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ऐसी महिलाएँ जो ज़ुल्म के सामने नहीं झुकीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान की भंवरी भारत की कुछ ऐसी महिलाओं में से हैं जिन्होंने उत्पीड़न सहा पर हिम्मत के साथ संघर्ष किया. भंवरी ने अपने गाँव में बाल-विवाह का विरोध करने के कारण सबका ध्यान आकर्षित किया है. भंवरी को इस विरोध की बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी. उनकी आपबीती पर 'बवंडर' नाम की फ़िल्म भी बनी. उन्हीं की तरह कुछ अन्य महिलाओं ने भी विरोध के बावजूद हिम्मत जुटा कर ऐसे प्रयास किए हैं. अपनी मुक्ति और चेतना के तराने गाती ये वो औरतें हैं जो कामयाबी की यादगार कहानी लिखना चाहती हैं. जयपुर ज़िले की भंवरी औरतों के लिए बदलाव की प्रतीक और प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं. कोई डेढ़ दशक पहले भंवरी ने जयपुर ज़िले में अपने गाँव भतेरी में बाल-विवाह का विरोध किया तो उनके अनुसार उन्हें सामूहिक बलात्कार का शिकार होना पड़ा. भंवरी अतीत में झाँक कर बताती हैं कि उनके संघर्ष से इलाक़े में हालात बदले हैं. भंवरी कहती हैं, ''अब बहुत बदलाव आया है. औरतों में शक्ति का संचार हुआ है. बाल-विवाह की घटनाएँ कम हुई हैं. दहेज प्रथा में भी कमी आई है, मृत्यु भोज पर रोक लगी है. अब कोई भी हमारे इलाक़े में खुले आम बाल-विवाह नहीं करा सकता. लोगों को लगता है कि भंवरी कहीं शिकायत न कर दे." भंवरी कहती हैं "सरकार से मुझे कोई न्याय नहीं मिला, लेकिन भगवान ने मेरी मदद की. मुझे खुशी है की जो बीड़ा मैंने उठाया था मैं उसमें कामयाब रही." भंवरी पर फ़िल्म जगमोहन मुंदरा ने भंवरी की आपबीती पर 'बवंडर' नाम की फ़िल्म बनाई थी. मगर समाज में ऐसी और भी महिलाएँ है जिन्होंने ऐसे हालात का सामना किया है. जयपुर ज़िले की रेखा (नाम बदला हुआ है) अपने साथ हुए कथित सामूहिक बलात्कार के विरुद्ध उठ खड़ी हुईं और दोषियों को सज़ा दिलाकर ही मानीं. दिहाड़ी मज़दूर रेखा एक दलित हैं. उनके साथ दो साल पहले तब सामूहिक बलात्कार हुआ था जब वो अपने बीमार पति के लिए दवा लेने जा रही थीं. पर उन्होंने हालात के सामने हथियार नहीं डाले. रेखा ने कहा "दोषियों को अभी दस-दस साल की सज़ा हुई है. मुझे इस पर तसल्ली है. कम से कम आगे तो किसी और औरत की आबरू पर हाथ नहीं डालेंगे." रेखा ने कहा "वो सभी पैसे वाले थे, मुझ पर दबाव डाला गया कि समझौता कर लो. लाखों रुपए की पेशकश की गई. यहाँ तक की मेरी बिरादरी के लोग और रिश्तेदार भी समझौते के लिए दबाव डालने लगे. पर मैं झुकी नहीं." भरतपुर ज़िले के बैर गाँव की मोहिनी भी दलित है. कोई दस साल पहले गाँव के दबंग लोगों ने उसके पति लक्ष्मण को इतना पीटा कि उसके दोनों पैर काटने पड़े. मोहिनी अब अपने अपाहिज पति की लड़ाई लड़ रही है. मोहिनी ने कहा, "न्याय की मंज़िल अभी बहुत दूर है गांव छोड़ना पड़ा, जयपुर में पनाह ली है. दलित की कौन सुनता है. मुक़दमा अब भी चल रहा है. गवाहों के बयान तक नहीं हुए. मगर हम लड़ेंगे, ये न्याय की बात है." दलित अधिकार कार्यकर्ता पीएल मीमरोथ का मानना है कि औरत के लिए ज़िंदगी मुश्किल है. लेकिन औरत अगर दलित हो तो राह और भी कठिन हो जाती है. मीमरोथ ने कहा "दलित औरत यौन उत्पीड़न की ज़्यादा शिकार होती हैं क्योंकि समाज का एक हिस्सा उन्हें बहुत नीची नज़र से देखता है जैसे दलित औरत की कोई गरिमा ही नहीं है. ऐसे लोगों की मानसिकता है कि दलित औरत का यौन शोषण कोई बुरी बात नही है." | इससे जुड़ी ख़बरें राजस्थान में ज़हरीली शराब से 16 मरे11 दिसंबर, 2008 | भारत और पड़ोस विदेशियों में देशी शादी का चलन08 सितंबर, 2008 | भारत और पड़ोस राजस्थान के खेतोलाई गाँव का दर्द11 मई, 2008 | भारत और पड़ोस भारत में प्राथमिक स्कूल: बीबीसी की विशेष प्रस्तुति26 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस सहेलियों ने रुकवाया बाल विवाह14 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस नाम में बहुत कुछ रखा है जनाब!22 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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