सआदत मर जाए, मंटो ज़िंदा रहे

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- Author, चिरंतना भट्ट
- पदनाम, मुंबई से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
“मैं सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी. मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश नहीं करता, क्योंकि यह मेरा काम नहीं, दर्ज़ियों का काम है.”
सआदत हसन मंटो ने समाज और समय की फ़ॉल्टलाइन्स को उधेड़ने का जो काम किया था, वह भारत के बँटवारे के इतने साल बाद भी उतनी ही सीधी आंखों से सवाल करता है. भारत में भी और पाकिस्तान में भी.
दक्षिण एशिया के सबसे बड़े और बेबाक कहानीकार (बकौल सर सलमान रुश्दी) की अहमियत इस बात से पता चलती है कि पिछले साल पाकिस्तान में मंटो पर फ़िल्म बनी और अब नंदिता दास की फ़िल्म आने वाली है.
उनकी कहानियों पर, उनकी ज़िंदगी के अलग-अलग पहलुओं पर नाटक, टीवी धारावाहिक और फ़िल्में बनी तो हैं, पर इस समय उस मंटो के पास लौटने की ज़रूरत ज़्यादा है, जब सरकार, सियासत और मज़हब इंसानियत के उन सवालों के सीधे जवाब नहीं दे पा रहे.
मंटो ने ख़ुद के बारे में यह कहा, “ऐसा होना मुमकिन है कि सआदत हसन मर जाए और मंटो ज़िंदा रहे.” एक फ़िल्म बॉम्बे की है, जहां मंटो रहे और एक उस काल्पनिक पागलखाने की, जहां मंटो का होना एक सवाल की तरह गूंजता है. जिसकी कहानियां विभाजन की क्रूर मनुष्यता का सबसे बड़ा हलफ़नामा बनीं, अब उस कहानीकार की तलाश हो रही है, कुछ सच में, कुछ कल्पनाओं में.
नंदिता दास की फ़िल्म में नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी उस मंटो का किरदार निभा रहे हैं, जो पाकिस्तान जाने से पहले तब के बॉम्बे (अब की मुम्बई) में एक फ़िल्म राइटर था. वे निकलीं तो उनकी कहानियों पर काम करने थीं, पर फिर पाया कि मंटो की ज़िंदगी भी कम दिलचस्प नहीं.

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पाकिस्तान में ये काम सरमद सुल्तान खूसट ने पिछले साल किया. वही इसके निर्देशक और मुख्य अभिनेता भी हैं.
सरमद ने बीबीसी हिंदी को बताया, “मंटो पर फ़िल्म क्यों, इस सवाल के जवाब में मैं पहले तो यही पूछता हूँ कि क्यों नहीं..? बदनसीबी से हमारे मुल्क में हमारे हीरो को इज़्ज़त देने की रवायत कुछ कम ही रही है. उर्दू साहित्य में मंटो हमेशा सिरे पर रहे, जिसकी वजह सिर्फ़ पॉपुलेरिटी नहीं थी, बल्कि वे कहानियां जो कह रही हैं, वह रही. मैंने उन्हीं की कहानियों से ही बँटवारे को जाना और समझा.”
अचानक मंटो की बात इस दशक में फिर ऐसे चलने लगी है, जैसे किरदारों ने अपने कहानीकार से कह दिया हो, “भई तुमने जो कुछ हमसे कहलवाया था, वो तो आज भी वैसे का वैसा ही है. चलो इन्हें हम याद दिला दें कि हमने उन्हें पहले ही ख़बरदार किया था.”
आकार पटेल ने मंटो के ग़ैर कहानी गद्य का अंग्रेज़ी अनुवाद किया है. मंटो की प्रासंगिकता को लेकर वे दो मायने रखते हैं. पहला ये कि वह एक अमृतसरी थे जो बंबई आए और तब्दील हुए. उन्होंने जान लिया था कि बंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री का सेक्युलर ढांचा और शहर का आज़ाद माहौल बाक़ी भारत से न सिर्फ़ बहुत अलग है बल्कि ज़रूरी भी. वह बंबई में बहुत रहे फिर भी उन्हें भारत में बहुत भरोसा था.
