बंगालः अब किस हाल में हैं माओवाद प्रभावित इलाके?

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- Author, अमिताभ भट्टासाली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता
सोमवार से पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव मतदान शुरू होने जा रहे हैं.
पहले चरण में पश्चिम मिदनापुर, पुरुलिया और बंकुरा जिलों के उन 18 चुनाव क्षेत्रों में मतदान होंगे जो पांच साल पहले भी माओवादियों के गढ़ रहे हैं.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पिछले पांच सालों से दावा कर रही हैं कि उन्होंने इन इलाकों में माओवादियों को हटाकर शांति स्थापित की है और इन इलाकों में रिकॉर्ड प्रगति हुई है.
माओवादी अब सामने नहीं आते हैं. बुनियादी ढांचा जैसे कि सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था में विकास हुआ है.
लेकिन भीतरी इलाकों में जाने पर पता चलता है कि वहां के हालात में सुधार कम ही हुआ है.

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आठ साल पहले लालगढ़ इलाके के दलीलपुर चौक से ही माओवादी कार्यक्रम का एक नया सिलसिला शुरू हुआ था.
पुलिस के कथित अत्याचार के खिलाफ पीपुल्स कमेटी यहीं बनाई गई थी. इसके सर्मथकों ने कुछ ही दिन में पूरे लालगढ़ को कब्जे में कर लिया था.
पुलिस और प्रशासन यहां घुस नहीं पाते थे. हालांकि कुछ महीनों बाद अर्द्ध सैनिक बलों ने लालगढ़ को माओवादियों के कब्जे से छुड़ा लिया था.
लालगढ़, कांटापहाड़ी, छोट पेलिया जैसे इलाके एक ज़माने में माओवादियों के गढ़ रहे हैं.
कई सालों बाद मुख्यमंत्री के प्रगति के दावे की पुष्टि करने जब हम उन इलाकों में गए तो मिलीजुली प्रतिक्रिया मिली.

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बरागदा गांव के लोगों का कहना था, "पहले तो गांव में रिश्तेदार आना नहीं चाहते थे क्योंकि रास्ते में घुटनों तक कीचड़ हुआ करता था. जूते हाथ में उठाकर आना पड़ता था. लेकिन अब कंक्रीट का रास्ता बना दिया गया है. लालगढ़ इलाके की इतनी प्रगति हुई है कि यहां के निवासी सपने में भी ये सब कभी नहीं सोच सकते थे."
सुरक्षा बलों की गाड़िया जिस मेन रोड से जाती हैं उसको छोड़ थोड़ा अंदर के एक गांव कुआंपारा में जाने पर वहां कुछ अलग ही देखने को मिला.

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दो साल पहले शुरू हुए लालगढ़ कॉलेज के प्रिंसिपल बिसेश्वर चक्रबर्ती ने बताया, "पीने का पानी ही यहां की सबसे बड़ी समस्या है. पूरे गांव के लिए सिर्फ एक ही नल है. बाकी खराब पड़ा हुआ है. बरसात के दौरान रास्ते में इतना पानी हो जाता है कि बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं. पर एक महीन पहले एक रास्ता जरूर पक्का हुआ है. नरेगा का जो भी काम मिलता हो, लेकिन पैसा बहुत दिनों के बाद दिया जाता है."

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लालगढ़ इलाके में जाने पर नीले और सफेद रंग की कई इमारतें नजर आती हैं. इसी में से एक है लालगढ़ कॉलेज.
लालगढ़ कॉलेज के अध्यक्ष बिश्वेश्वर चक्रवर्ती ने एक घटना बताई, "एक छात्र झारग्राम कॉलेज में पहले दाखिल हुआ. पर लालगढ़ से झारग्राम हर रोज आने-जाने का खर्चा उठाना उसके लिए मुश्किल था. इसलिए उसने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी. अब यहां कॉलेज बनने से वह फिर से यहाँ भर्ती हो गया है. यह कॉलेज नहीं होता तो कई छात्र-छात्राओं को मजबूरन पढ़ाई छोड़नी पड़ती."

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माओवादियों का गढ़ रहा दूसरा इलाका है पुरुलिया जिले का बंदवान. यहां स्थानीय सीपीआईएम उम्मीदवार सुसांतो बेसरा ने आखिरी दौर के प्रचार की कमान संभाल रखी थी.

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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की रिकॉर्ड प्रगति के दावे के बारे में सुसांत बेसरा का कहना था, "जो भी रास्ते बनाए गए हैं वो सभी केंद्र सरकार के पैसों से बने हैं. दो रुपए प्रति किलो चावल दिया जाता है वो भी केंद्र सरकार का ही प्रोजेक्ट है. तो राज्य सरकार ने यहां कौन से पैसे खर्च किए हैं. इनमें से ज्यादातर काम तो पिछले वाम मोर्चा सरकार के समय से ही चले आ रहे हैं."
वहीं तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार और पश्चिमांचल मंत्री सुकुमार हंसदा का दावा है, "ये सही है कि शत-प्रतिशत इलाके में हर एक सेवा नहीं पहुंच नहीं है. हमें काम करने के लिए सिर्फ पांच साल ही मिला. पर कुछ न कुछ सुविधा तो हर इलाके में दी गई. जहां रास्ता नहीं बन पाया, वहां पीने के पानी का बंदोबस्त हुआ. जहां नरेगा का काम नहीं दिला सके वहां कुछ और सेवा उपलब्ध करवाया. ये सारे काम काज तो पिछली सरकार में नहीं हुए थे."

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तृणमूल कांग्रेस का एक और दावा है कि जिस विकास के अभाव के मुद्दे को लेकर माओवादी पार्टी के कार्यकर्ता अभी भी सामने नहीं आते हैं वो अब कोई मायने नहीं रखता क्योंकि काफी प्रगति हुई है. माओवादी पार्टी के कार्यकर्ता अभी भी सामने नहीं आते.
उन्होंने बताया, "किशनजी समेत कुछ नेताओं का एनकाउंटर कर दिया गया. जब कई और नेता जेल में कैद हुए, तथा कुछ और नेताओं ने आत्मसमर्पण कर दिया तो बाकी अंडरग्राउंड हो गए. पर माओवादियों से पुलिस प्रशासन अभी भी चिंतित रहती है. क्योंकि इस साल भी सीपीआई माओवादी ने चुनाव बहिष्कार का ऐलान किया है."
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