का दिमाग घूमता है तो एक दूसरे पर लड़ाकू पड़ोसियों की तरह तू-तू मैं-मैं शुरू हो जाती है.
कुछ लोग कहते हैं कि सारी खराबी पाक अफगान सरहद की लकीर ने पैदा की है जो अंग्रेजों ने ज़बरदस्ती अफगान हुक्मरानों से खिंचवाई और जब तक इस सरहदी लकीर के बारे में कोई आखिरी फैसला नहीं हो जाता दोनों तरफ दिमाग यूं ही घूमता रहेगा.
आप किसी भी अफगान से बात कर लें. वह कम्युनिस्ट हो या पूंजीपति, तालिबानी हो या कबायली लड़ाका, शहरी हो या देहाती, आस्तिक हो या नास्तिक.

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नब्बे बातों पर एक दूसरे से असहमत होंगे मगर इस पर सब सहमत होंगे कि डूरंड रेखा एक नाजायज लकीर है और हम इसे नहीं मानते.
ब्रिटिश भारत
सबको यकीन है कि 1893 में अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान और ब्रितानी सरकार के सचिव सर मॉर्टीमर डूरंड ने सरहद हदबंदी के जिस समझौते पर दस्तखत किए, उसकी मियाद सौ बरस थी (मानो वह समझौता 1993 में खत्म हो गया).
कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि ये समझौता ब्रिटिश भारत से हुआ था, इसलिए 14 अगस्त 1947 को ही ये खत्म हो गया.

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शायद इसीलिए 1949 में अफगान लोया जिरगा ने डूरंड रेखा को एक बोगस और फर्जी सरहद करार देने के संकल्प पारित किया और नारा लगाया कि दोनों ओर के पख्तून एक हैं.
डूरंड रेखा
क्या वाकई ये सरहदी लकीर सौ बरस के लिए ही खींची गई थी? क्या ब्रिटेन के भारत से विदा होते ही यह समझौता खत्म हो गया? क्यों न चश्मा उतार देखा जाए?
दरअसल 1893 में जो डूरंड रेखा खींची गई थी, वह 100 बरस के लिए नहीं थी बल्कि अमीर अब्दुर रहमान खान और सर मॉर्टीमर डूरंड ने जिस समझौते पर दस्तखत किए थे, इसकी मियाद दस्तखत करने वाले बादशाह की जिंदगी तक मानी गई थी.

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इस समझौते में ये बात भी शामिल थी कि अफगानिस्तान अपनी जरूरत का असलहा भारत के रास्ते खरीद सकता है और ब्रिटिश भारत अफगान बादशाह को सालाना अठारह लाख रुपये का ग्रांट भी देगा.
समझौते पर दस्तखत
इसलिए अमीर अब्दुर रहमान खान की मौत के साथ जैसे ही समझौता समाप्त हुआ ब्रिटिश सरकार ने नई व्यवस्था तैयार होने तक सालाना ग्रांट और पैसेज (पारगमन) की सुविधा पर रोक लगा दी.
भारत में ब्रिटिश सचिव सर लुई डीन नए अमीर हबीबुल्लाह खान के निमंत्रण पर बातचीत के लिए काबुल पहुंचे.

