'मदर टेरेसा संत बनाए जाने के काबिल हैं?'

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भारत में गरीब और बेसहारा लोगों की मसीहा मानी जाने वाली मदर टेरेसा को रविवार को वेटिकन में एक खास समारोह में संत की उपाधि दे दी गई.

जहां उन्हें कई लोग तो भगवान का रूप मानते हैं, वहीं उनके आलोचक भी कम नहीं है.

डॉक्टर अरूप चटर्जी उनके एक जाने-माने आलोचकों में से एक हैं. वो आरोप लगाते हैं कि मदर टेरेसा ने जो किया उसे बहुत बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया है. वो उन पर कोलकाता की छवि को धूल में मिला देने का आरोप लगाते हैं.

अरूप चटर्जी ने मदर टेरेसा और उनकी संस्था के काम पर काफ़ी समय तक अनेक लोगों को इंटरव्यू किया और फिर एक किताब भी लिखी थी. उन्होंने हाल में बीबीसी को दिए इंटरव्यू में अपने आरोप दोहराए हैं. पढ़ें, अरूप चटर्जी की कही बातें, उन्हीं की ज़ुबानी-

"मुझे नहीं लगता कि उन्हें संत की उपाधि दी जानी चाहिए. उन्हें जो भी सम्मान दिया जा रहा है वो सच नहीं बल्कि मिथकों पर आधारित है.

लोग मानने लगे थे कि वो जो बोलती हैं उसे कमतर कर के बताती हैं.

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नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद तो मदर टेरेसा की छवि ऐसी बन गई कि वो जो बताती थीं, लोग उसे बढ़ा-चढ़ा कर मान लेते थे.

उन्होंने कहा कि उनके आश्रम में रोज़ 9,000 लोगों को खाना खिलाया जाता है, तो लोगों ने मान लिया कि 90,000 लोगों को वो खाना खिलाती होंगी. किसी ने कभी आ कर नहीं देखा कि कहीं रोज़ केवल 200-250 लोगों को ही तो भोजन नहीं मिल रहा?

उन्होंने कहा कि वो कोलकाता की गलियों से बेसहारा लोगों को उठाकर अपने आश्रम ले आती हैं और उनकी सेवा करती हैं.

सच तो ये है कि वो कभी कोलकाता की सड़कों-गलियों में गरीबों से मिलने नहीं गईं. उनकी सहायक नन भी बहुत कम बाहर निकलतीं थीं. उनके पास एंबुलेंस तक नहीं था जिसमें वे गरीबों, अनाथ लोगों को उठाकर लातीं.

हमें सोचना पड़ेगा कि क्या ये महिला संत बनाए जाने के काबिल हैं? क्योंकि उनकी कथनी और करनी में अंतर है.

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जो महिला शादी में भी गर्भनिरोधक के इस्तेमाल का विरोध करती है, क्या वो पूजनीय है? वो गैंगरेप के बाद भी किसी महिला के गर्भ गिराए जाने का विरोध करती रहीं, वो क्यों पूजनीय हैं? उन्होंने बच्चों का शोषण करने वाले सज़ा प्राप्त व्यक्ति (पीडोफाइल) का समर्थन किया था, वो क्या पूजनीय हैं?

यदि आप कोलकाता में गरीब, रोगियों और बूढ़ों की सेवा के लिए बने आश्रम में जाएंगे, तो पाएंगे कि वहां कहीं कोई प्राइवेसी नहीं है.

जो लोग यहां रहते हैं, वो नंबर से पहचाने जाते हैं. उनके सोने के लिए बिस्तर नहीं, कुछ स्ट्रेचर जैसे हैं. उन्हें अपने हिंदू भगवान या मुस्लिम ईश्वर या आइकन की तस्वीर रखने की इजाज़त नहीं है.

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महिलाओं को गंजा कर दिया गया था. हम इसे तथाकथित आश्रम ही कह सकते हैं.

आप वहां जाएंगे तो जानेंगे कि वो जगह रहने लायक नहीं है.

मुझे समझ नहीं आता कि पिछले 15-16 सालों में इन आश्रमों में दुनिया भर से लोग इतनी बड़ी संख्या में क्यों आ रहे हैं?

