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चुनाव में गठबंधन की दशा और दिशा
नेताओं के मुखौटे
15वीं लोकसभा में भी किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलने की उम्मीद नहीं है

भारत में 15वीं लोकसभा चुनावों की गतिविधियाँ ज़ोरों पर हैं. गठबंधन राजनीति की स्थिति इतनी आश्चर्यजनक है कि पार्टियों के नेता एक गठबंधन में रहते हुए भी दूसरे गठबंधन में शामिल पार्टियों के नेताओं के साथ एक मंच पर आने से हिचकिचा नहीं रहे हैं.

चुनाव के समय और चुनाव के बाद कौनसी पार्टी किस गठबंधन की ओर जा सकती है या इस समय किसके साथ है, इसकी विषय की इस समय केवल पड़ताल की जा सकती है और कयास लगाए जा सकते हैं.

वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में कुल 543 सीटों में से कांग्रेस और भाजपा को कुल मिलाकर 283 सीटें मिली थी. कांग्रेस ने जहाँ 145 सीटें जीती थी, वहीं भाजपा को 138 लोकसभा सीटें मिली थी.

गठबंधनों की स्थिति और पार्टियों के रवैए से टीकाकार अटकलें लगा रहे हैं कि ज़्यादा संभावना ऐसी प्रतीत होती है कि इस बार भी जनादेश खंडित हो सकता है. .

मनमोहन सिंह, राहुल गांधी, सोनिया गांधी
कांग्रेस का सीट बंटवारे पर राजद और सपा जैसे क्षेत्रीय दलों से समझौता नहीं हो सका

संभावना जताई जा रही है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं, जातीय और सांप्रदायिक विभाजन को प्रतिबिंबित करने वाली पार्टियों के गठबंधन को ही फ़ायदा होगा.

कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) और भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ-साथ तीसरा मोर्चा भी मैदान में है.

तीसरा मोर्चा वामपंथी और क्षेत्रीय पार्टियों का समूह है. एक गठबंधन से अलग होने और दूसरे धड़े से जुड़ने का सिलसिला शुरू हो गया है. इसे देखकर लग रहा है कि नतीजों के बाद भी गठबंधन के टूटने-जुड़ने का दौर चलेगा.

कांग्रेस की मुश्किलें

चौदवीं लोकसभा में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए के पास 263 लोकसभा सदस्यों का समर्थन है. इसमें कांग्रेस के 145 सांसद शामिल हैं.

भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने इस संभावना से इनकार नहीं किया है कि इस समय जो पार्टियां यूपीए में शामिल नहीं हैं, चुनाव बाद वो उनसे भी समर्थन ले सकती है.

लेकिन कांग्रेस नेताओं की सबसे बड़ी चिंता अपने पुराने गढ़ उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र में पार्टी की कमज़ोर स्थिति है.

कई राज्यों में जहाँ गठबंधन की क्षेत्रीय पार्टी ज़्यादा ताक़तवर हैं वहाँ क्षेत्रीय दलों ने उसे टिकटों के समझौते के मामले में शर्मिंदा किया है. कांग्रेस को जूनियर सहयोगी के रूप में चुनाव मैदान में उतरना पड़ा है.

बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी ने पहले आपस में 40 में से 37 सीटें बाँट लीं जिससे परेशान होकर कांग्रेस ने सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने का फ़ैसला किया.

कांग्रेस
कांग्रेस को यूपीए घटक राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी के साथ-साथ बाहर से समर्थन देने वाली सपा के हाथों शर्मिंदा होना पड़ा है

हालाँकि लालू यादव और रामविलास पासवान यूपीए में होने का दावा करते हैं लेकिन उन्होंने यूपीए से अलग समाजवादी पार्टी से हाथ मिलाने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच उत्तर प्रदेश में सीटों के बटवारे पर सहमति नहीं बन पाई है.

वर्ष 2004 में चुनाव के बाद यूपीए को सबसे बड़ा समर्थन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व में वामपंथी पार्टियों का था.

वामपंथी पार्टियों ने 59 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी और यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दिया था. लेकिन इन पार्टियों ने भारत-अमरीका परमाणु समझौते के मुद्दे पर वर्ष 2008 में सरकार से समर्थन वापस ले लिया.

