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'गूजर ही नहीं, सभी उपेक्षितों को आरक्षण' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चर्चित राजनीतिक हस्ती स्वर्गीय राजेश पायलट के बेटे और युवा राजनेता सचिन पायलट का नाम आज अनजाना नहीं है. बेहद कम उम्र में राजनीति में ख़ासा नाम कमाने वाले सचिन पायलट से आज के चुनावी परिदृश्य के संदर्भ में बेबाक बातचीत- चर्चा थी कि आप भीलवाड़ा जाएँगे या दक्षिण दिल्ली से चुनाव लड़ेंगे लेकिन अजमेर आना कैसे हुआ? और क्या लग रहा है आपको? देश भर में परिसीमन की जो प्रक्रिया थी, उसके बाद बहुत से बदलाव आए और मेरी सीट जहाँ से मैं सांसद था वो अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हो गई. फिर पार्टी ने आम जनता से, नेताओं से और कार्यकर्ताओं से विचार विमर्श किया और अजमेर लोकसभा क्षेत्र से मुझे उम्मीदवार बनाया. ये पार्टी का फ़ैसला है और इसके लिए मैं पार्टी को धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने मुझमें विश्वास व्यक्त किया और इतने प्रसिद्ध और ऐतिहासिक स्थान से मुझे अपना उम्मीदवार बनाया. पार्टी के इस फ़ैसले से क्या आप संतुष्ट हैं? आज की चुनावी परिस्थितियों के नज़रिए से चुनाव को किस तरह से देख रहे हैं? मैं ख़ुद भी चाहता था कि अजमेर से चुनाव लड़ूँ. यहाँ पर ग्रामीण क्षेत्र भी हैं और शहरी क्षेत्र भी हैं. काम करने के लिए यहाँ बहुत संभावनाएँ हैं. मैं समझता हूँ कि आज का माहौल कांग्रेस के पक्ष में है, कार्यकर्ताओं में जोश है, जो जनभावना है, वो कांग्रेस के पक्ष में है और यहाँ से हम कांग्रेस पार्टी को अच्छी जीत दर्ज कराएंगे. गूजरों को लेकर पिछले कई साल संघर्ष के रहे हैं, ख़ासतौर पर राजस्थान में गूजर आंदोलन खड़ा हुआ? इसमें सचिन पायलट की क्या भूमिका रही? उन्होंने इसको किस तरह से उठाया? राजेश पायलट के बाद इस आंदोलन को आप किस तरह ले रहे हैं और कितना प्रभावी हो पा रहे हैं? संविधान में आरक्षण एक ऐसा पहलू है जो समाज के वंचित तबक़ों या जो समाज मुख्यधारा से जुड़ नहीं पाए हैं उनके लिए है. हमारी कोशिश यह है कि ऐसे तबक़ों की संविधान के दायरे में रहकर मदद हो सके. लेकिन यह संविधान के दायरे के तहत ही होना चाहिए. आरक्षण का इस्तेमाल जब पार्टियाँ अपने निजी राजनीतिक हित के लिए करने लगती हैं तो उसका नुक़सान होता है. और राजस्थान में तो विशेषकर बीजेपी सरकार ने 70 लोगों को गोलियों से भून दिया, मार डाला. ये मुद्दा फिर आरक्षण का नहीं रहा था, ये एक मानवीय मुद्दा बन गया था कि आप निहत्थे लोगों पर गोली बरसाकर किस प्रकार का शासन देना चाहते हैं. जो लोग इसके योग्य हैं, उन्हें सबको (किसी एक को नहीं) इसका लाभ मिलना चाहिए. फिर वो चाहे किसी भी धर्म के हो. मैं समझता हूँ कि जो भी वंचित रहे हों, शैक्षिक आधार पर, आर्थिक आधार पर प्रगति नहीं कर पाया हो. उस तबके की मदद करने पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन इसका राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए, यह बहुत ग़लत है. राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना के बारे में कहा जाता है कि यह कांग्रेस की देन है. यूपीए उसे अपनी सबसे ऐतिहासिक उपलब्धियों में गिनाता है. आप इसे किस तरह से देख रहे हैं? एक बात बार बार क्षेत्र से उठ रही है कि जिस तरह कांग्रेस को नरेगा के लिए उपलब्धि मिलनी चाहिए थी, प्रचार होना चाहिए था, उसके आधार पर वोट माँगना चाहिए था, वह चीज़ नहीं दिखती है. ऐसा क्यों हो रहा है?
