ट्यूमर ठीक कर संत बनीं मदर टेरेसा
भारत में ग़रीबों के लिए काम करने वाली नन मदर टेरेसा को वेटिकन में हुए एक समारोह में संत की उपाधि दी गई.
रविवार को वेटिकन के सेंट पीटर स्क्वायर में पोप फ्रांसिस ने उन्हें संत की उपाधि दी.
इस मौक़े पर वहां हुए विशेष कार्यक्रम में दसियों हज़ार लोग मौजूद थे. भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी कार्यक्रम में शरीक होने के लिए ख़ास तौर से वेटिकन गए हैं.
1997 में मदर टेरेसा का निधन हो गया था. लेकिन मदर टेरेसा के नाम से दो बीमारियों के चमत्कारिक ढंग से ठीक होने के बाद वेटिकन ने उन्हें संत बनाने का रास्ता साफ़ कर दिया था.
संत का दर्जा पाने के लिए कम से कम दो चमत्कार करना ज़रुरी है.

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वेटिकन के अनुसार साल 2002 में मदर टेरेसा से प्रार्थना करने के बाद एक भारतीय महिला मोनिका बेसरा के पेट का ट्यूमर चमत्कारिक ढंग से ठीक हो गया था.
इसी तरह वेटिकन ने टेरेसा से जुड़े एक और चमत्कार की पुष्टि की थी.
2008 में ब्राज़ील की एक महिला का ब्रेन ट्यूमर ठीक हो गया.
इसे पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा के दूसरे चमत्कार के रूप में मान्यता दे दी. इसके बाद अगले साल यानी साल 2009 में उन्हें संत बनाए जाने का रास्ता साफ़ हो गया था.
मदर टेरेसा को 2003 में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने धन्य घोषित किया था जो संत बनाए जाने की प्रक्रिया का पहला चरण है.
मदर टेरेसा को कोलकाता की झुग्गी बस्तियों में उनके काम के लिए शांति के नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था.
उनका निधन 87 साल की उम्र में हुआ था. उन्होंने 1950 में मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी की शुरुआत की थी.

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कोलकाता में इस मौक़े पर मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी में उत्सव का माहौल है.
मदर टेरेसा के मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी से दुनिया भर की तीन हज़ार से ज़्यादा नन जुड़ी हुई हैं.
कुष्ठ रोगियों की बस्तियां, ग़रीबों के लिए रसोई, स्कूल, आश्रम, अनाथ बच्चों के लिए घर आदि ऐसी सेवाएं हैं जो मदर टेरेसा ने शुरू की थी.

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हालांकि उन्हें आलोचना का भी शिकार होना पड़ा. उन पर उनकी मिशनरीज़ की ओर से चलाए जाने वाले अस्पतालों में सफ़ाई व्यवस्था ख़राब होने के आरोप लगे.
उन पर चैरिटी वर्क के लिए पैसा लेने के भी आरोप लगाए गए.
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