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सोमवार, 20 अप्रैल, 2009 को 09:51 GMT तक के समाचार
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लोकसभा चुनाव पर ददुआ-ठोकिया का प्रेत

चित्रकुट
चित्रकुट का इलाक़ा दस्यु परंपरा के लिए जाना जाता है

चित्रकूट के कर्वी-मानिकपुर का इलाक़ा बंजर है. ग़रीबी कूटकूट कर भरी है, नौजवानों के रोज़गार के साधन नहीं हैं. पीने के पानी की गंभीर समस्या रहती है. कहते हैं कि यहाँ फ़सल से ज़्यादा डकैत पैदा होते हैं.

पिछले विधानसभा चुनाव में यहाँ लोगों ने बढ़-चढ़ कर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का साथ दिया था. मायावती सरकार बनने के बाद ही इस इलाक़े के दो दुर्दांत डाकू शिवकुमार पटेल उर्फ़ ददुआ और अंबिका पटेल उर्फ़ ठोकिया मारे गए थे.

जानकारों के अनुसार इन डाकूओं की मौत से 'दस्यु परंपरा' की गवाह रहे इस इलाक़े के ठेकेदारों, व्यापारियों और ददुआ से पीड़ित 'दादू' यानी उंची जातियों के लोगों ने राहत की सांस ली.

मगर ददुआ और ठोकिया के मारे जाने से डकैत ख़त्म नहीं हो गए. उनके चेलों ने फिर से गिरोह बना लिए हैं और पुलिस अब भी उनको पकड़ने के लिए इलाक़े में डेरा डाले हुए है.

ददुआ के नाम पर प्रताड़ना

 ददुआ और ठोकिया का जो प्रेत छाया है उससे बसपा संकट में है, क्योंकि पटेल बिरादरी के लोग इनकी मौत को अपने स्वाभिमान जे जोड़ कर देखते हैं
इलाहाबद प्रेस क्लब के अध्यक्ष रतन दीक्षित

ददुआ के स्वजातीय कुर्मी बिरादरी के लोगों का कहना है कि पुलिस पहले ददुआ के नाम पर हमें परेशान करती थी और अब उनके तथाकथित चेलों को पनाह देने का आरोप लगाती है.

कर्वी से कुछ ही दूरी पर रैपुरा इलाक़े का सबसे बड़ा गाँव स्थित है. गाँव की आबादी लगभग दस हज़ार है. एक चाय की दुकान पर रुक कर मैंने लोगों से बात की तो पता चला कि लोग सरकार से ख़ुश नही हैं. बिजली, पानी की शिकायत तो आम बात है. कई लोगों इस बात की शिकायत की कि गाँवों में जो सफाई कर्मचारियों की भर्ती हुई, उसमें दलित समुदाय के बजाए ब्राह्मण और ऊंची जातियों को दी गई.

लेकिन यहाँ इससे भी बड़ा मुद्दा पुलिस उत्पीड़न था और वह भी चुन-चुन कर कुर्मी बिरादरी के लोगों का. धीरे धीरे वहां बीस-पच्चीस लोग इकट्ठा हो गए. इनमे 90 फीसदी कुर्मी बिरादरी के लोग थे. कई ने आपबीती भी सुनाई. वहां एक बुजुर्ग दलित भी थे, जिन्होंने दबी ज़ुबान से कहा कि उन लोगों की शिकायतें सही हैं.

इन सबने एक स्वर से कहा कि सरकार के मंत्री न तो उन लोगों के यहाँ आते हैं, न ही कोई लाभ या राहत की बात होती है. शायद इसीलिए इतने बड़े गाँव और आस-पास के इलाक़ों में बसपा का एक भी झंडा नही दिखा जबकि समाजवादी पार्टी के झंडे और चुनाव निशान कई जगह दिखे.

रैपुरा से वापस लालता रोड से हनुमानगंज जाते समय हमें उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री दद्दू प्रसाद चुनाव प्रचार करते मिले. दद्दू प्रसाद के काफ़िले में कई स्थानीय ब्राह्मण नेता थे. दद्दू प्रसाद ने ददुआ के मारे जाने का श्रेय लिया था. वह कहते थे, "यहाँ या तो दादू रहेगा या ददुआ. ददुआ और ठोकिया मारे जाने के बाद लोगों का विश्वास मायावती के प्रति बढ़ा है और सर्वजन समाज हमारे साथ है.''

जाति फ़ैक्टर

सरकार के मंत्री दद्दू प्रसाद
मंत्री दद्दू प्रसाद के अनुसार ददुआ और ठोकिया के मारे जाने के बाद मायावती पर विश्वास बढ़ा है

दद्दू प्रसाद बसपा के उम्मीदवार भैरोप्रसाद मिश्र के लिए मेहनत कर रहे थे, ताकि भारतीय जनता पार्टी की ब्राह्मण प्रत्याशी अमिता वाजपेयी वोट न काटें.

मैंने उनसे पूछा कि पहले बसपा का साथ देनी वाली कुर्मी बिरादरी बड़े पैमाने पर उत्पीडन की शिकायत कर रही है. तो उन्होंने इसे ग़लत बताया और कहा, "छह महीने पहले ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में कुर्मियों ने साथ दिया था."

मंत्री जी की बात अपनी जगह. लेकिन इलाहाबद प्रेस क्लब के अध्यक्ष रतन दीक्षित कहते हैं, "ददुआ और ठोकिया का जो प्रेत छाया है उससे बसपा संकट में है, क्योंकि पटेल बिरादरी के लोग इनकी मौत को अपने स्वाभिमान से जोड़ कर देखते हैं."

उन्होंने आगे कहा, "कुर्मी जो पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा के साथ एकजुट खड़ा नज़र आ रहा था. इस बार वह बसपा के ख़िलाफ़ वोट देने जा रहा है. इससे इस पूरे बुन्देलखंड और इलाहाबाद मंडल की कम से कम पांच सीटें इलाहाबाद, बांदा, फतेहपुर, फूलपुर, मिर्जापुर प्रभावित हो रही हैं और इनमें समाजवादी पार्टी की तरफ़ उनका कुछ झुकाव देखा जा रहा है.''

समाजवादी पार्टी ने बांदा, मिर्जापुर और फतेहपुर की सीटों पर कुर्मी प्रत्याशी दिए हैं. इनमे ददुआ का भाई बाल कुमार पटेल शामिल है, जिसकी आपराधिक छवि है. इलाके के समानित नेता राम पूजन पटेल हाल ही में समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं.

वहीं इलाहाबद की फूलपुर सीट पर कांग्रेस ने धर्मराज पटेल को प्रत्याशी बनाकर बसपा का समीकरण बिगाड़ने की कोशिश की है.

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