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बुधवार, 15 अप्रैल, 2009 को 08:08 GMT तक के समाचार
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ब्रितानियों को लुभाता चुनावी पर्यटन

चुनावी रैली

अट्ठाइस वर्षीया सुखविंदर परमार ब्रिटेन में ही पली-बढ़ीं हैं, यहीं उनका जन्म हुआ. भारत से उनका नाता कभी-कभार घूमने जाने तक का ही रहा. लेकिन इस बार वह अप्रैल में भारत के ख़ास भ्रमण पर जा रही हैं- चुनावी भ्रमण.

अप्रैल अंत में सुखविंदर भारत के कुछ अहम शहरों में घूमेंगी, चुनावी रैलियों में जाएँगी और हो सके तो उम्मीदवारों से भी मिलेंगी.

चुनावी पर्यटन पर भारत जाने वाली वह अकेली ब्रितानी नागिरक नहीं हैं. दरअसल लंदन की एक एजेंसी 'सैफ़रन चेज़' इस बार लोगों को चुनावी पर्यटन पर ले जा रही हैं, जहाँ आप भारत को अपने पूरे चुनावी रंग में देख सकेंगे.

कंपनी के प्रबंध निदेशक विकास पोटा बताते हैं, “दौरे के तहत लोगों को मुंबई, अहमदाबाद और कोलकाता जैसे शहरों की चुनावी रैलियों में ले जाने की योजना है. हम स्थानीय लोगों के साथ मिलकर पता कर रहे हैं कि क्या हम उम्मीदवारों से मिल सकते हैं, क्या उनके साथ चुनावी अभियान में जा सकते हैं. राजनीतिक पार्टियों के कुछ लोग भी हमारी मदद कर रहे हैं.”

पेशे से वकील मनोज लाडवा भी इस चुनावी दौरे पर जाने वाले हैं. सुखविंदर और विकास पोटा की ही तरह मनोज का जन्म भी ब्रिटेन में ही हुआ है.

बहुत कुछ है सीखने को...

 भारत को इस तरह जानने में मेरी रूचि मुंबई में 26/11 की घटना के बाद हुई. इसने मुझे ये सवाल उठाने पर मजबूर किया कि भारत सरकार सुरक्षा के लिहाज से क्या कर रही है. सुरक्षा आज अंतरराष्ट्रीय मुद्दा है- चाहे ब्रिटेन हो या भारत. चुनावी माहौल देखना काफ़ी दिलचस्प रहेगा कि लोगों के लिए मुद्दे क्या हैं, उन्हें कौन सी चीज़ें प्रभावित करती हैं, ख़ासकर मुंबई हमलों के बाद
सुखविंदर

भारत से दूर ब्रितानी संस्कृति में रचे बसे ये ब्रितानी नागरिक आख़िर क्यों देखना-समझना चाहते हैं भारतीय चुनाव को?

सुखविंदर कहती हैं कि मुंबई में हुए 26/11 के हमलों ने उन्हें कई चीज़ों के बारे में अपनी सोच बदलने पर मजबूर किया.

वे बताती हैं, "भारत को इस तरह जानने में मेरी रूचि मुंबई में 26/11 की घटना के बाद हुई है. इसने मुझे ये सवाल उठाने पर मजबूर किया कि भारत सरकार सुरक्षा के लिहाज से क्या कर रही है. वहाँ की राजनीति के बारे में भी बहुत कुछ सुन रखा है इसलिए चुनावी माहौल देखना काफ़ी दिलचस्प रहेगा कि लोगों के लिए मुद्दे क्या हैं, उन्हें कौन सी चीज़ें प्रभावित करती हैं, ख़ासकर मुंबई हमलों के बाद."

सुखविंदर कहती हैं, "सुरक्षा आज अंतरराष्ट्रीय मुद्दा है, भारत में भी हमले हुए हैं. मेरे माता-पिता बरसों पहले पंजाब से भारत आए थे. आख़िर हमारे रिश्तेदार रहते हैं वहाँ."

वहीं मनोज लाडवा भारतीय चुनावी पर्व के रंग और रौनक देखना चाहते हैं.

ख़ैर ये तो हुई पर्यटकों की बात लेकिन इस तरह का दौरा आयोजित करने का विचार एंजेंसी के सीईओ विकास को कैसे आया. विकास के पूर्वज 1930 के दशक में गुजरात से कीनिया और फिर ब्रिटेन आए थे.

