वो जिसने दाना की कहानी दुनिया को बताई

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- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पत्नी के शव को कंधों पर 12 किलोमीटर तक लेकर पैदल चलने वाले दाना मांझी की कहानी दुनिया को मालूम नहीं होती अगर टीवी रिपोर्टर अजीत सिंह ने इसे शूट नहीं किया होता.
अजीत सिंह के लिए 'वो समय बड़ा विदारक था' हालांकि कालाहांडी के इस मार्मिक कहानी को शूट करने वाले ओडिशा टीवी के रिपोर्टर की ख़ूब आलोचना भी हो रही है.
लोग कह रहे हैं कि 32 साल के अजीत ने मांझी की मदद नहीं की बल्कि उसका फ़ायदा उठाया मांझी की कहानी रिकार्ड कर.
लेकिन अजीत के लिए ये अनुभव कैसा था?
अजीत कहते हैं, “मुझे कालाहांडी अस्पताल के एक सूत्र ने बताया कि एक आदमी अपनी पत्नी के शव को लेकर पैदल अपने गांव जा रहा है. जन्माष्टमी का दिन था और फ़ोन सुबह पांच बजे आया. मैंने पता किया कि वो किस ओर जा रहा है और मैं शागड़ा गांव वाली सड़क पर तेज़ी से बाइक से निकल पड़ा.”
मांझी अजीत को शागड़ा गांव के पास नज़र आ गए. सुबह सात बज रहे थे. कालाहांडी अस्पताल के टीबी वार्ड से शागड़ा गांव क़रीब 12-13 किलोमीटर दूर है.

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अजीत कहते हैं, “मैंने मांझी से पूरी बात पूछी. उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी की मौत रात में 2 बजे हो गई थी और अस्पताल वाले बार बार शव ले जाने को कह रहे थे. लेकिन उनके पास महज़ 200-250 रुपये ही थे. उन्हें कोई एंबुलेंस नहीं मिल पाई तो वे अपनी पत्नी के शव को किसी तरह ले जाने की कोशिश कर रहे हैं.”
अजीत ने मांझी के लिए एंबुलेंस की कोशिश शुरू कर दी. सबसे पहले जिला अधिकारी बृंदा डी को फ़ोन कर.
जिलाधिकारी ने उनसे क्या कहा, “उन्हें कहा कि सीडीएमओ से एंबुलेंस का प्रबंधन करने को कहती हूं.”
कालाहांडी की जिलाधिकारी बृंदा डी बताती हैं, "अजीत का फ़ोन आया था. इसके बाद कुछ स्थानीय लोगों के भी फ़ोन आए. मैंने अस्पताल के अधिकारी, सीडीएमओ को एंबुलेस की व्यवस्था कराने को कहा भी."
सीडीएमओ ने एडीएमओ को एंबुलेंस की व्यवस्था करने को कहा और अजीत से कहा गया कि कोशिश हो रही है.
लेकिन इन सबमें वक्त लग रहा था और दिन चढ़ने लगा था, मांझी की 12 साल की बेटी चौला का सुबकना जारी था.
अजीत ने लांजीगढ़ के स्थानीय विधायक बलभद्र मांझी को भी फ़ोन किया, वे भुवनेश्वर में थे. उन्होंने अपना आदमी भेजने की बात कही.
मगर अंत में अजीत ने एक स्थानीय संस्था से मदद मांगी.
और उन लोगों को बताया कि दाना का घर क़रीब 60 किलोमीटर दूर है. जिसके बाद एंबुलेंस उपलब्ध हो पाई.

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एंबुलेंस की मदद से ही दाना की पत्नी का शव मेलाघर गांव पहुंच पाया.
लेकिन क्या अजीत को एहसास था कि ये कहानी देश भर को झकझोर देगी?
वो कहते हैं, “मुझे दाना मांझी के लिए अच्छा नहीं लग रहा था. हमारे इलाके में बहुत गरीबी है. मैं उसकी मदद करना चाहता था. लेकिन काफी कोशिश करने के बाद भी दो घंटे में जब सिस्टम से कोई मदद नहीं मिली, तो मुझे लगा कि कहानी करनी चाहिए. मुझे उस वक्त ये बिलकुल एहसास नहीं हुआ था कि ये इतनी बड़ी बन जाएगी.”
अजीत कहते हैं 14 साल की पत्रकारिता के सफ़र में मुझे न तो ऐसी कहानी पहले कभी मिली, ना दिखी और ना ही कभी सुना था.
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