भारत में क़ौमी एकता होने पर वह एक बहुत ही कामयाब मुल्क बनने की ताक़त रखता है, ऐसा उनका मानना था. लेकिन ऐसा करने में हम नाकाम रहे. दूसरा ये कि मंटो मानते थे कि पाकिस्तान, एक ऐसा देश जो मज़हब की बुनियाद पर बना, वहां मुश्किलातों का दौर बना रहेगा. मंटो ने तभी बता दिया था कि कैसे पाकिस्तान अपने लिए एक बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी करने जा रहा है. उनके बताए हुए दोनों सच आज दोनों देशों के लोग अपने-अपने तरीक़ों से मंज़ूर करते हैं.”
पंजाब के समराला, लुधियाना में पैदा हुए मंटो अमृतसर में रहे और पिता की मृत्यु के बाद पत्रकारिता में अपना करियर बनाने बंबई आ गए. मंटो को ‘बॉम्बे’ बेहद पसंद था. बँटवारे के चलते उन्हें पाकिस्तान जाना पड़ा लेकिन ये दरारें उन्हें रास नहीं आईं.

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यही वजह थी कि बंबई और लाहौर के मंटो एक ही शख्स होने के बावजूद अलग हैं, बिल्कुल रतौल आम की तरह, दोनों मुल्कों के अपने-अपने मंटो हैं. दोनों तरफ़ कोशिशें हैं कि उस शख़्स को उसके परे जाकर देख सकें, जो वह लिखकर पीछे छोड़ गया था. 43 साल की इस ज़िंदगी ने हमें 22 कहानी संग्रह, एक नॉवेल, तीन निबंध संग्रह, कुछ रेडियो नाटक, फ़िल्मों की स्क्रिप्ट्स और आपबीती के दो संग्रह दिए. मंटो एक ऐसा अंगारा हैं, जिनकी गर्मी आज भी जला देती है.
नंदिता ने बीबीसी हिंदी को बताया, ‘‘वह एक संजीदा इंसान है जिसमें कई भाव हैं. वह चालाक है, ग़ुस्से वाले हैं, मज़ाक करते हैं, डरे हुए हैं और ऐसे में उन्हें पर्दे पर ज़िंदा करने के लिए एक ऐसे शख्स की ज़रूरत थी, जो इतनी शख्सियतों को जी सके.’’
मंटो पर छह बार अश्लीलता का आरोप लगा- तीन बार ब्रिटिश राज के दौरान और तीन बार आज़ादी के बाद. ऐसे खुराफ़ाती लेखक पर फ़िल्म बनाने के लिए क्या दिखाया जाए और क्या छिपाया जाए, इस सवाल के जवाब में सरमद बताते हैं, “मंटो ने जो भी लिखा, पढ़ने के लिए लिखा. उनकी कहानियां भी मेरी फ़िल्म का अहम हिस्सा हैं, जो काफ़ी बोल्ड भी हैं. उनके लिखे को तस्वीरों और आवाज़ों में ढालना आसान नहीं. लेकिन मैं और मेरे जैसे कई लोग जो 70-80 के दशक में पाकिस्तान में जन्मे और बड़े हुए, उनके लिए सेंसर तो जैसे ज़िंदगी का हिस्सा था. मैं तो कहूँगा कि यही इनबिल्ट सेंसर मेरे काम आया. बतौर निर्देशक मेरी ज़िम्मेदारी थी कि अगर लफ़्ज़ नंगा लिखा है, तो मैं उसे नंगा दिखाऊं, यह ज़रूरी नहीं. आप उसे कैसे स्क्रीन पर लाते हैं, वह ज़्यादा अहमियत रखता है. मंटो के लिखे पर तो सेंसरशिप से लेकर अश्लीलता के केस हुए, पर मंटो पर बनी फ़िल्म सेंसर बोर्ड में से बिना कट्स के पास हो गई और लोगों तक पहुँची. मैंने मंटो के फ़्लेवर से कोई समझौता नहीं किया.”

