पत्नी की लाश या समाज की बेहिसी का बोझ?

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    • Author, शकील अख़्तर
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता

पिछले दिनों भारतीय अख़बारों ने ओडिशा के एक ग़रीब आदिवासी दाना मांझी की एक ऐसी तस्वीर छापी जो काफ़ी समय तक मन और विवेक को झकझोरती रहेगी.

दाना मांझी अपने कंधे पर अपनी पत्नी की लाश उठाए हुए लगभग बारह किलो मीटर तक पैदल चले. मांझी की पत्नी का टीबी से देहान्त हो गया था और उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह शव घर ले जाने के लिए एक एंबुलेंस का प्रबंध कर पाते.

मांझी ने कहा कि अस्पताल ने उनकी मदद करने से इंकार कर दिया था और उनके पास बस यही एक चारा था कि वह अपनी पत्नी की लाश को ख़ुद ही उठा कर अपने गांव लेकर जाएं जो काफ़ी दूरी पर था.

टीवी चैनलों पर दाना मांझी को एक चादर में लिपटी हुई लाश को अपने कंधों पर लेकर चलते हुए दिखाए जाने का दृश्य बेहद दर्दनाक था. यह भारतीय समाज की उदासीनता को दिखाता है जो काफ़ी चिंताजनक है.

भारत की कम से कम एक तिहाई आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन गुज़ार रही है. इनमें अधिकांश आबादी दलित और आदिवासियों की है जो देश की आबादी का एक चौथाई हिस्सा हैं.

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भारत की सामाजिक व्यवस्था का सबसे मज़बूत पहलू यह है कि यह एक लोकतंत्र है और इसका सबसे कमज़ोर पहलू यह है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी देश की राजनीति और संसाधन एक विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग की गिरफ़्त में है.

भारत के विशेषाधिकार प्राप्त राजनीतिक वर्ग ने एक ऐसी व्यवस्था तैयार की है जिसका देश का ग़रीब और कमज़ोर वर्ग हिस्सा नहीं बन सका है.

ग़रीब वर्ग ज़मीन और प्राकृतिक संसाधनों पर अपना मालिकाना हक़ पहले ही खो चुका है.

देश की न्याय प्रणाली ऐसी बनाई गई है कि देश की बहुमत न्याय तक पहुँच नहीं सकती. चिकित्सा सुविधाएं इतनी महंगी हैं और संसाधन इतने कम है कि देश की एक बड़ी आबादी इलाज न हो पाने के कारण छोटी बीमारियों से मौत का शिकार हो जाती है. जबकि उनका जीवन मात्र कुछ सौ रुपये में बचाई जा सकती है.

भारत के विशेषाधिकार प्राप्त राजनीतिक वर्ग ने एक ऐसा समाज बनाया है जिसमें ग़रीब और कमज़ोर के लिए सोचने की जगह सीमित होती जा रही है.

यह एक ऐसा समाज है जहाँ अधिकांश लोगों की सोच सिर्फ़ ख़ुद तक सीमित है. दूसरों के बारे में सोचने और उनकी फ़िक्र करने की प्रवृति यहां कम मिलती हैं.

अजीत सिंह

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इमेज कैप्शन, दाना मांझी की कहानी दुनिया के सामने लाने वाले ओटीवी के पत्रकार अजीत सिंह.

इंसानी रिश्तों का निर्धारण आपसी हित, जाति और धार्मिक आधार पर होता है. भारत का विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग सबसे उदासीन है.

दाना मांझी की तस्वीर देखकर किसी ने टिप्पणी करते हुए लिखा है कि ऐसा लगता है कि जैसे भारतीय गणराज्य ने ग़रीबो के ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी हो.

मांझी अपनी पत्नी की लाश नहीं भारतीय लोकतंत्र और समाज की बेहिसी का बोझ अपने कमज़ोर कंधों पर उठाए हुए थे.

मांझी की पत्नी को चंद रुपयों में बचाया जा सकता था. समाज ने जीवन से ही नहीं, इस ग़रीब को मौत के बाद भी इज्ज़त से महरूम रखा.

यह तस्वीर बहुत लंबे समय तक मानवता की अंतरात्मा को झकझोरती रहेगी. भारतीय समाज में भले ही कोई फर्क न पड़े लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र दाना मांझी के सामने हमेशा शर्मसार रहेगा.

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