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राजस्थान में अफ़ीम बना हुआ है मुद्दा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
साम्यवादी विचारक कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म लोगों के लिए अफ़ीम के समान है लेकिन राजस्थान के लोकसभा चुनावों में धर्म नहीं बल्कि अफ़ीम ही एक मुद्दा बन गया है. राजस्थान के दक्षिण पूर्व के कम से कम सात जिलों में वोटो की गली अफीम के खेतो से होकर गुजरती है. जाहिर है विपक्षी भारतीय जनता पार्टी अफ़ीम उत्पादक किसानों की समस्याओं को जोर शोर से उठा रही तो सतारुढ़ कांग्रेस भी इसमें पीछे नहीं है. दूसरी तरफ़ पश्चिम राजस्थान के मरुस्थली जिलो में सामाजिक कार्यकर्ता अफ़ीम की खेती के विरुद्ध आवाज उठा रहे है क्योंकि अफीम सेवन की लत से हजारों लोग परेशान है. अफीम की खेती का मुद्दा तब उठा जब मध्य प्रदेश से लगे झालावाड़ जिले में भाजपा ने अफीम पैदा करने वाले किसानों की समस्याओं को स्वर दिया और कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों से बड़े पैमाने पर अफीम की खेती के पट्टी या लाइसेंस रद्द हुए है. झालावाड़ भाजपा के लिए बहुत ही प्रतिष्ठा की सीट है क्योंकि वहां से भाजपा सांसद दुष्यंत सिंह फिर से संसद में जाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे है. कांग्रेस ने यहाँ से एक मजबूत उम्मीदवार उर्मिला जैन को मैदान में उतारा है.कांग्रेस ने अफीम खेती के लाइसेंस रद्द होने के लिए पूर्ववर्ती भाजपा सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया है. झालावाड़ और बारां जिले दोनों अफीम की खेती के लिए जाने जाते है और दोनों ही झालावाड़ संसदीय सीट का हिस्सा है. राज्य के सात ज़िलों –भीलवाड़ा, उदयपुर, प्रतापगढ़, बारां, झालावाड़, कोटा और चित्तौड़गढ़ में केंद्र सरकार की अनुमति से अफीम की खेती होती है. उधर पश्चिमी राजस्थान में अफीम की तो कोई खेती नहीं होती. मगर अफीम के सेवन के परंपरा सदियों पुरानी है जिसे रियान कहा जाता है. अफीम नशा मुक्ति के लिए कई सालों से जोधपुर में काम कर रहे राज्य सभा के नामित सदस्य नारायण सिंह माणकलाव कहते है कि अफीम मरुस्थली भू भाग के जन जीवन को बर्बाद कर रही है.वो अब तक कोई एक लाख लोगों को इसके नशे से मुक्ति दिला चुके है पर ये समस्या कम नहीं हो रही है. वो कहते हैं, ‘‘मेरे पास न केवल राजस्थान बल्कि पड़ोसी राज्यों के नशा पीड़ित भी आ रहे है. कुर्सी की ललक ही नेताओं से अफीम उत्पादकों की पैरवी करा रही है क्योंकि अफीम लॉबी के पास पैसा और वोट दोनों है.’’ उधर कोटा भी अफीम के नशे का दंश झेल रहा है. कोटा में नशा मुक्ति का अभियान चला रहे डॉ आर सी शाहनी कहते है, ‘‘अफीम ने एक पूरी पीढी को चपेट में ले रखा है. अनुमान है कि कोई दस हजार लोग कोटा, बूंदी, झालावाड़ और बारां ज़िलों में नशे की गिरफ्त में है. अफीम नशे से मुक्त कराया जा सकता है. मगर अब युवा पीढी स्मैक की चपेट में आ गई है.’’ शाहनी कहते हैं, ‘‘स्मैक छुडाने की कामयाबी की दर महज आठ फीसद है.हमारे अथक प्रयासों के बाद भी केवल आठ फीसद नशे की लती ही इसे छोड़ पाते है.हर रोज बेबस ,माँ बाप आकर कातर कंठ से पुकारते हैं कि उनके बुढापे की लाठी को बचा लो पर बड़ा मुश्किल होता है इस चक्र से निकलना.’’ वे अब तक लगभग तीन हजार लोगों को इस नशे से मुक्ति दिला चुके है. लेकिन वक़्त के साथ नशा करने वालों की संख्या बढ़ रही है. भारत में प्याज़, बाजरा, कपास और लहसुन की खेती तबाह होती है तो नेता बहुत कम शोर मचाते है. मगर अफीम की खेती को छींक भी आ जाए तो सियासत ज़मीन असमान एक कर देती है क्योंकि इसमें वोट है और नोट भी. | इससे जुड़ी ख़बरें वसुंधरा पर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश10 जनवरी, 2009 | भारत और पड़ोस '....तब राजनाथ पैदा भी नहीं हुए थे'08 जनवरी, 2009 | भारत और पड़ोस मधुशाला पर लगेगा ताला28 जनवरी, 2009 | भारत और पड़ोस ऐसी महिलाएँ जो ज़ुल्म के सामने नहीं झुकीं09 मार्च, 2009 | भारत और पड़ोस 'वरुण पर भाजपा की संगत का असर'20 मार्च, 2009 | भारत और पड़ोस राजस्थान में 5.3 तीव्रता के झटके09 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस अजमेर धमाका: शक 'अभिनव भारत' पर14 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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