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मंटो की ज़िंदगी पर अब फ़िल्में बन रही हैं लेकिन एक वक़्त वो भी था जब वह ख़ुद बंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री में पैर जमाने की कोशिश में थे, लेकिन कभी कामयाब नहीं हुए. आकार बताते हैं, “उन्होंने कभी कोई हिट फ़िल्म नहीं लिखी. इंडस्ट्री की भाषा में कहें तो वह फ़्लॉप थे, लेकिन बड़े से बड़े सितारे उनके दोस्त थे. आज ऐसी कल्पना भी नहीं हो सकती. क्या शाहरूख ख़ान जैसा सुपरस्टार किसी नाकामयाब इंसान के साथ वक़्त गुज़ारेगा? लेकिन मंटो का सेंस ऑफ़ ह्यूमर और शॉर्ट स्टोरीज़ लिखने में उनकी प्रतिभा के चलते अशोक कुमार जैसे बड़े सितारे उनके दोस्त हुआ करते थे. उनके लिए मंटो का फ़िल्म लेखक के तौर पर सफल होना मायने नहीं रखता था.” उनका मानना है कि “मंटो जिन सालों में मुंबई में थे, उन सालों में शायद पॉप्युलर सेंटीमेंट्स पर कभी लिख नहीं पाते. उनकी लिखी हुई स्क्रिप्ट्स में से बनी फ़िल्मों में से एक भी सफल या पॉप्युलर नहीं है.”
पाकिस्तानी अभिनेत्री निमरा बुचा ने फ़िल्म में मंटो की हमज़ाद का किरदार निभाया है. मंटो को उनकी अपनी ज़िंदगी में काफ़ी दूर रखा गया, “हम जब बड़े हो रहे थे तब मुल्क में सेंसर कड़ा था. हमारी स्कूलिंग पाकिस्तान के अंग्रेज़ी प्राइवेट स्कूलों में हुई, जहां उर्दू साहित्य कम ही पढ़ाया जाता था, और उसमें मंटो को तो कतई जगह न मिलती. ऐसा वक्त़ था कि किसी के हाथ में मंटो की किताब दिख जाती, तो चर्चे हो जाते. लोग मंटो को अश्लीलता से जोड़ते थे. बड़े होने के बाद मंटो को पढ़ा, छिप-छिपकर थिएटर में देखा तब पता चला कि बँटवारे का दर्द क्या था. मैं मानती हूँ कि मंटो हर स्कूल के सिलेबस में पढ़ाया जाना चाहिए. मंटो हमें जो इतिहास बताते हैं, वो हमें शायद पसंद न आए पर आख़िर वह हमारा हिस्सा है, हमारा इतिहास है. तो बेहतर होगा कि हम उसे मंज़ूर कर लें. मैं खुश हूँ कि इस फ़िल्म के ज़रिए हम मेनस्ट्रीम में मंटो को वापस चर्चा में लेकर आए हैं. ऐसा और होना चाहिए.”
14 शब्दों की इस कहानी में मंटो का दर्द चीख़ता है, “मरा नहीं यार, देखो अभी जान बाक़ी है. रहने दो यार, थक गया हूँ.” मंटो कभी बंबई से जाना नहीं चाहते थे, लेकिन उनके सभी मुसलमान दोस्त पाकिस्तान चले गए थे. उनके साथ काम करने वाले लोग उनका विरोध कर रहे थे. बँटवारे के बाद एक शाम वह अपने एक हिंदू दोस्त के साथ बैठे थे और उनके दोस्त ने कुछ ऐसा कहा, “अगर हम दोस्त नहीं होते तो मैंने तुम्हें मार दिया होता” और मंटो दूसरे ही दिन अपनी बेगम सफ़िया और बेटियों को लेकर लाहौर चल पड़े.
