'मेरा भी दिल टूटा है, मुझे भी काम नहीं मिला'

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- Author, नंदिता दास
- पदनाम, फ़िल्म अभिनेत्री
हाल ही में मुंबई में एक जानी मानी टीवी अभिनेत्री प्रत्युषा बैनर्जी ने आत्महत्या कर ली.
प्रत्युषा की मौत की वजह अभी भी स्पष्ट नहीं है और न ही मैं इस बारे में ज़्यादा जानती हूं, लेकिन पैसे और काम की तंगी को भी इसकी एक वजह माना जा रहा है.
ग्लैमर इंडस्ट्री में काम की कमी, हमेशा खुश रहने का दबाव और सबसे अच्छा दिखने की होड़, कलाकारों पर एक ख़ास दबाव पैदा कर देता है.
अभिनेत्रियों पर यह दबाव और ज़्यादा होता है.
प्रत्युषा अकेली नहीं है, पिछले साल दीपिका पादुकोण के भी अवसाद में रहने की बात सामने आई थी.
इस इंडस्ट्री में कई लोग हैं, जिन्हें मैंने डिप्रेस होते देखा है.
मैं भी ऐसे समय से गुज़री हूं, जब मुझे लगा कि मुझे जीवित नहीं रहना चाहिए. मेरा भी दिल टूटा है, मुझे भी काम नहीं मिला है.

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लेकिन मैंने ज़िंदगी का एक ही उसूल माना है कि आज जो चीज़ बहुत दुःख दे रही है, पांच दिन, पांच हफ़्ते या पांच साल के बाद उतना दुःख नहीं देगी.
यही आजकल के युवाओं को समझने की ज़रूरत है, क्योंकि भारत में हम तय नहीं कर पा रहे हैं कि हम मॉर्डन रहें या ट्रेडिशनल ही रहें.
हम अंग्रेज़ी बोलकर और जींस पहनकर, ख़ुद को मॉर्डन मान लेते हैं, लेकिन लोग क्या कहेंगे, हमें इसकी भी चिंता होती है.
आज भी एक लड़की को पूरी तरह औरत बनने के लिए शादी करके मां बनना ज़रूरी है.
यही सोच है, जो हमारे युवा समाज को फिर वहीं ला देती है, जहां से निकल आने की हम बाते करते हैं.
शादी करना ठीक है, मैंने भी की है, लेकिन क्यों एक लड़की किसी बच्चे को गोद लेकर नहीं रह सकती? क्यों समाज में उसके बारे में बातें होने लग जाती हैं?
युवा लोगों के पास ऐसे दोस्त क्यों नहीं हैं, जिनसे वो अपने मन की बात कर सकें और अपनी परेशानियां बांट सकें?

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लोग क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, यह तो शेयर हो रहा है, लेकिन उनके मन में क्या अवसाद है, इस पर कोई बात क्यों नहीं कर रहा है?
मैं एक कॉलेज में पढ़ाने गई, वहां एक लड़की ने मुझसे पूछा कि जब मैं जींस पहनती हूं, तो पापा नाराज़ होते हैं, लेकिन मेरा भाई पहने, तो कोई नाराज़ क्यों नहीं होता?
इस सवाल का जवाब हमारा समाज नहीं दे रहा है और यहीं से वो एक लड़की के मन में कुंठा के बीज बो रहा है.
उसे ऐसा तनाव दिया जा रहा है, जिसके चलते वो आत्महत्या भी कर सकती है.
लेकिन ताली एक हाथ से नहीं बजती. आज के सुपरफ़ास्ट युवाओं को चाहिए कि वो हर क़दम उठाने से पहले एक बार सोचें कि इससे क्या मिलेगा?
मैं कभी बॉलीवुड में नंबर एक हीरोइन नहीं बन पाई, क्योंकि मुझे वो नहीं बनना था और मैं जो हूं, उसी में खुश हूं.
हमारे युवा को खुश रहना सीखना होगा, उसे सोचना होगा कि उसे क्या पाना है और क्या नहीं.

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बॉलीवुड में इस दबाव को मैं बखूबी समझती हूं.
यहां खूबसूरत लड़कियां सिर्फ़ हीरोइन बनने आती हैं. लंबे-लंबे डॉयलॉग याद कर लो, डांस-वांस कर लो और आप हीरोइन बन सकती हैं.
लेकिन ऐसे में वो भूल जाती हैं कि कितने लोग यह सब करने की कोशिश कर रहे हैं, और वो सफल होंगे, ये ज़रूरी नहीं है.
मैं भी डिप्रेस हुई हूं, प्यार, पति और काम के लिए. लेकिन मैंने इसे कभी अपनी ज़िंदगी से बढ़कर नहीं माना.
जैसे मैंने 'वाटर' के लिए अपना सिर मुंडवाया, लेकिन वो फ़िल्म कभी नहीं बन पाई.
रितुपर्णो घोष की फ़िल्म चोखेर बाली में, मैं लीड होने वाली थी. इसलिए उनके काम और निर्देशन को समझने के लिए, मैंने उनकी दूसरी बांग्ला फ़िल्म शुभो मुहूर्त की.
लेकिन, चोखेर बाली की शूटिंग शुरू होने के कुछ दिन पहले ही मुझे पता चला कि ऐश्वर्या उस फ़िल्म की हीरोइन होंगीं.

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मुझे बहुत बुरा लगता है, लेकिन मेरे हिसाब से कोई चीज़ इतनी बड़ी नहीं होती, जिसके लिए मर जाना चाहिए.
मैं फिर से कहती हूं कि पांच का नियम, आप किसी को भी बता सकते हैं कि नंदिता दास ने कहा था.
जब गुस्सा आए तो पांच मिनट तक कोई प्रतिक्रिया मत दो, पांच घंटे तक कोई क़दम मत उठाओ और पांच दिन तक बात को सोचो.
फिर आप पाएंगे कि वो बात पांच पैसे की भी नहीं थी, जिस पर आप जान देने वाले थे.
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