'शरीयत पर अमल न होना है असली समस्या'

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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट को दिए एक हलफ़नामे में कहा है कि समाज सुधार के नाम पर पर्सनल लॉ में बदलाव नहीं किया जा सकता है.
बोर्ड के अनुसार यह इस्लाम और भारतीय संविधान के ख़िलाफ़ है.
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने एक केस की सुनवाई के दौरान सवाल किया था कि इस्लाम के अनुसार अगर कोई चार शादियां कर सकता है तो फिर दूसरी शादी के लिए तीन तलाक़ देने की क्या ज़रूरत है?
सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ को चुनौती देने वाली याचिका पर बोर्ड समेत केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया था. इस नोटिस में बोर्ड ने निर्देश दिया था कि इस याचिका को ऐसी ही अन्य याचिकाओं के साथ टैग किया जाए.

बोर्ड ने अपने जवाब में कहा है कि, 'समाज सुधार के नाम पर मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता और तीन तलाक़ की वैधता सुप्रीम कोर्ट तय नहीं कर सकता.'
हलफ़नामे में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक़ को चुनौती देने को असंवैधानिक क़रार दिया है. बोर्ड का कहना है कि उसके क़ानून क़ुरान और इस्लाम के पैग़म्बर के उपदेशों के आधार पर तैयार किए गए हैं.
बीबीसी के उर्दू संवाददाता शकील अख़्तर के अनुसार, ''ज़बानी तलाक़़, यानी तीन बार तलाक़ कहकर तलाक़ देने और दूसरे विवाह के लिए पहली पत्नी छोड़ने जैसे सवाल भारत के मुस्लिम समाज की एक बड़ी समस्या बने हुए हैं. भारत में मुसलमानों के शादी और तलाक़ जैसे मामले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बनाए हुए वर्षों पुराने क़ानूनों के तहत तय किए जाते हैं.''
बोर्ड के प्रवक्ता डॉ सैयद क़ासिम रसूल इलियास का कहना है, "दिक़्क़त क़ानून में नहीं है. यह क़ानून न तो सामंतवादी दौर के हैं ना पुराने हैं. ये क़ुरान और सुन्नत की बुनियाद पर बनाए गए हैं. असल में दिक़्क़त इनको लागू करने की है."

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बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य डॉ सैयद क़ासिम रसूल इलियास ने बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से इस मसले पर हुई बातचीत में बताया कि, ''शरीयत यह चाहती है कि कोई तलाक़ न हो. शादी ख़त्म न हो. लेकिन अगर कोई तलाक़ लेने पर ही तुला हुआ है तो शरीयत यह कहती कि एक बार में एक तलाक़ दें. लेकिन कोई आदमी तीनों विकल्पों का इस्तेमाल कर लेता है तो हनफ़ी मसलक या इस्लाम के चारों स्कूल आॅफ़ थॉट मानते है कि तलाक़ हो गया. देखिए असली मसला मुसलमानों को शिक्षित करने का है. कर्इ् इस्लामी देशों में अगर कोई आदमी इस तरह से तलाक़ दे देता है तो उसको सज़ा मिलती है. तो अगर सज़ा देने को लेकर कोई नियम बनाने की बात है तो हम उसपर सोच सकते हैं. हम यह मानते है कि यह मुस्लिम समाज का मसला है.''
इलियास के मुताबिक़ ''इस मसले को हल करने के लिए हमारे यहां इस्लाह-ए-मआशरा(समाज सुधार) के नाम से पूरी मुहिम चलाई जा रही है. इसमें लोगों को इस बारे में शिक्षित और जागरूक किया जा रहा है कि शरीयत क्या चाहती है. अगर शादी हुई है तो उसको बनाए रखना चाहिए. शादी ख़त्म नहीं करनी चाहिए. लेकिन किसी सूरत में अगर इसे ख़त्म करना पड़े तो उस हालत में एक तलाक़ देकर मामला ख़त्म करना चाहिए. एक तलाक़ देने के बाद यह विकल्प बचा रहता है कि आप उसके साथ में दुबारा ज़िंदगी गुज़ार सकते हैं. दो बार तलाक़ पर आप दुबारा शादी कर सकते हैं. तीन बार पर सब कुछ ख़त्म हो जाता है. असल समस्या है कि शरीयत पर अमल नहीं हो रहा है.''
पश्चिम बंगाल की रहनेवाली इशरत ने याचिका दाख़िल कर तीन तलाक़, निकाह हलाला और बहुविवाह को अंसवैधानिक और मुस्लिम महिलाओँ के गौरवपूर्ण जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन बताया है. सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़, निकाह हलाला और बहुविवाह को ग़ैर-क़ानूनी और असंवैधानिक बताने वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था.
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