आकार बताते हैं, “मंटो को हैरानी इस बात की थी कि लोग बँटवारे का मतलब क्यों नहीं समझ रहे, क्यों किसी को सद दिखाई नहीं दे रहा. बँटवारे के समय जो हिंसा हुई, वह सालों तक मुल्कों के साथ ही रहेगी, उसे कोई भूलेगा नहीं.”

बँटवारे ने मंटो की लिखावट भी बदल दी. बरसात में भीगी हुई घाटन की बू में खोए हुए नौजवान के बजाय उनकी कहानी में लाश से संभोग करने वाला ईशरसिंह दिखाई देने लगा. बंबई छोड़कर पाकिस्तान जाने के बाद मंटो की कहानियों से रोमांस ग़ायब होने लगा. उनकी कहानियों में तक़लीफ के थक्के साफ़ दिखने लगे.
आकार बताते हैं, “जो रोमांस उनकी कहानी ‘बू’ में था, वह फिर देखने को नहीं मिला. उन्होंने ऐसे हिंसक विषयों पर लिखा जिनको शायद उन्होंने लेखक के तौर पर पहले कभी नहीं छुआ था. जैसे-जैसे वक़्त बीतता गया, पाकिस्तान में बसे मंटो के लेख-कहानियां और छोटे होते गए. वह अपने मुद्दे का मर्म रख देते और बाक़ी सिरों को बुनना वह ज़रूरी नहीं समझते.”
अली सेठी ने ‘मंटो’ फ़िल्म में मंटो के पसंदीदा शायर ग़ालिब की ग़ज़ल ‘आह को चाहिए..’ को संगीत और आवाज़ दी है. वे एक लेखक के अलावा गायक और संगीतकार भी हैं.
वे कहते हैं, “मंटो ने जो लिखा उससे साफ़ पता चलता है कि जैसे वह पहले से ही जानते थे कि पाकिस्तान का क्या हाल होगा. उन्होंने बंबई से लाहौर आते वक़्त जो अनुभव किए, सुने-देखे, वो उनके ज़हन में बहुत बड़ा घाव देते गए. बंबई में उनके सारे मुसलमान दोस्त उन्हें छोड़कर चले गए थे. उनका माहौल बिखर गया जिसका सदमा उनके लिए बड़ा था. बंबई में वह जिस स्टूडियो में काम करते थे, वहां के हिंदू कर्मचारियों ने मंटो को निकालने के लिए मैनेजमेंट को ख़त लिखे थे. जब वह पाकिस्तान पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि कहीं लक्ष्मी की मूर्ति तोड़ी जा रही है और वहां क़ुरान का कल्मा लिखा जा रहा है. मंटो को हैरत इस बात की थी कि लोग दोनों मुल्कों में सियासत के सामने सवाल करने से डरते थे. मंटो चुपचाप देखने वालों में से नहीं थे.”
फ़िल्म के बारे में वह कहते हैं, “हमें उसी दौर का संगीत चाहिए था और पहले भी यह ग़ज़ल कई दिग्गजों ने गाई है, तो हम उसे अलग तरीक़े से ही पेश करना चाहते थे. हमने केएल सहगल के गीत से एक सुर उठाकर इसे कम्पोज़ किया है.’’
अली सेठी मंटो के बाग़ी तेवरों को उनके बचपन के अनुभवों से जोड़ते हैं. मंटो के पिता बहुत सख़्त थे. बैरिस्टर पिता की दूसरी पत्नी से हुए बेटे मंटो अपनी माँ से बेहद प्यार करते थे. वह अपने सौतेले भाईयों से राब्ता रखना चाहते थे, लेकिन ऐसा हो नहीं सका.

