'वो मर रहे हैं, पार्टियां राजनीति कर रही हैं'

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हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी से पीएच.डी कर रहे दलित छात्र रोहित वेमुला ने 17 जनवरी को आत्महत्या कर ली थी.

इसके बाद से यह मुद्दा पूरे देश में छाया हुआ है. आख़िर ऐसी क्या वजह थी कि रोहित को ऐसा क़दम उठाना पड़ा.

अखिल भारतीय विद्याथीं परिषद (एबीवीपी) के राष्ट्रीय सचिव आशीष चौहान कहते हैं, "अगर विश्वविद्यालय का कुछ समय पहले का इतिहास देखें तो पाएंगे कि वहां के ही दो छात्र संगठन 'दलित स्टूडेंट्स यूनियन' और 'बहुजन स्टूडेंट्स फ्रंट' ने पिछले साल 12 अगस्त को एक बयान दिया था जिसमें उन्होंने अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एएसए) के सदस्यों को गुंडा ठहराया था."

वह आगे कहते हैं, "रोहित वेमुला भी एएसए के ही सदस्य थे. ऐसे में यह समझना होगा कि यूनिवर्सिटी कैम्पस में दलित छात्र संगठन ही आपस में लड़ रहे थे."

लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सुकुमार इस बात को नहीं मानते. वह कहते हैं, "दो संगठन हैं, एक जो अंबेडकर के सिद्धांत मानता है और दूसरा संगठन आरएसएस के दर्शनशास्त्र पर चल रहा है, ये टकराव उन दोनों के बीच का है."

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लेकिन रोहित का आत्महत्या करना क्या भाजपा के ख़िलाफ़ नहीं जाएगा?

इसके जवाब में चौहान कहते हैं, "अगर कोई वैचारिक स्तर पर हमसे अलग जाता है तो उसमें कोई दिक़्क़त नहीं है. हम हमेशा मतभेदों में ही काम करते रहे हैं. लेकिन जब कोई याक़ूब मेमन के समर्थन में खड़ा होता है तो उसे कोई अंबेडकर का विचार कैसे कह सकता है?"

चौहान केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को लिखे पत्र में कुछ आपत्तिजनक नहीं मानते.

वह कहते हैं, "उन्होंने जो पत्र लिखा उसमें कहीं भी एएसए का नाम नहीं था. उसमें कॉलेज के माहौल के बारे में लिखा गया था."

लेकिन क्या इस घटना के बाद अगर दलित समुदाय एकजुट होता है तो क्या भाजपा इसका जवाब देगी?

चौहान कहते हैं, "भाजपा तो तब जवाब देती, जब इसमें पार्टी का कोई सदस्य शामिल होता."

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वह कहते हैं, "एनएसयूआई को कांग्रेस चलाती है और एसएफ़आई की सीपीआई (एम) चलाती है. लेकिन एबीवीपी को सीधे तौर पर भाजपा नहीं चलाती."

वहीं प्रोफ़ेसर सुकुमार कहते हैं, "अब हर पार्टी अंबेडकर को याद कर रही है. इतने सालों तक किसी को याद नहीं आई, इसमें पूरी तरह से राजनीति शामिल है."

उनके अनुसार, "वह सब ग़रीबी में मर रहे हैं और यहां सभी पार्टियां उस पर राजनीति कर रही हैं."

(बीबीसी हिन्दी के रेडियो संपादक राजेश जोशी से बातचीत पर आधारित)

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