मेडिकल की प्रवेश परीक्षा से जुड़ी 5 ख़ास बातें

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत में मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए एक ही प्रवेश परीक्षा कराने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से छात्र काफी परेशान हैं.
राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा का फ़ैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के अपने ही फ़ैसले को पलट दिया और कहा था कि पूरे देश में प्रवेश परीक्षा एक साथ दो चरणों में होगी.
बिहार में प्रवेश परीक्षा पहले ही हो चुकी है. महाराष्ट्र में प्रवेश परीक्षा 5 मई को है. आंध्र प्रदेश में भी परीक्षा समाप्त हो चुकी है. महाराष्ट्र, भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर और आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वो राज्य स्तर पर अपनी प्रवेश परीक्षाएं जारी रखना चाहते हैं.
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की महाराष्ट्र इकाई ने कहा है सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सही है लेकिन इसे लागू करने के लिए समय चाहिए.

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बीबीसी से बात करते हुए एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर जयेश लेले ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रवेश परीक्षा को कराने के लिए एक-दो साल की मोहलत मिलनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले की पांच मुख्य बातें:
1. रविवार को छह लाख छात्रों ने आल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा इसे राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा का पहला चरण माना जाए. दूसरा चरण 24 जुलाई को हो. लेकिन पहले चरण के इम्तिहान में भाग लेने वाले कई छात्रों का मानना है कि उन्हें तैयारी के लिए और समय चाहिए था. जो छात्र यही परीक्षा 24 जुलाई को देंगे उन्हें तैयारी का अधिक समय मिलेगा.
2. राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा सीबीएससी के पाठ्यक्रम के अनुसार है. सीबीएसई सभी परीक्षाएं केवल हिंदी और अंग्रेज़ी में कराती है. हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा दूसरी भाषाओं में परीक्षा देने वाले कई राज्यों के छात्रों ने इस पर ऐतराज़ जताया है. उनका कहना है कि दूसरी भाषाओँ के छात्रों को इससे नुकसान होगा.
3. राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा के पक्ष में तर्क देने वाले कहते हैं कि इससे प्राइवेट मेडिकल कॉलेज के पैसे बनाने की प्रक्रिया पर रोक लग जायेगी. उदाहरण के तौर पर अब कोई भी संस्था अलग से अपनी परीक्षा नहीं करवा सकता. यहाँ तक कि दिल्ली की जानी मानी संस्था आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साईंसेज भी अपनी परीक्षा अलग से नहीं करवा सकती है.
4. एक राय ये भी है कि इस प्रणाली को सही तरीक़े से लागू करने के लिए समय दिया जाना चाहिए. अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने जब इस प्रणाली को लागू करने के पक्ष में फ़ैसला सुनाया था तो उसी समय अदालत ने साफ़ कर दिया था कि इसे इसी साल से लागू किया जाना चाहिए.

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5. तीन साल पहले 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा को ग़ैर क़ानूनी घोषित किया था. तब प्राइवेट कॉलेज और अल्पसंख्यक संस्थाओं ने इस फ़ैसले पर जश्न मनाया था. लेकिन लाखों छात्रों ने इसे सही नहीं माना था, ख़ास तौर से ग़रीब छात्रों ने. उनका मानना है कि पैसे वाले परिवार अपने बच्चों को लाखों रुपये ख़र्च करके प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में दाख़िला दिला सकते हैं लेकिन ग़रीब छात्र केवल सरकारी कॉलेजों पर ही निर्भर होते हैं. लेकिन 11 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने अपना 2013 वाला फ़ैसला बदल दिया और राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा को लागू करने के आदेश दिए. अधिकतर छात्र खुश हैं लेकिन वो इस परीक्षा की तैयारी के लिए समय चाहते हैं.
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