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बुधवार, 15 अप्रैल, 2009 को 18:24 GMT तक के समाचार
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क्या होगा उत्तर प्रदेश में ?

चुनावी रैली
उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर तिकोनी लड़ाई भी है

पहले चरण का मतदान शुरू होने को बस कुछ ही घंटे बाकी हैं और ढुलमुल मतदाता अब भी हवा का रुख भांपने की कोशिश में हैं ताकि उनका वोट खराब न हो.

उत्तर प्रदेश के पहले चरण में दारोमदार पंडितों और उलेमाओं के हाथ में हैं.

पंडित माया से मायूस हैं तो उलेमा मुलायम से.

उम्मीदवारों ने कपड़ों की तरह फ़टाफ़ट पार्टियाँ बदली हैं. इस पालाबदल से पार्टियों के जमीनी कार्यकर्त्ता भ्रम में हैं.

चुनाव देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी लोक सभा का हो रहा है लेकिन पूरे चुनाव में कोई राष्ट्रीय मुद्दा उभर कर नही आया. मतदाताओं से जहां भी बात करो जातीय या धार्मिक समीकरण पर बहस शुरू हो जाती है.

सीटों के नए परिसीमन ने नए सामाजिक समीकरण बना दिए हैं.

राजनीतिक दलों और पत्रकारों दोनों के लिए आकलन का काम मुश्किल कर दिया है.

महीनों से सुर्खियों में चल रहे आजमगढ़ के मुसलमानों ने नई राह पकड़ ली है. हाल ही में बनी पार्टी उलेमा काउन्सिल ने कह दिया है कि हम अपने ही उम्मीदवारों को वोट देंगे. इसका फायदा अगर बीजेपी को मिलता है तो मिले.

गोरखपुर के एक डाक्टर अयूब की नयी नयी पीस पार्टी ने भी कई सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं.

वैसे तो उलेमा काउन्सिल और पीस पार्टी दोनों ने हिन्दू उम्मीदवार भी उतारे हैं लेकिन इनका असर मुसलामानों पर ज्यादा है.

इसी कारण पहली बार आजमगढ़ से बीजेपी का खाता खुलने की उम्मीद जताई जा रही है.

बसपा ने गोरखपुर और आसपास की तीन सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे हैं.

गोरखपुर और महाराजगंज में बहुजन समाज पार्टी का दलित ब्राह्मण गठजोड़ बीजेपी योगी आदित्यनाथ और पंकज चौधरी के सामाजिक आधार
को बिगाड़ नहीं पाया है और न ही भोजपुरी कलाकार मनोज तिवारी सपा के लिए कोई करिश्मा कर पाई है.

कुशीनगर एक ऐसी सीट है जहाँ कांग्रेस के आरपीएन सिंह बढ़िया कर रहे हैं और माया सरकार के एक प्रमुख मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या को चुनौती दे रहे हैं.

वैसे मौर्या प्रतापगढ़ से चुनाव लड़ने कुशीनगर चुनाव लड़ने आए हैं.

केंद्रीय मंत्री महावीर प्रसाद इस बार बनासगांव में संकट में बताए जाते हैं. और बीजेपी के कमलेश पासवान उन्हें तगड़ी टक्कर दे रहे हैं.

कांग्रेस घोसी और सलेमपुर सीटों पर लड़ाई में है.

मिर्ज़ापुर, भदोही और रॉबर्ट्सगंज में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में मुख्य टक्कर बताई जाती है. लेकिन बसपा ने टिकटों में जो आखिरी मौके पर बदलाव किये उससे उसका नुकसान बताया जाता है.

यह भी कहा जा रहा कि यहां ब्राह्मण समुदाय बहुजन समाज पार्टी से छिटक गया है.

जिन सीटों पर तिकोनी और चार लोगों की है उनके बारे में अनुमान लगाना मुश्किल है लेकिन एक बात जरूर साफ़ है. पिछले विधानसभा
बहुजन समाज पार्टी को दो साल से सत्ता में होने का नुकसान हो रहा है तो समाजवादी पार्टी को मुसलमानों के मोहभंग से नुकसान है.

मध्यमवर्गीय मतदाताओं का रुझान राष्ट्रीय पार्टियों की तरफ बढ़ रहा है लेकिन चूंकि कांग्रेस समाजवादी पार्टी से तालमेल के चले देर तक भ्रम में रही तो वह इसका फ़ायदा नहीं उठा पा रही है, हालांकि मतदाताओं में उसकी छवि इस समय सबसे अच्छी है.

भाजपा की स्थिति में जरूर मामूली सुधार नज़र आ रहा है.

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