विकास बताते हैं, "मैं कुछ साल पहले कोलकाता विधानसभा चुनाव के दौरान गया था, कुछ ब्रितानी सांसद भी साथ में थे. हमने वहाँ काफ़ी कुछ सीखा और उस सीख को ब्रिटेन के चुनाव में इस्तेमाल किया गया. हमने पाया कि जो मुद्दे आम लोगों को कोलकाता में प्रभावित कर रहे थे, शायद वही मुद्दे ब्रिटेन में भी आम लोगों के थे जैसे सुरक्षा, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा आदि. भारत इतना बड़ा लोकतंत्र है. मुझे लगा ये देखना दिलचस्प रहेगा कि भारत में संसदीय चुनाव कैसे होते हैं, मुद्दों का हल कैसे निकाला जाता है. वही तरीक़े दूसरे देश में भी इस्मेताल किए जा सकते हैं."

चुनाव को नज़दीक से देखने-समझने का विकास जैसे लोगों के पास एक कारण भी है.

विकास कहते हैं, "मैं ब्रितानी नागरिक हूँ. भारत में प्रॉपर्टी खरीदना चाहता हूँ लेकिन इसके लिए मुझे ये जानना ज़रूरी है कि उस इलाक़े में शासन कैसा है, वहाँ के नेता कैसे होंगे ताकि मेरा निवेश सुरक्षित रहे. इसलिए मेरे जैसे विदेश में रहने वाले लोगों के लिए भारत की राजनीति को समझना ज़रूरी है क्योंकि इससे निवेश पर बड़ा फ़र्क पड़ता है."

यानी सबके पास भारत के चुनावी पर्व को देखने का अलग-अलग मक़सद है.

गर्मी की चिंता नहीं......

सुखविंदर स्वीकार करती हैं कि अब तक तो उन्हें भारतीय राजनीति की कुछ समझ नहीं थी लेकिन दौरे से पहले वे अपना होमवर्क कर रही हैं.

इन दिनों वे भारतीय नेताओं और पार्टियों को समझने की कोशिश में लगी हैं और इस होमवर्क के प्रमाण के तौर पर सुखविंदर ने बातचीत में 1984 के सिख दंगों के कारण कांग्रेस में मची खलबली का ब्यौरा सुनाया.

ये सब लोग ख़ासे उत्साहित हैं क्योंकि लाखों की भीड़ वाली रैलियों के दृश्य इन्होंने केवल फ़िल्मों में ही देखे हैं.

ज़ाहिर है इन लोगों का घूमना-फिरना होगा, चुनावी रंग देखेंगे और कुछ मौज-मस्ती भी करेंगे. लेकिन इन सबसे परे इस चुनावी भ्रमण से क्या सीख या नज़रिया अपने साथ ब्रिटेन वापस लेकर आना चाहते हैं ये लोग?

 भारत में एक चीज़ आप पाएँगे कि वहाँ बड़ी संख्या में लोग राजनीति में रूची लेते हैं. गली नुक्कड़ों पर लोग चर्चा करते मिलेंगे कि मनमोहन सिंह की सरकार कितनी सफल रही, मायावती फ़ैक्टर वगैरह वगैरह लेकिन मुझे लगता है कि ब्रिटेन में एक ख़ास तबके को छोड़कर राजनीति पर इस तरह की चर्चा आम लोगों में नहीं होती. भारतीय चुनावी रैलियों में लाखों लोग आते हैं जबकि ब्रिटेन में 50 लोगों को जमा करना मुश्किल होता है.
विकास पोटा

विकास कहते हैं, "दरअसल भारत में एक चीज़ आप पाएँगे कि वहाँ बड़ी संख्या में लोग राजनीति में रुचि लेते हैं. गली नुक्कड़ों पर लोग चर्चा करते मिलेंगे कि मनमोहन सिंह की सरकार कितनी सफल रही, मायावती फ़ैक्टर वगैरह वगैरह लेकिन मुझे लगता है कि ब्रिटेन में एक ख़ास तबके को छोड़कर राजनीति पर इस तरह की चर्चा आम लोगों में नहीं होती.

हैरानी जताते हुए विकास कहते हैं, "भारतीय चुनावी रैलियों में हज़ारों लोग आते हैं जबकि ब्रिटेन में 50 लोगों को जमा करना मुश्किल होता है, मेरे जैसे लोगों के लिए भारत से ये सब सीखना दिलचस्प रहेगा. "

ये लोग अप्रैल के अंत में चुनाव देखने और घूमने भारत जाएँगे यानी जब गर्मी की तपिश अपना अच्छा-ख़ासा असर दिखाना शुरु कर चुकी होगी. कहीं ये गर्मी उनके उत्साह को ठंडा तो नहीं कर देगी?

ब्रिटेन जैसे ठंडे मुल्क में रहने वाले सुखविंदर और मनोज जैसे लोग कहते हैं कि ये तपिश कुछ परेशान ज़रूर कर सकती है लेकिन अलग-अलग रंगो, साज़ों और आवाज़ों से सजे विश्व के इतने बड़े लोकतंत्र का चुनाव देखने की उत्सुकता ऐसी छोटी-मोटी परेशानियों से कहीं बड़ी है.

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