दुनिया में 200 देश हैं. भारत इकलौता ऐसा देश है जहाँ पर रोज़गार का क़ानून है. आप कल्पना कीजिए किसी एक देश में जहाँ रोज़गार को एक अधिकार बना दिया गया है. कम से कम सौ दिन का रोज़गार एक घर को मिलेगा. इस कानून की किसी ने माँग ही नहीं की थी. किसी ने सोचा ही नहीं था. सूखे, अकाल और बाढ़ में लोग पलायन कर जाते थे. आज हमने ग़रीब की जेब में उनके काम पर पैसा लाने का प्रयास किया है. इस पर हमारा आधारभूत ढ़ाँचा भी बन रहा है, लोगों को आर्थिक मदद भी मिल रही है, राहत भी मिल रही है. ये अपने आप में बहुत शक्तिशाली क़ानून है. इसमें 15 दिन के अंदर अगर ज़िलाधिकारी आपको रोज़गार नहीं देता है तो सोलहवें दिन आपका भत्ता चालू हो जाएगा. यह बहुत ज़बरदस्त क़ानून है और निश्चित रूप से सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह जी की देन है. दुनिया भर में इस बात की तारीफ़ की जाती है कि भारत की सरकार ने ग़रीबों की भलाई के लिए ऐसा क़दम उठाया है. हमें चुनाव में निश्चित रूप से इसका फ़ायदा मिलेगा. लेकिन क्या आपके कार्यकर्ता इस उपलब्धि और इस मैसेज को ले पा रहे हैं लोगों के बीच जाकर? बिलकुल, देखिए अपना बखान करना कोई बहुत अच्छी बात नहीं है लेकिन पूरी दुनिया जानती है और हमारे कार्यकर्ता इस बात को लोगों में पहुंचा भी रहे हैं कि इतना प्रभावशाली क़ानून हमारी सरकार ने बनाया है जो देश और इलाक़े की जनता की भलाई के लिए है. हम लोग इसका प्रचार भी कर रहे हैं और धन्यवाद भी देते हैं सरकार को कि उन लोगों ने सोच ऐसी रखी कि जिससे लोगों की मदद हो सके., युवा नेतृत्व की बात उठती है तो लोग कांग्रेस की ओर देखते हैं. आपका नाम आता है, ज्योतिरादित्य का नाम आता है. राहुल का नाम सबसे ऊपर आता है. उनको पार्टी का प्रधानमंत्री बनाने की माँग भी उठती है. क्या आपको लगता है कि पार्टी का युवा नेतृत्व सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य, राहुल, ये सब लोग तैयार हैं कांग्रेस और देश की कमान अपने कंधे पर उठाने के लिए? इतनी बड़ी पार्टी का नेतृत्व कोई एक या दो व्यक्ति नहीं कर सकते हैं. जहाँ तक युवाओं की बात है, निश्चित रूप से राहुल जी के नेतृत्व में आज देश का युवा कांग्रेस से जुड़ रहा है लेकिन हम सामूहिक नेतृत्व करेंगे और इस देश में जो युवा की प्रतिभा है, ऊर्जा है, उसका सही संचालन करेंगे. देश की राष्ट्रीय राजनीति में युवा प्रतिभा का महत्व बढ़ता जा रहा है जो स्वाभाविक है. इसलिए हम समझते हैं कि कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जो युवाओं को प्राथमिकता देकर राजनीति की अग्रिम पंक्ति में खड़ा करना चाहती है. तो इसके बहुत से कारण हैं कि न सिर्फ़ संसद में बल्कि विधानसभाओं में, नगरपालिकाओं में, ग्राम पंचायतों में हर स्तर पर हमने युवाओं को महत्व देकर आगे लाने की कोशिश की है. अगर विकल्प के तौर पर यूपीए सरकार बनाने की स्थिति में आती है, और कांग्रेस मुख्य प्रभावी पार्टी के तौर पर सामने आती है तो आपकी व्यक्तिगत मंशा क्या है, आप किसको प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहेंगे? इसमें पार्टी का बिल्कुल स्पष्ट मत है कि मनमोहन सिंह जी जैसा मधुरभाषी, ईमानदार, मेहनती और पारदर्शी व्यक्ति इस दुनिया में और कोई नहीं है, उन्होंने बख़ूबी इस सरकार को चलाया है. हम लोग यही चाहते हैं और यह होगा भी कि अगले प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जी ही बनेंगे. आख़िरी सवाल, अजमेर की लड़ाई में आपकी टक्कर किससे है? कौन आपको चुनौती दे रहा है? आप किससे जीत रहे हैं? चुनाव चुनौती होता है. विचारधाराओं का चुनाव है, और लड़ाई किसी से व्यक्तिगत नहीं होती. लड़ाई सिर्फ़ इसी बात की है कि कौन इलाक़े का ज़्यादा विकास कर सकता है. यहाँ के लोगों ने हमें बहुत आशीर्वाद दिया है और मुझे यहाँ की जनता पर, मतदाताओं पर, कार्यकर्ताओं पर पूरा विश्वास है कि जब सात तारीख़ को मतदान होगा तो अजमेर ज़िले की जनता भारी बहुमत से मुझे संसद में भेजेगी. |
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