उड़ता पंजाब के बाद बदलेगा सेंसर बोर्ड?

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- Author, सुशांत मोहन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई
फ़िल्म 'उड़ता पंजाब' की रिलीज़ को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद भले ही केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की किरकिरी हुई है लेकिन इस फ़ैसले के बाद भी उसकी कार्यशैली में कोई ख़ासा बदलाव होगा, ये कहना मुश्किल है.
भारत में केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड को लेकर अक्सर ‘सेंसर बोर्ड’ कहा जाता है लेकिन हाई कोर्ट ने ‘उड़ता पंजाब’ विवाद के दौरान साफ़ किया कि वो फ़िल्म को रोकने या काटने छांटने वाला ‘सेंसर बोर्ड’ नहीं, बल्कि सिर्फ़ प्रमाण पत्र देने वाली संस्था हैं.
अदालत ने अपने फ़ैसले में साफ़ किया कि बोर्ड को बदलते वक़्त के साथ अपनी सोच और रवैया बदलने की ज़रूरत है और कुछ चीज़ें दर्शकों के विवेक पर भी छोड़ दी जानी चाहिए.

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अदालत के इस फ़ैसले के बाद फ़िल्म इंडस्ट्री के दिग्गजों का मानना था कि अब सेंसर बोर्ड के काम करने का तरीक़ा बदलेगा और यह सिर्फ़ इस बात का प्रमाणपत्र देगा कि फ़िल्म को किस दर्शक वर्ग को दिखाया जाए.
फिल्म प्रमाणनन बोर्ड 'उड़ता पंजाब' में कई कट चाहता था, लेकिन अदालत ने एक कट के साथ फिल्म को रिलीज करने का फ़ैसला सुनाया.
दिग्गज फ़िल्म निर्माता-निर्देशक श्याम बेनेगल केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की कार्यशैली में सुधार लाने के लिए बनी समिति के सदस्य हैं.
श्याम बेनेगल ने बीबीसी को बताया, “बोर्ड को समय के साथ बदलने की ज़रूरत है. समाज में समस्याएं हैं तो वो दिखाई जानी चाहिए. फ़िल्मों को रोक देना कोई समाधान नहीं होता है.”
फ़िल्म निर्देशको की संस्था आईएफ़टीडीए ने भी कहा था कि कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद अब निर्देशकों को फ़िल्में रिलीज़ करने में आसानी होगी. वो इस बात से उत्साहित हैं कि अदालत ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को सिर्फ़ फ़िल्मों को प्रमाणित करने का काम दिया है.
लेकिन अभिनेता नवाज़ुद्दीन की फिल्म ‘हरामख़ोर’ पर सेंसर बोर्ड की आपत्तियों से इशारा मिलता है कि ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ शायद रातों रात नहीं बदलेगा.

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'हरामखोर' 14 वर्षीय बच्ची और उसके ट्यूटर के बीच पनपे प्यार की कहानी है, जिसके बारे में बोर्ड ने कहा है कि इसे रिलीज़ नहीं होने दिया जा सकता.
'उड़ता पंजाब' के निर्माता अनुराग कश्यप कहते हैं कि 'हरामखोर' के निर्माताओं को भी ट्राब्यूनल के सामने जाना चाहिए, हालांकि इस फिल्म की निर्माता गुनीत मोंगा कह चुकी हैं कि उनके पास कोर्ट में केस लड़ने के पैसे नहीं हैं.
बोर्ड के रुख़ पर अभिनेता इरफ़ान ने बीबीसी से कहा, “ग़लती उनकी भी नहीं है क्योंकि अंग्रेज़ों के समय से चले आ रहे इस बोर्ड के नियम और क़ानून भी थोड़े पुराने हैं और ऐसे में नई चीज़ों से वो उलझ जाते हैं. इस विवाद को सुलझाने का एकमात्र तरीक़ा है कि वो अपने नियमों को एक बार रिवाइज़ करें जैसे वो फ़िल्मों को करते हैं.”
इस बीच केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने 'उड़ता पंजाब' को लेकर अदालत के फ़ैसले को मान लिया है.
बोर्ड के सीईओ अनुराग श्रीवास्तव कहते हैं, “फ़ैसला आ गया है और हम इसका सम्मान करते हैं, यह ग़लत सही की बात नहीं, नज़रिए की बात है और जो अदालत ने कहा है वही होगा.”
अनुराग कश्यप की फ़िल्म 'उड़ता पंजाब' को तो उड़ने की आज़ादी मिल गई है लेकिन नवाज़ुद्दीन वाली ‘हरामख़ोर’ का क्या होगा, ये सेंसर बोर्ड ही बताएगा.
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