कोलकाता के बारे में लोगों की राय ये बन गई है कि ये शहर अपने यहां बसने वाले गरीबों और बेघरों का पालन नहीं करता. लेकिन भारत के दूसरे शहरों में गरीबों के लिए जितनी सुविधाएं है, जो मैं मानता हूं कि ठीक नहीं है- यहां (कोलकाता में) भी उनके लिए वैसी ही सुविधाएं हैं.

लेकिन मदर टेरेसा ने कोलकाता का नाम इस्तेमाल किया और उन्होंने कोलकाता की छवि खराब कर दी.

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टेरेसा को उम्मीद और शांति का दूत माना जाता है. लेकिन 1.2 करोड़ की आबादी वाले शहर में उनकी संस्था की मात्र 98 जगहें हैं. इसी से आपको पता चल जाता है कि वो पूरे शहर का नहीं बल्कि कुछ ही लोगों का ध्यान रख रही थीं.

वो तो बस अपना नाम चमकाना चाहती थीं और कैथलिक चर्च के मकसद को बढ़ाना चाहती थीं.

वो तो एक बेहद रूढ़िवादी तरह के कैथलिक चर्च के संदेश का प्रचार करना चाहती थीं, जिसके अनुसार दुनिया भर से गर्भ निरोधक और गर्भपात जैसी धारणा को पूरी तरह खत्म कर दिया जाना चाहिए.

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मैं उन्हें एजेंट नहीं कहूंगा, वो मात्र एक कर्मचारी थीं. भारतीय उनके विरोध में नहीं थे, उनके साथ खड़े होना चाहते थे. वो पश्चिम की थीं और उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था तो भारतीयों को उनके साथ रहने में गौरव का अनुभव होता था.

लोगों को लगता है कि वो अपनी सारी ज़िंदगी कोलकाता में रही थीं. लेकिन ऐसा नहीं है. अपने जीवन के आखिरी 20 साल वो अमरीका और यूरोप में बिताती थीं. केवल सर्दियों में वो अधिकतर 6 महीनों के लिए भारत में होती थीं.

उनके नाम के साथ जुड़ना कोलकाता का दुर्भाग्य ही है क्योंकि उन्हें 'गटर का संत' कहा गया. इसमें गटर तो कोलकाता था.

पोलैंड, अमरीका, इटली, स्पेन में कई शहर हैं जो उनके नाम से जुड़ना चाहेंगे, वो मदर टेरेसा का नाम ले सकते हैं.

उनका नाम लोगों को, व्यवसाय और पर्यटकों को कोलकाता से दूर ही करेगा. उनके नाम के साथ जुड़ कर इस शहर ने करोड़ों रूपये गंवाए हैं.

क्योंकि उनके कारण ऐसा माना जाने लगा है कि इस शहर में कोढ़ी, भिखारी और बेघर भरे पड़े हैं. वूडी ऐलन ने एक बार कहा कोलकाता में 10,000 अनजान बिमारियां हैं, अमरीका में लोग आम तौर पर यह मानने भी लगे थे.

मदर टेरेसा

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दुनिया के किसी और शहर ने इतना नहीं झेला है जितना कोलकाता ने, वो भी एक विदेशी अलबानियाई नन से जुड़ने के कारण.

मैं पूछना चाहता हूं कि दुनिया के हर कोने से मीडिया और लोग किसी भी काले जादू या अंधविश्वास पर कैसे भरोसा कर सकते हैं?

ये वेटिकन की ग़लती नहीं, वो ऐसा करते हैं और यही उनके मूल्य हैं. वेटिकन को उन लोगों का सम्मान करना चाहिए जो उनके लिए बढ़िया काम करते हैं और मदर टेरेसा वेटिकन के अच्छे कार्यकर्ताओं में से थीं. वो बढ़िया सेल्सपर्सन थीं.

लेकिन जब पूरा मीडिया इस आयोजन का हिस्सा बन जाता है तो सही नहीं लगता. मीडिया कैसे इस जादू के उत्सव का हिस्सा बन सकता है?"

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