कैसे बदलता गया बिरयानी का रंग-रूप?

बिरयानी

इमेज स्रोत, thinkstock

    • Author, पुष्पेश पंत
    • पदनाम, इतिहासकार और भारतीय खानों के विशेषज्ञ

भारत विविधताओं का देश है. खाने के मामले में भी अलग-अलग स्वाद के पकवान बनाने का रिवाज़ रहा है.

इन्हीं ख़ास पकवानों में से एक है बिरयानी, जो पूरे भारत में बड़े चाव से खाई जाती है.

इतिहासकार और खाने के विशेषज्ञ पुष्पेश पंत मानते हैं कि भारत में बिरयानी को राजसी खाने का दर्ज़ा हासिल है. इसकी खुशबू बेमिसाल है. ये अपने आप में एक संपूर्ण खाना है.

400 साल पुराना हैदराबाद शहर केवल चारमीनार के लिए ही नहीं बल्कि हैदराबादी बिरयानी के लिए भी काफी मशहूर है.

पेटू भारत

भले ही बिरयानी एक स्वदेशी खाना बन चुका है लेकिन इसके बावजूद लोग पूछते हैं, "ये कहां से भारत आई और कब आई?"

कुछ जानकार इसे भारत की देन मानते हैं. उनका दावा है कि मध्य एशिया के पुलाव को भारतीयों ने बिरयानी की शक्ल दी. पर इसे मानना ज़रा मुश्किल है.

पुलाव और बिरयानी दो अलग चीज़े हैं. उनका स्वाद भी जुदा है.

इसमें कोई संशय नहीं कि बिरयानी ईरान से आई है. यहां तक कि बिरयानी नाम मूल रूप से फारसी शब्द 'बिरिंज बिरियान' से निकला है. इसका मतलब है भूना हुआ चावल.

बिरयानी

इमेज स्रोत, Thinkstock

ईरान में बिरयानी को देग यानी हांडी में दम यानी धीमी आंच पर पकाया जाता है.

धीमी आंच पर काफी देर तक मसालों में लिपटे मांस को उसके अपने ही रस में पकने के लिए छोड़ दिया जाता है. इसमें चावल की परतें होती हैं और सुगंधित मसालें भी होते हैं.

भारत में इस्लामिक खानों की विशेषज्ञा सलमा हुसैन बताती हैं कि समकालीन ईरान में सड़कों पर बिकने वाले बिरयानी में अब चावल का इस्तेमाल नहीं होता.

अब इसकी जगह पर मांस के टुकड़ों को रुमाली रोटी में लपेटकर पकाया जाने लगा है.

बिरयानी

इमेज स्रोत, thinkstock

लेकिन ये पकवान दरअसल भारत में विकसित हुआ जहां इसका रंगीन और विविध इतिहास है.

इसका कोई सबूत नहीं हैं कि बिरयानी पहली बार भारत में मुगलों के साथ आई.

ज्यादा संभावना है कि ये तीर्थयात्रियों और राजवंश के सैनिकों-नेताओं के साथ दक्षिण भारत आया.

काफी बाद में जाकर यह पकवान अलग-अलग जगहों पर पहुंचा, जहां के स्थानीय स्वाद इसमें जुड़ते गए.

केरल को ही ले लीजिए, यहां मालाबार या मोपला बिरयानी मिलती है.

बिरयानी

इमेज स्रोत, thinkstock

कई बार तो मांस या चिकन की जगह मछली या झींगे तक का इस्तेमाल बिरयानी में होता है.

यहां मसाले तेज़ होते हैं. लेकिन इसमें पड़ने वाली सामग्री से हैदराबादी खुशबू ज़रूर आती है.

पश्चिम बंगाल में मिलने वाली बिरयानी, बांग्लादेश की राजधानी ढाका में मिलने वाली बिरयानी के स्वाद से प्रेरित है. यह भी बहुत लोकप्रिय है.

ये सोचना ग़लत नहीं होगा कि इस बंदरगाह शहर में बिरयानी समुद्र के रास्ते आई जहां कभी नवाबों का शासन हुआ करता था.

पश्चिमी तट के किनारे पकने वाले सौम्य 'बोहरी बिरयान' के ढेरों दीवाने हैं.

वहीं भोपाल में बिरयानी शायद दुरानी अफ़ग़ानों के साथ आई, जो कभी अहमद शाह अब्दाली की सेना का हिस्सा रहे थे.

बिरयानी

इमेज स्रोत, thinkstock

भोपाल की बिरयानी काफी दमदार होती है. ये ज्यादा सुगंधित और तृप्त करने वाली होती है.

इसके अलावा मुरादाबादी बिरयानी अचानक से राजधानी दिल्ली में काफी बिकने लगी है.

राजस्थानी बिरयानी का सबसे अच्छा उदाहरण है देग. यह लोकप्रिय अजमेर शरीफ़ के गरीब नवाज़ की दरगाह में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पकाया जाता है.

लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि लोग अब भी बिरयानी के असली स्वाद से अनजान हैं.

ज्यादातर जगहों पर मिलने वाली बिरयानी को केवल 'फ्राइंग पैन बिरयानी' की संज्ञा दी जा सकती है.

यहां लंबे दानों वाले चावल तो होते हैं और उसमें पड़ने वाले केसर से उसका रंग पीला भी हो सकता है, लेकिन असली बिरयानी से ये बहुत अलग है.

बड़े होटलों या अच्छे खाने के रेस्तरां में भी इसे पारंपरिक पद्धति से नहीं पकाया जाता है. इसके बजाए इन लोगों ने 'दम की बिरयानी' को विकसित किया है.

हम कितनी आसानी से भूल जाते हैं कि ईरान हमारे देश के कितने करीब है और केवल फारसी भाषा दोनों देशों की साझी विरासत का हिस्सा नहीं है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक कर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link> सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)