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अली कहते हैं, “मंटो की कहानियां लोगों को तब पसंद नहीं आईं थीं लेकिन उन सभी में जो कड़वा सच था वो आज भी हम पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश में कट्टरपंथियों की वजह से हो रही अराजकता में दिखलाई देता है. लोग तो वही थे, जो एक ही मुल्क के हिस्से थे. मंटो का मानना था कि बँटवारे ने इंसान के सबसे स्याह और बुरे हिस्सों को बाहर लाकर रख दिया, जो कौम के दंगों में साफ़ दिखाई देता था.”
‘‘अगर मंटो पाकिस्तान न जाते और हिंदुस्तान में ही रह जाते तो हमें 1947 के बाद उनसे जो कहानियां मिलीं, वो न मिलतीं.’’ आकार आगे कहते हैं, “उन्हें बंबई छोड़ना ही नहीं था लेकिन भिंडी बाज़ार, माहीम, भायकला में जिस तरह के दंगे हुए उसके बाद उनके लिए यहां रहना मुमकिन नहीं था. अगर वह गए न होते तो हम उस अफ़सानानिगार से वाकिफ़ न हो पाते. जिस तरह उन्होंने बँटवारे के बारे में लिखा है, ऐसा लिखने की हिम्मत आज तक किसी लेखक की नहीं हुई. कहानी ज़रूर कुछ और होती. वह फ़िल्म इंडस्ट्री में सफल हो गए होते. हां, लेकिन बँटवारे की कड़वाहट तो फिर भी रहती. बँटवारे ने उनकी कहानियों की चंचलता को संजीदगी में बदल दिया.”
एक लेखक के बतौर आकार पटेल कहानियों के अलावा काम से बहुत प्रभावित नहीं हैं. “ख़ासकर नॉन-फ़िक्शन लेखन को लेकर मैं कहूँगा, जैसे वह जल्दी में लिखा गया. हां, फ़िक्शन लेखक के तौर पर वे बेहतरीन हैं. उनकी कहानियों में जिस तरह मर्द-औरत के रिश्तों को बुना गया, ख़ासकर शारीरिकता को, वह उन्हें दुनिया के सबसे उम्दा लेखकों की श्रेणी में ले आता है.”
‘नंगी आवाज़ें’ ,’काली सलवार’, ‘शिकारी औरतें’, ’सरकंडों के पीछे’, ‘दो क़ौमें’, ‘लायसेंस’ जैसी कई कहानियां हैं, जहां मंटो ने औरत-मर्द के रिश्तों को अलग पृष्ठभूमि पर रखा. मंटो की कहानियों के औरत-मर्द के संबंधों को सरमद ने अपनी फ़िल्म का हिस्सा बनाया है. मंटो की पत्नी सफ़िया के अलवा सरमद की फ़िल्म में मंटो की प्रसिद्ध कहानियां ‘खोल दो’, ‘ठंडा गोश्त’, ‘ऊपर नीचे दरमियां’, ‘हतक’, ‘टोबा टेक सिंह’, ‘मदारी’, ‘पेशावर से लाहौर तक’ के पात्र भी शामिल हैं.

सरमद कहते हैं, “मंटो को उनकी कहानियों से अलग करना मुमकिन ही नहीं. बँटवारे के बाद लिखी गई कहानियां फ़िल्म का हिस्सा हैं क्योंकि उनके किरदार वह बात कह देते हैं जो मैं मंटो के किरदार से नहीं कहलवा सकता. फ़िल्म के संवाद भी उनके आत्मकथानक शैली के लेखों-क़िस्सों से लिए गए हैं. मंटो के लिए सब इंसान थे. कोई हिंदू-मुसलमान या सिख कतई नहीं था. ‘खोल दो’, ‘ठंडा गोश्त’ और ‘टोबा टेक सिंह’ की बात करें, तो एक कहानी में मुसलमान पात्र हैं तो बाक़ी में हिंदू और सिख हैं. उनकी कहानियों को फ़िल्म में रखने का एक कारण था कि इससे मंटो का प्लूरलिस्टिक कथानक स्पष्ट होता है. एक क़ौम ज़ालिम और दूसरी मासूम, ऐसा वह नहीं मानते थे.”
