'जब औरों ने होंठ सिल लिए तब महबूबा ने आवाज़ उठाई'

इमेज स्रोत, EPA
- Author, ताहिर मोहउद्दीन
- पदनाम, संपादक, चट्टान
पीडीपी नेता महबूबा मुफ़्ती ने भारत-प्रशासित जम्मू-कश्मीर की कमान संभाल ली है. उन्होंने सोमवार को राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.
महबूबा मुफ़्ती का 26 साल का राजनीतिक करियर खासा उतार चढ़ाव वाला रहा है. इस दौरान नई पार्टी का गठन हुआ, उसे राज्य के मुख्य दलों शामिल कराया और फिर अब उन्होंने राज्य की सत्ता संभाली है.
ख़ासतौर पर जिन कठिन परिस्थितियों में उन्होंने अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था, उसे अनदेखा कर महूबबा मुफ़्ती के जीवन का विश्लेषण करना संभव नहीं है.
ये वो हालात थे जब राजनीति का शब्द ज़ुबान पर लाना मौत को दावत देने जैसा था.
चरमपंथ के इस दौर में खौफ़ का आलम यह था कि मशहूर राजनेता ही नहीं बल्कि उनके दोस्त और रिश्तेदार भी घाटी छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए.

इमेज स्रोत, AP
सबसे ताकतवर राजनीतिक पार्टी समझी जाने वाली नेशनल कांफ्रेंस के प्रमुख ने तो यूरोप में शरण ली और वहां भी अपने होंठ सी लिए थे.
उस दौर में महबूबा मुफ्ती का राजनीतिक सफर शुरू हुआ और आज वो यहां तक पहुंची हैं.
महबूबा मुफ्ती ने 1959 में एक ऐसे परिवार में जन्म लिया, जो मूल रूप से एक धार्मिक परिवार था. उनका परिवार दक्षिणी कश्मीर में काफ़ी रसूख़ वाला था.
लेकिन मुफ्ती मोहम्मद सईद के राजनीति में आने से परिवार का हुलिया ही बदल गया. यह धार्मिक से ज़्यादा राजनीतिक रंग में रंग गया.
इसके बावजूद यह कहना ग़लत नहीं होगा कि 1989 तक महबूबा के अंदर ऐसी कोई ख़ास बात नज़र नहीं आ रही थी जिसके आधार पर भविष्य में उनकी किसी असाधारण भूमिका की भविष्यवाणी की जा सके.
शुरू में वे अपने पिता की तरह कांग्रेस के साथ जुड़ीं.

इमेज स्रोत, AP
जिस वक्त राज्य में हिंसा का दौर था महबूबा ने उन लोगों के घरों तक पहुंचने की कोशिश की जिनके लाडले कथित तौर पर सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए थे.
किसी भी मुख्यधारा की पार्टी के नेता के लिए यह संभव नहीं था कि वे ऐसे घरों में जाकर खुले आम सहानुभूति प्रकट कर सके.
इससे प्रभावित परिवारों में उनका रसूख़ बनना ही था. हालांकि कई जगह इसकी निंदा भी हुई. उन्होंने चरमपंथियों के हाथों प्रभावित परिवारों के साथ भी कुछ ऐसा ही किया.
इससे उनकी एक ऐसी राजनीतिक ज़मीन तैयार हुई जिसकी वजह से वो न केवल अपने लिए बल्कि अपने पिता के लिए भी लोगों का समर्थन प्राप्त करने में सफल हुईं.
1996 में जब राज्य में विधानसभा चुनाव हुए तो हालात ऐसे थे कि चुनाव को पसंद न करने के बावजूद लोगों का उनसे अलग रहना संभव नहीं था.
कश्मीरियों के मन में ये बात थी कि वो सुरक्षा बलों के उत्पीड़न का शिकार हुए हैं.

इमेज स्रोत, PDP PRO
महबूबा भी किसी तरह से ये संदेश भेजने में सफल हुईं कि अगर जनता को इस अत्याचार से छुटकारा पाना है तो उन्हें वोट देने के सिवाय कोई चारा नहीं है.
इस संदेश का फायदा कांग्रेस को हुआ और वो घाटी में मतदाताओं का समर्थन हासिल कर सकी.
महबूबा विधानसभा में विपक्षी पार्टी कांग्रेस की नेता बनीं और अपनी भूमिका अच्छी तरह से निभा पाईं.
लेकिन चंद सालों बाद यानी 1999 में ही वो कांग्रेस से अलग हो गईं और उन्होंने पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) बनाने की घोषणा की. लेकिन उन्होंने पार्टी प्रमुख का पद पिता को दिया.
मुफ्ती सईद एक ऐसे नेता थे, जो बेटी के आने के पहले कश्मीरियों को स्वीकार्य नहीं थे.
वो कई चुनावों में मात खा चुके थे. संसद पहुंचने के लिए उन्हें यूपी की एक सीट से चुनाव लड़ना पड़ा था.
इसे महबूबा मुफ्ती का सबसे बड़ा कमाल माना जाता है कि उन्होंने न केवल अपने लिए बल्कि अपने पिता के लिए जनता में एक मज़बूत जगह बनाई.
2002 में जब फिर विधानसभा चुनाव हुए तो इसकी एक मुख्य किरदार महबूबा मुफ्ती थीं.

इमेज स्रोत, AP
अब तक राज्य की सबसे ताकतवर पार्टी रही नेशनल कांफ्रेस को मुंह की खाना पड़ी. और पीडीपी सत्ता में आई.
मुफ्ती सईद का मुख्यमंत्री बनने का सपना पूरा हो गया और वो तीन साल तक अपना काम कर पाए. लेकिन फिर हालात ने पलटा खाया. पहले कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद और फिर छह साल के लिए उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बनाए गए.
और फिर 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में पीडीपी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.
मुफ्ती मोहम्मद सईद ने भाजपा के साथ गठबंधन किया और फिर से मुख्यमंत्री का पद संभाला.
लेकिन इस बार किस्मत में कुछ और ही लिखा था. मुफ्ती की किस्मत में भी और महबूबा की किस्मत में भी.












