इशरत जहाँ मुठभेड़: कब क्या हुआ?

इशरत जहां

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    • Author, प्रशांत दयाल
    • पदनाम, अहमदाबाद से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

साल 2004 में गुजरात पुलिस ने दावा किया था कि चार लोग जो तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के इरादे से अहमदाबाद आए थे, मुठभेड़ में मारे गए हैं.

बाद में हुई जांच में इस बात पर सवाल उठे कि क्या ये लोग चरमपंथी थे? ये लोग थे- छात्रा इशरत जहाँ, प्रणेश, अमजद और ज़ीशान.

कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अदालत में यह कहा था कि इशरत जहां का संबंध चरमपंथी संगठन लश्करे तैयबा से नहीं था.

लेकिन चंद दिनों पहले पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लेई ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा है कि इस मामले में दूसरा हलफ़नामा गृह मंत्री पी चिदंबरम के कहने पर बदला गया था.

इस मामले में कब क्या हुआ:

14 जून, 2004

अहमदाबाद पुलिस ने इशरत जहां समेत चार लोगों को कोतरपुर इलाक़े में कथित मुठभेड़ में मार दिया.

जिनकी मौत हुई उनमें इशरत के अलावा प्रणेश, अमजद और ज़ीशान थे.

नरेंद्र मोदी

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पुलिस का दावा था कि चारों चरमपंथी थे और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या के इरादे से वहां आए थे.

बाद में अहमदाबाद के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट एसपी तमांग और फिर सीबीआई ने पुलिस के इस दावे को ख़ारिज कर दिया.

इसके बाद अदालत में केस दर्ज हुआ जिसका मुक़दमा जारी है.

2004 से 2009

यह मामला अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के पास रहा लेकिन आगे कोई तहक़ीकात नहीं हुई.

सितंबर, 2009

अहमदाबाद के मजिस्ट्रेट एसपी. तमांग ने पूरी घटना को फर्ज़ी मुठभेड़ बताया और 22 पुलिस अधिकारियों को दोषी पाया गया.

दूसरे ही दिन गुजरात सरकार ने तमांग की रिपोर्ट को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी और ने इस पर स्टे लगा दिया.

इसके बाद इशरत की मां शमीमा मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गईं.

दिसंबर, 2009

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट की डिविज़न बेंच को सुनवाई का आदेश दिया.

अप्रैल 2010

सुप्रीम कोर्ट

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हाईकोर्ट ने तीन आईपीएस अफ़सरों की एसआईटी का गठन किया और जांच कर रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया.

2012

एसआईटी के चेयरमैन आरआर वर्मा सहित तीनों सदस्यों ने हाईकोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें मुठभेड़ को फ़र्ज़ी बताया गया. ये भी कहा गया कि इशरत के चरमपंथी होने के बारे में कोई सबूत नहीं मिले हैं. हाईकोर्ट ने तुरंत ही इस मामले को सीबीआई को सुपुर्द कर दिया और सीबीआई ने नई एफ़आईआर दाख़िल करके जांच शुरू कर दी.

सीबीआई ने अपनी जांच टीम में एसआईटी के पूर्व सदस्य और गुजरात काडर के आईपीएस सतीश वर्मा को भी शामिल किया.

सीबीआई के सामने पेश हुए डीएसपी डीएच गोस्वामी और केएम. वाघेला ने बताया की इशरत को मारने की मंज़ूरी 'सफेद और काली दाढ़ी' से मिल चुकी थी. असिस्टैंट सब इंस्पेक्टर निज़ाम सैयद ने बताया कि इशरत की हत्या के बाद चरमपंथी साबित करने के मकसद से उनसे मिले हथियार आईबी के ज्वाइंट डायरेक्टर राजेन्द्र कुमार के ऑफ़िस से आए थे.

सीबीआई

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यह सब मजिस्ट्रेट के सामने दी गई गवाही में बताया गया था.

जनवरी 2013

सीबीआई ने इस मामले में गिरफ़्तारी शुरू की और कुल आठ पुलिस अफ़सर को गिरफ़्तार किया गया और बाद में चार्जशीट भी दाख़िल हुई.

अप्रैल 2014

राजेन्द्र कुमार सहित कुल चार आईबी ऑफ़िसरों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाख़िल हुई लेकिन भारत सरकार ने कार्रवाई की मंज़ूरी नहीं दी.

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