समलैंगिकता पर धर्म गुरुओं का रवैया बदला है?

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सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध मानने के ख़िलाफ़ दायर याचिका को पांच जजों की बड़ी बेंच को सौंप दिया है.

समलैंगिक कार्यकर्ताओं के वकील आनंद ग्रोवर का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस क़दम से उम्मीद किरण जागी है.

सुप्रीम कोर्ट ने ये क़दम क्युरीटीव पीटीशन के तहत उठाया है. इसके तहत रिव्यू किए गए फ़ैसलों पर एक बार फिर से विचार किया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट को कभी-कभी लगता है कि हो सकता है कि उससे कोई गलती हो गई हो.

तो ऐसे हालात में वो अपने पुराने फ़ैसले को बदल सकते हैं या रद्द कर सकते हैं.

इसमें तीन वरिष्ठतम जजों के अलावा दो वो जज होते हैं जिन्होंने फ़ैसला दिया है. फ़ैसला देने वाले जजों के मौजूद नहीं होने की हालत में इसमें किसी और जज को शामिल किया जा सकता है.

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जहां तक विरोध की बात है तो मेरा अनुभव यह कहता है कि आम आदमी समलैंगिक संबंधों के लिए सज़ा देने के ख़िलाफ़ है.

पहले धार्मिक गुरुओं ने भी इसका सीधा विरोध किया था लेकिन आज उनका रवैया वैसा नहीं हैं.

ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फारूक़ी अब कह रहे हैं कि सज़ा देना ग़लत है लेकिन अपने घर में ही करें तो हमें कोई ऐतराज़ नहीं है.

ईसाई भी ऐसा ही कह रहे हैं. अगर आम जनता से आप पूछें कि घर के अंदर किसी भी तरह के यौन संबंध बनाए जाने पर सज़ा दी जानी चाहिए तो वे कहेंगे कि यह ग़लत है.

ये याचिका सुप्रीम कोर्ट के 2013 के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर की गई थी, जिसमें समलैंगिक सेक्स को अपराध न मानने के दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को पलट दिया गया था.

(वकील आनंद ग्रोवर से बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद की बातचीत पर आधारित)

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