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21 मार्च 1905 को ब्रिटिश सचिव और हबीबुल्लाह के बीच समझौते पर दस्तखत हुए और राहत व पारगमन की सुविधा बहाल हो गई.
अफगानिस्तान की आजादी
इस समझौते के मसौदे में अमीर हबीबुल्लाह की तरफ से वादा किया गया कि उनके पिता ने ब्रिटिश सरकार के साथ जो समझौता किया था वह भी उस पर पूरी तरह से अमल करते रहेंगे और कभी इसका विरोध नहीं करेंगे.
तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध के बाद आठ अगस्त 1919 को रावलपिंडी में अफगान गृह मंत्री अली अहमद खान ने ब्रिटिश सरकार के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.
इसके नतीजे के तौर पर ब्रिटेन ने हालांकि राहदारी (पैसेज) और सालाना ग्रांट की सुविधा वापस ले ली मगर अफगानिस्तान की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को पहली बार स्वीकार कर लिया.
दोस्ताना रिश्ते
समझौते के पांचवीं क्लॉज में लिखा है, 'अफगान सरकार भारत और अफगानिस्तान की वही सीमा पहचानता है जो मरहूम अमीर हबीबुल्लाह खान ने स्वीकार की थी.'
यूं पहली बार 1919 के समझौते के तहत डूरंड रेखा समझौते की मियाद बादशाह की जिंदगी तक बने रहने की पाबंदी से मुक्त होकर आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय सीमा बन गई.
22 नवंबर 1921 को काबुल में ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि सर हेनरी डॉब्स और अफगान सरकार के प्रतिनिधि महमूद करज़ई ने ब्रिटेन और अफगानिस्तान के बीच दोस्ताना व्यापार संबंधों के समझौते पर हस्ताक्षर किए.
नया समझौता
इस करार ने 1919 वाले समझौते की जगह ली. नए समझौते में कहा गया है, 'दोनों पक्ष भारत और अफगानिस्तान के बीच वही सरहद कबूल करते हैं जो 1919 के समझौते में स्वीकार किया गया था.'
1921 के समझौते में यह भी कहा गया कि इस बदलाव के तीन साल बाद कोई भी पक्ष समझौते से वापस हो सकता मगर न ब्रिटिश सरकार और न ही अमीर अमानुल्लाह खान की सरकार ने इससे कदम पीछे खींचे.
अमीर अमानुल्लाह खान के उत्तराधिकारी शाह नादिर ख़ान ने छह जुलाई 1930 को ब्रिटिश सरकार के खत के जवाब में जो राजनयिक पत्र भेजा उसके दूसरे पैरा में लिखा है, 'आपकी लिखित चेतावनी के जवाब में हम गर्व से घोषणा करते हैं कि जो करार पहले से वजूद में है, उसे हम मानते भी हैं और उसे पूरी तरह से लागू माना जाए.'
सरहद हदबंदी
रही बात इस मुद्दे की कि सीमा समझौता ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच था तो ब्रिटिश सरकार के समाप्त होने के साथ से ये अनुबंध भी समाप्त हो गया.
बहुत से अफ़ग़ान अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत विरासत में मिली सत्ता को नहीं मानते तो इस नजरिये को भी वो कैसे मानेंगे.
उन्नीसवीं सदी में अफगानिस्तान और रूस के बीच जो सरहद हदबंदी हुई उसे अफगानिस्तान की इच्छा मालूम किए बिना ब्रिटेन और रूस ने आपस में तय करके लागू कर दिया.
पांच समझौते
जबकि अफगानिस्तान और ईरान की सरहदी हदबंदी की प्रक्रिया भी अफगानिस्तान को बाहर रख कर की गई और यह परिसीमन ब्रिटेन और ईरान के बीच समझौते के तौर पर लागू कर दी गई.
डूरंड रेखा एकमात्र सीमा रेखा है जिसे अफगान के बादशाह की मर्जी से तय किया गया और लगातार तीन बादशाहों ने 37 वर्ष की अवधि में इस बाबत पांच समझौतों को स्वीकार किया.
अफगानिस्तान ने आज तक पूर्व रूसी राज्यों से मिलने वाली अपनी उत्तरी सरहद की हदबंदी और ईरान से लगने वाली पश्चिमी सरहद को चुनौती नहीं दी मगर डूरंड रेखा को हर बार चुनौती दिया.
अगर पाकिस्तान ब्रिटिश भारत का उत्तराधिकारी राज्य नहीं तो अफगानिस्तान के उत्तरी सीमा के बारे में क्या कहा जाए जो सोवियत संघ के पतन के बाद सोवियत संघ से अलग हुए मध्य एशियाई देशों से लगता है.
अगर वाकई अफगानिस्तान समझता है कि उसके साथ ऐतिहासिक बलात्कार हुआ है तो क्या कोई भी अफगान सरकार कभी इस नाइंसाफी को इंटरनैशन कोर्ट में चुनौती देना पसंद करेगी?
शायद यही एक कानूनी रास्ता है रोज़ रोज़ की बकझक से निजात पाने का अगर कोई भी अफगान सरकार संतुष्ट होना चाहे तो...


