‘हमज़ाद’ का किरदार मंटो का ऑल्टर ईगो है, जो हर उस समय प्रकट होता है, जब मंटो कहानियां लिख रहे होते हैं. निमरा बुचा अपने पात्र ‘हमज़ाद’ के बारे में बताती हैं, “फ़िल्म के क्लाइमेक्स में लेखक मेंटल असाइलम में है और दूसरे पागलों को बता रहे हैं कि कैसे हम सबके भीतर एक हमज़ाद है जिसे अगर हमने क़ैद न किया तो वह हमें क़ैद कर लेगी. मंटो जब लाहौर आए तब बँटवारे के बाद के वर्षों में हमज़ाद उन पर हावी है. ज़ख्मी और दुःखी मंटो पर उनके ऑल्टर ईगो ने जैसे क़ब्ज़ा कर लिया. मैं हमज़ाद के पात्र से यह जान पाई कि एक क्रियेटिव व्यक्ति के लिए उसके दोनों पहलू ज़रूरी होते हैं, लेकिन अगर संतुलन नहीं होगा तो वही उसे ख़त्म भी कर सकता है.”
‘हमज़ाद’ के पात्र को लेकर सरमद बताते हैं, “शाहिद नसीम के नाटक ‘कौन है ये गुस्ताख़?’ के ज़रिए मैंने हमज़ाद को जब जाना तो लगा कि यह तो फ़िल्म का हिस्सा ज़रूर बनेगा क्योंकि मैं मानता हूँ कि हर इंसान में दोनों जेंडर के हिस्से होते हैं. मंटो ने अपनी क्रिएटिविटी का सेहरा अपने अंदर रहे स्त्री वाले हिस्से को दिया था.”
मंटो की तुलना फ्रेंच लेखक मोपांसा से की जाती है. इस तुलना को लेकर आकार कहते हैं, “नायपॉल ने मशहूर लेखक मोपासां के बारे में कहा था कि ऐसे क़िस्से-कहानियां जहां ज़्यादा लिखने की संभावना न हो, उसमें भी पात्रों और उस कहानी की स्थिति को लेकर वह काफ़ी कुछ कह देते थे. मंटो के लेखन में भी यह बात है. उनके आख़िरी सालों में उन्होंने कुछ बातें तो सिर्फ दो-चार लाइनों में लिखीं. हां, यह ज़रूर है कि मंटो के उस लेखन को समझने के लिए आपको इतिहास पता होना चाहिए.”

ख़ुदाबख़्श जो सुल्ताना के लिए काली सलवार लाता है, रणधीर जो पीपल के पेड़ तले खड़ी घाटन की बू को याद कर रहा है, सुगंधी जो माधो के मनीऑर्डर पर जी रही है, ख़ून करने के बाद सुकून से सोने वाली वेश्या और हिम्मत ख़ान की नवाब का गोश्त बावर्चीख़ाने में पकाने दे आई शाहीना या सरहदों पर अपनी ज़मीन ढूंढने वाला टोबा टेक सिंह जैसे किरदारों से लेकर ‘लाउडस्पीकर’ में बोलती बंबई की यादें आज भी झकझोरती हैं.
जिस मंटो पर आज दो मुल्कों में फ़िल्में बन रही हैं, उनका ख़्याल था कि वह कभी कामयाब नहीं होंगे. ‘मंटो’ फ़िल्म में एक संवाद है जिसमें वे अपनी बीवी सफ़िया को कहते हैं, “मैं आग बेचता हूँ सफ़िया आग. उसकी चिंगारियां दूसरों की राख में नहीं झोंक सकता.”
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