भारत के 'दोयम दर्जे' के हिंदू नागरिक

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, असम से
ये वोट नहीं डाल सकते, यह टैक्स तो देते हैं मगर भारत में ज़मीन नहीं खरीद सकते हैं.
ये हैं बंगाली हिंदू जो दशकों पहले भारत के लोअर असम में आकर बसे थे लेकिन इनका कहना है कि इनकी 'नागरिकता दोयम दर्जे' की है.
लोअर असम में भारत के विभाजन के बाद बांग्लादेश से आकर बसे बंगाली हिंदुओं की काफी तादाद है.
अनुमान के हिसाब से इनकी संख्या आठ से दस लाख के आसपास की होगी.
ऑल असम बंगाली स्टूडेंट्स फेडरेशन के सचिव सुमन साहा कहते हैं, "पंडित जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान के बीच समझौता हुआ था, जिसके तहत यह तय हुआ था कि विभाजन के बाद बांग्लादेश में रहने वाले हिंदू अगर भारत जाना चाहते हैं तो उन्हें भारत में बसाया जाएगा."

साहा कहते हैं, "हमारे पूर्वज वहां बड़ी मुश्किलें झेलकर किसी तरह भारत पहुंचे, इस उम्मीद के साथ कि यहाँ सुरक्षित रहेंगे और उनकी औलादों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा. लेकिन आज हमें यहां दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर रख दिया गया है."
साहा और उनके समाज के लोगों का कहना है कि आज भी उन्हें हर क़दम पर यह साबित करने पर मजबूर कर दिया जाता है कि वो भारत के नागरिक हैं.
बारपेटा रोड के रहने वाले बंगाली नौजवान कहते हैं कि उन्हें हमेशा इस बात का डर लगा रहता है कि कब अचानक उनके दरवाज़े पर पुलिस की दस्तक होगी और उन्हें बांग्लादेशी कहकर जेल भेज दिया जाएगा.
असम में इस तरह के लोगों के लिए तीन जेलें बनाई गई हैं. एक गोलपाड़ा में, एक कोकराझार में और एक ढुबरी में जहां उन लोगों को रखा जाता है जिनकी नागरिकता पर शक हो.
ऑल असम बंगाली स्टूडेंट्स फेडरेशन का कहना है कि फिलहाल असम की इन तीन जेलों में लगभग 400 के आसपास बंगाली हिंदू बंद हैं जिन्हे बांग्लादेशी कहकर गिरफ्तार किया गया है.

माणिक एतजो तीन महीनों तक जेल में रहने के बाद ज़मानत पर बहार आए हैं. उनका कहना है कि एक दिन रात को अचानक पुलिस अधिकारी उनके घर पहुंचे और कहा कि वो बांग्लादेशी हैं.
वो कहते हैं, "मेरी कई पुश्तें यहाँ रह रही हैं. मेरे दादा बांग्लादेश से विभाजन के वक़्त ही यहां आए थे. मेरे पूरे परिवार का नाम वोटर लिस्ट में भी है. लेकिन मुझे बांग्लादेशी कहकर जेल में बंद कर दिया.
यहीं के रहने वाले चंद्र दास का कहना है कि 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के बीच हुए 'असम समझौता' के हिसाब से 1971 के मार्च तक जो हिंदू बांग्लादेश से असम आकर बसे हैं उन्हें भारत का नागरिक माना जाएगा.

लेकिन वो कहते हैं कि जो बंगाली हिंदू विभाजन के समय ही आ गए थे उन्हें भी आज तक नागरिक नहीं माना जा रहा है.
हालांकि असम में चुनावी प्रचार के दौरान भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि बांग्लादेश से आए सभी हिंदुओं को भारत की नागरिकता दी जाएगी, असम का बंगाली समाज अमित शाह के इस बयान को भी 'चुनावी जुमला' ही मानकर चल रहा है.
स्वप्न दास ने कहा कि 2014 में लोक सभा के चुनावों के दौरान प्रचार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि वो असम में बने 'डिटेंशन कैंपों' को ख़त्म कर देंगे.

उन्होंने बताया,"लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. अलबत्ता इस बार तो भाजपा ने हमारा विरोध करने वाले दल, 'असम गण परिषद' से चुनावी तालमेल भी कर लिया है."
लोअर असम के बंगाली हिंदू समाज का आरोप है कि उनके ख़िलाफ़ ऐसा रुख़ इसलिए अपनाया जा रहा है ताकि असमिया लोगों का ही दबदबा क़ायम रहे और बंगाली हिंदुओं को राजनीतिक रूप से हाशिए पर ही रखा जा सके.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए<link type="page"><caption> यहां क्लिक </caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link>कर सकते हैं. आप हमें<link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












