बीगल कुत्तों को मिला नया जीवन

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बैंगलुरु से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

बैंगलुरु में पशुओं के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था कंपैशन अनलिमिटेड प्लस एक्शन (सीयूपीए) ने पिछले दिनों 200 से ज़्यादा बीगल कुत्तों को प्रयोगशालाओं से मुक्त कराया.

अपनी तरह की इस अनोखी कोशिश के बाद इन कुत्तों को 'होटल फॉर डॉग्स' में रखा गया है. इस संस्था ने आम लोगों से बीगल कुत्तों को अपनाने की अपील की है.

बीगल कुत्ते

इमेज स्रोत, Eshna Benegal

कानूनी प्रक्रिया को अगर छोड़ दें, तो इस संस्था से कुत्ते एडॉप्ट करने के लिए आपको उतनी ही कोशिश करनी पड़ती है, जितनी किसी बच्चे को गोद लेते वक्त करनी होती है.

संस्था से जुड़े वॉलेंटियर इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि आप कुत्ते को रखने और उसे संभालने के योग्य हैं. तभी जाकर कुत्ता आपको मिलता है.

इसके बावजूद ज़्यादातर कुत्तों को आम लोगों ने हाथों हाथ गोद लिया.

दरअसल, कृषि उत्पाद कंपनियां और दवा कंपनियां अपनी दवाओं, मेकअप के सामान और कीटनाशकों के जांच के लिए इन कुत्तों का इस्तेमाल करती थीं.

बीगल कुत्ते

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इन बीगल कुत्तों में से कोई बच्चा नहीं है. ये दो से चार साल की उम्र के हैं. कुछ की उम्र छह से आठ साल है.

सीयूपीए से जुड़ी चिंतना गोविंद ने बीबीसी को बताया कि कई बार इन परीक्षणों के कारण कुत्तों पर मानसिक और भावनात्मक आघात पहुंचता है.

होटल फॉर डॉग्स के टीए अधीश्वर कहते हैं, "उन्हें चार से पांच स्क्वेयर फीट के छोटे बक्सों में कैद कर, अंधेरे में रखा जाता है. टेस्ट करने के लिए उन्हें बाहर निकाला जाता है और फिर बक्सों में वापस भेज दिया जाता है. उनकी स्वर नली को भी काट दिया जाता है, ताकि वो भौंक न पाएं."

यही कारण है कि इन कुत्तों के चेहरे पर इतनी मायूसी छाई रहती है. कुछ तो भौंक नहीं सकते और जो भौंक सकते हैं, वो केवल चिल्लाते हैं. कुछ के चेहरों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती, तो कुछ अपनी खुशी का इज़हार केवल अपनी पूंछ को हिलाकर करते हैं.

होटल फॉर डॉग्स

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ये सभी कुत्ते एक ही दवा कंपनी से रिहा कराए गए हैं, जो संकेत है कि देश में रिसर्च के लिए किस तरह से कुत्तों का इस्तेमाल हो रहा है.

इस कमिटी फॉर पर्पस ऑफ कंट्रोल एंड सुपरविज़न ऑफ एक्सपेरिमेंट्स ऑन एनिमल्स (सीपीसीएसईए) की पूर्व सदस्य डॉक्टर शीरानी परेरा कहती हैं, "देश में 14-15 कंपनियों के कुत्तों पर प्रयोग की संख्या अलग-अलग है. सालाना ये तीन हज़ार से चार हज़ार के बीच होता है. कइयों के पास तो 400-500 बीगल्स के लिए डॉग हाउस हैं."

अगस्त 2015 में जाकर सीपीसीएसईए एक ऐसे सुझाव को पारित कर पाई जिसे डॉक्टर परेरा ने तीन साल पहले दिया था.

बीगल कुत्ते

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इसके मुताबिक़ किसी भी जानवर का प्रयोग तीन साल से ज्यादा वक्त के लिए नहीं किया जा सकता. इसके बाद कुत्ते को पुनर्वास के लिए देना होगा.

डॉ परेरा कहती हैं, "कुत्तों पर हज़ारों परीक्षण किए जाते थे जबतक कि वो दर्द या पीड़ा से मर नहीं जाते थे." डॉक्टर परेरा चेन्नई स्थित पीपल फॉर एनिमल्स की भी सह-संस्थापक हैं.

भारत के पशु कल्याण बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ चिनी कृष्णा कहते हैं कि ऐसा होने का एक मात्र कारण है कि देश में अब भी कानून है कि कतरने वाली या गैर-कतरने वाली प्रजातियों पर दवाओं या कीटनाशकों के विषैलेपन का परीक्षण अनिवार्य है.

बीगल कुत्ते

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गैर-कतरने वाली प्रजातियों में अक्सर कुत्तों पर ही ये प्रयोग होते हैं.

डॉ कृष्णा कहते हैं, "बीगल के आज्ञाकारी स्वभाव के कारण ही अक्सर इस नस्ल के कुत्तों पर प्रयोग होते हैं. कई सालों से हम इस क़ानून के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं.लेकिन इसे अमली जामा पहनाने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी है."

डॉ. परेरा के मुताबिक़ यह तब हो रहा है जब लगातार शोध निष्कर्षों से यह पता चल रहा है कि चूहों की तुलना में कुत्तों पर किए जाने वाले प्रयोगों से हमें महज दो फ़ीसद अतिरिक्त जानकारी मिलती है.

हालांकि इन कुत्तों को जब लैब से मुक्त कराया जाता है तो ये आज़ाद तो हो जाते हैं लेकिन सामान्य होने में इन्हें काफी वक्त लगता है.

बीगल कुत्ते

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डॉक्टर कृष्णा कहते हैं, "प्रयोगशालाओं के बीगल का पुनर्वास तो मानो नामुमकिन ही है."

गोविंद ने ख़ुद भी एक बीगल को गोद लिया है, वो कहती हैं, "कइयों को सीढ़ियां भी चढ़नी नहीं आती. टॉयलेट ट्रेनिंग के साथ आपको या घर के किसी दूसरे कुत्ते को उन्हें सीढ़ियां चढ़ना भी सिखाना पड़ेगा."

वो कहती हैं, "वो आपकी डांट को नहीं समझ पाते या वो आपके पास नहीं आते जब आप उन्हें बुलाते हैं. आपके अचानक हाथ हिलाने से भी वो कई बार घबरा जाते हैं. इंसान और कुत्तों के बीच के ख़ूबसूरत रिश्ते से वो पूरी तरह अनजान हैं."

बीगल कुत्ते

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इसलिए सीयूपीए के स्वयंसेवक इन कुत्तों के लिए परिवार ढूंढने में बहुत मेहनत करते हैं. वो चाहते हैं कि जो भी परिवार इन कुत्तों को गोद ले वो इनके प्रति बेहद संवेदनशील हों और उन्हें बेहतर तरीके से समझ सकें.

ये ठीक उसी तरह है जिस तरह से कोई संस्थान किसी छोटे बच्चे को गोद देने से पहले गोद लेने वाले परिवार से ममता और समझदारी की उम्मीद रखता है.

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