'क़ीमत उन्होंने चुकाई जिनका लड़ाई से लेना-देना नहीं'

सीरिया के एलप्पो शहर में चल रही ज़बरदस्त लड़ाई के बीच बुजुर्गो के लिए बने आश्रम से कुछ लोगों को निकालकर सुरक्षित जगहों पर ले जाया गया. इसमें शामिल एक डॉक्टर ने भावुक होकर बीबीसी को एक चिट्ठी लिखी. आप भी पढ़ें ये चिट्ठी-

अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति के डॉक्टर के रूप में सीरिया में पांच साल काम करने के दौरान मैंने बहुत कुछ देखा, पर ऐसा कुछ भी नहीं था.

हमने उस आश्रम तक पंहुचने की कोशिश एक दिन पहले भी की थी, पर हमें सुरक्षा की गारंटी नहीं दी गई. लड़ाई तेज़ हो गई थी और आश्रम के तीन लोग मारे गए थे.

हमें जब इसकी अनुमति मिली और वहां पंहुचे तो पाया कि वहां कुल 150 लोग थे. इनमें कुछ अपाहिज थे, कुछ मानसिक रूप से बीमार थे और बाक़ी कहीं और जगह जा नहीं सकते थे.

अंधेरा होने लगा था और हम पुराने शहर की तंग गलियों में थे.

मैंने इसे पहले एक बहुत ही व्यस्त और खुशहाल इलाक़े के रूप में देखा था. अब यह मलबे का ढेर बन चुका था. मैं मकान तो छोड़िए, सड़कों को भी नहीं पहचान रहा था. ऐसा लगता था मानो दुनिया यहीं ख़त्म हो रही थी, मानों यहां से कोई क़हर गुज़र चुका था.

बंदूकों की आवाज़ें वहां से आ रही थी, जहां कोई शोरगुल नहीं था, जहां कोई शख़्स नहीं था.

अंत में हम वहां पंहुच गए, जहां कोई गाड़ी नहीं जा सकती थी.

वहां दो ढहे हुए मकान थे, एक पुरुषों के लिए, दूसरा औरतों के लिए.

हम अंदर दाख़िल हुए और आंगन तक जा पंहुचे. कुछ बीमार लोग अलाव के पास जाड़े में ठिठुरते हुए बैठे थे. उनके पास पूरे कपड़े भी नहीं थे.

दूसरी ओर 10 लाशें पड़ी हुई थीं. इनमें कई लोग तो एक ही परिवार के थे.

अंधेरा हो गया और ठंड बढ़ने लगी तो हमें वहां से निकलना पड़ा. हमने उन लोगों की शिनाख़्त की जिन्हें बाहर निकालना सबसे ज़्यादा ज़रूरी था.

वहां न तो दवाएं थीं, न जगह गर्म करने का कोई इंतजाम और न ही खाना पकाने का कोई ईंधन.

मेरी आंखों के सामने ही एक आदमी मर गया.

वहां से लोगों को बाहर निकालना बहुत आसान नहीं था. जो मानसिक रूप से बीमार थे, वे तो बाहर निकलना ही नहीं चाहते थे. वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि वे लड़ाई के मैदान में हैं.

वहां कुछ लोग चार-पांच साल से रह रहे थे. एक ने कहा, "हमारा कोई नहीं है, जाने को कोई जगह नहीं है."

और उसी समय वहां सैनिक पंहुच गए. उनके साथ छह बच्चे थे. वे मलबे के बीच असहाय हालत में पाए गए थे. उनमें सबसे बड़ी सात साल की एक लड़की थी, सबसे छोटा सात महीने का लड़का था.

इन बच्चों के माता पिता मारे गए थे और अब वे बिल्कुल अनाथ हो गए थे. उनके पास कुछ भी नहीं था उनका कोई बचा नहीं था.

वृद्धाश्रम में 18 लोग ऐसे थे, जो कहीं जाना ही नहीं चाहते थे क्योंकि उनका कोई नहीं था, ऐसी कोई जगह नहीं थी जहां वे जा सकें.

इस भयानक लड़ाई की क़ीमत उन लोगों ने चुकाई, जिन्होंने इसका फ़ैसला नहीं किया था, जिन्हें इस पूरी लड़ाई से कोई लेना देना ही नहीं था.

वे सबसे कमज़ोर लोग थे जिनके पास कोई चारा नहीं था और उन्हें बचाने वाला कोई नहीं था.

मेरा यह सब लिखने का मतलब ये नहीं है कि कौन सही है, कौन ग़लत है या कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है.

यह असली जीवित लोगों के बारे में है, यह मानव के बारे में है. यह उनके बारे में है जिनका ख़ून बह रहा है, जो रोज़ाना मर रहे हैं, जो अनाथ हो रहे हैं.

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