ये वामपंथी पार्टियां अब तीसरे मोर्चे का हिस्सा हैं. ये मोर्चा धर्मनिरपेक्ष और क्षेत्रीय पार्टियों का समूह है.

महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे पर कांग्रेस ज़रूर संतुष्ट हो सकती है.

यूपीए का भविष्य इन चुनावों में कांग्रेस पार्टी के केरल, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल में प्रदर्शन और सपा, राजद और एनसीपी के अपने-अपने गढ़ में अच्छे प्रदर्शनों पर निर्भर करेगा.

भाजपा भी मुश्किल में

भाजपा
भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का नेतृत्व कर रही है

भारतीय जनता पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव में 138 सीटें जीती थी. जो कि सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी से महज़ सात सीटें कम हैं.

भाजपा की मुश्किलें बढ़ी हैं. उसके प्रमुख घटक दलों ने या तो गठबंधन छोड़ दिया है या फिर गंभीरतापूर्वक दूसरे विकल्पों पर विचार कर रहे हैं.

उड़ीसा में बीजू जनता दल (बीजेडी) एनडीए का साथ छोड़ चुका है. बीजेडी के पास मौजूदा लोक सभा में 11 सीटें हैं. किसी समय भाजपा के साथ रही तेलुगुदेशम पार्टी भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से बाहर है और तीसरे मोर्चे में है.

ममता बनर्जी भी एनडीए से दूर हट कर कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुकी है. एनडीए की संभावनाएँ तभी बनेंगी अगर गुजरात, मध्य प्रदेश, झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में उसका प्रदर्शन अच्छा रहता है.

अजित सिंह की अगुवाई वाला राष्ट्रीय लोक दल और असम गणपरिषद एनडीए के साथ जुड़े हैं, लेकिन अगर वो पिछली बार से कुछ ज़्यादा सीटें जीत भी लें, तब भी कोई बड़ा फ़र्क़ नहीं पडेगा.

तीसरा मोर्चा

इस मोर्चे की अहम घटक वामपंथी पार्टियां हैं. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पास मौजूदा लोकसभा में 43 सीटें हैं, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के पास 10 सीटें.

दूसरा सबसे बड़ा घटक बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का है जिसके पास 14वीं लोकसभा के आख़िरी सत्र में 19 सांसद थे. बसपा की ओर से मायावती के प्रतिनिधि तीसरे मोर्चे की रैली में शामिल हुए थे और जयललिता के प्रतिनिधि भी इसी तरह शामिल हुए थे.

लेकिन ये स्पष्ट नहीं है कि लोकसभा चुनावों के बाद बसपा और अन्नाद्रमुक तीसरे मोर्चे में शामिल होते हैं या किसी अन्य गठबंधन का रुख़ करते हैं.

तेलुगुदेशम पार्टी ने खुलकर तीसरे मोर्चे की हिमायत की है. तेलंगाना राष्ट्रीय समिति और बीजू जनता दल जैसी पार्टियों की स्थिति और वे किस गठबंधन उनके भी लोकसभा चुनाव के बाद स्पष्ट होगी ऐसी हैं भी अपना पिछला प्रदर्शन सुधार सकती हैं.

संभावित तीसरा मोर्चा
तीसरे मोर्चे में वामपंथी दलों के साथ कई दूसरे दल भी हैं

तीसरा मोर्चा उन सभी दलों के लिए शरणस्थली बन सकता है जो पार्टियां एनडीए और यूपीए में ख़ुद को ठगा हुआ महसूस करती रही हैं.

अगर कांग्रेस और भाजपा के विश्वासपात्र सहयोगी बहुमत के जादुई आंकड़े 272 को हासिल करने में नाकाम रहते हैं तो ऐसे हालात में तीसरा मोर्चा सामने आ सकता है, जो वामपंथियों और जाति आधारित राजनीतिक दलों का अनूठा संगम है.

तो संभावना ये है कि धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों का समूह तीसरा मोर्चा कांग्रेस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का समर्थन करेगा और अगर अगर कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद ख़राब रहा तो तीसरा मोर्चा कांग्रेस समर्थित सरकार बनाने के लिए अपना दबाव बढ़ा सकता है.

इस लेख के शोध में सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डवलपिंग सोसाइटी के विपुल मुदगल ने सहयोग दिया है.

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