'रोहित वेमुला को क्रूर कायरता ने मारा'

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- Author, अपूर्वानंद
- पदनाम, लेखक और विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
रोहित वेमुला ने आत्महत्या के पहले लिखे अपने पत्र में अपने निर्णय के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया है.
हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलपति ने इस पर गहरी हैरानी जताई है. उन्हें समझ नहीं आ रहा कि रोहित ने आत्महत्या क्यों की. उनके इस आश्चर्य में कोई अपराध बोध नहीं है, उन्हें नहीं लग रहा कि इस मौत में उनकी जिम्मेदारी भी हो सकती है.
अट्ठाइस साल के पीएचडी छात्र रोहित पिछले कई दिनों से खुले आसमान के नीचे सो रहे थे, क्योंकि हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के अधिकारियों ने उन्हें और उनके चार साथियों को हॉस्टल से निकाल दिया था.
उनका प्रवेश विश्वविद्यालय के हर सार्वजनिक स्थल पर प्रतिबंधित कर दिया गया था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के एक सदस्य ने इन छात्रों पर मारपीट करने का आरोप लगाया था.

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यूनिवर्सिटी की पहली जांच में यह आरोप बेबुनियाद पाया गया. यह नोट किया गया कि जिसने आरोप लगाया है, उस पर हमले का कोई सबूत नहीं, ज़ख्म का निशान नहीं, इसलिए आरोप साबित नहीं होता.
लेकिन जिस कुलपति के कार्यकाल में रोहित और उनके साथियों को आरोपमुक्त किया गया, उनके जाने और नए कुलपति के आने के बाद बिना कोई नई वजह बताए, बिना किसी नई जांच के, इस फैसले को उलट दिया गया. रोहित और उनके मित्रों के लिए हॉस्टल और अन्य सार्वजनिक जगहें प्रतिबंधित कर दी गईं.
आखिर रोहित का अपराध क्या था? वे अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सदस्य थे. इस संगठन ने पिछले दिनों यूनिवर्सिटी में ‘मुज़फ्फरनगर बाकी है’ नाम की एक फिल्म के प्रदर्शन के दौरान हुए हमले के विरोध में एक जुलूस निकाला था.
उसके पहले अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने याकूब मेमन की फाँसी के मामले पर बहस छेड़ी थी और मृत्युदंड का विरोध किया था. इस कारण इस संगठन को राष्ट्रविरोधी ठहराया जा रहा था.

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इस बीच, भारतीय जनता पार्टी के नेता और केंद्र सरकार में श्रम-रोज़गार राज्य मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को एक खत लिखा जिसमें उन्होंने यूनिवर्सिटी को राष्ट्रविरोधियों का अड्डा बताते हुए हस्तक्षेप का सुझाव दिया था.
एक स्थानीय नेता ने भी अपनी शिकायत दर्ज कराई और नए कुलपति के नेतृत्व में विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने रोहित और पांच छात्रों को दंडित करने का निर्णय लिया.
यह क्या इत्तफाक भर है कि ये पांचों दलित हैं? क्या यह भी इत्तफाक है कि इनके जिस काम के लिए इन्हें राष्ट्रविरोधी ठहराया गया, वह दलितों के मुद्दे को लेकर न था, बल्कि मुसलमानों के अधिकार से जुड़ा था?
क्या इसमें कोई शक है कि रोहित की मौत के लिए वह नहीं, बल्कि हमारी, यानी अकादमिक समुदाय की क्रूर कायरता ज़िम्मेदार है?
क्या यह कायरता नहीं थी जिसने हैदराबाद विश्वविद्यालय के नए कुलपति और उनकी कार्यपरिषद को ‘राष्ट्रवादी’ दबाव के आगे घुटने टेकने को मजबूर किया?
क्या यह कायरता न थी कि अपनी शांति के लिए उन्होंने पांच सबसे कमजोर तबके के नौजवानों के सामाजिक बहिष्कार जैसा निर्णय किया?

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रोहित वेमुला खुद को मात्र दलित मानने से इनकार करते हैं. वे विज्ञान-लेखक बनना चाहते थे. उन्हें पहले से दी हुई पहचानों की कैद में घुटन होती थी. वे सितारों के बीच गर्दिश करना चाहते थे. सितारों की सैर पर जाना चाहते थे.
रोहित गलत जगह पर थे. विश्वविद्यालय अब उनकी तरह के ख्यालों की उड़ान भरने वालों के लिए मुनासिब जगह नहीं.
अब यह अपने करियर की हिफाजत करते हुए, अपनी सहूलियतों को वेतन आयोगों के जरिए बढ़वाते हुए सुरक्षित जीवन जीने वालों की पनाहगाह है. यह अपनी भाषा, जाति, धर्म के पिंजरे में सुरक्षित रहने वालों की शरणस्थली है.
यह मुमकिन है कि रोहित के इस अंतिम पत्र का इस्तेमाल उन सबको बचाने के लिए होगा जो उन हालात के लिए जवाबदेह हैं, जिन्होंने रोहित को आत्महत्या की ओर धकेला.
राष्ट्रवादी इस पत्र का इस्तेमाल उन्हें शर्मिंदा करने के लिए भी कर सकते हैं जो ऐसी हर घटना के लिए असहिष्णुता को जिम्मेदार ठहराते हैं. यह बताने के लिए कि कैसे अपनी मौत के लम्हे में भी रोहित ने देश की लाज रख ली, किसी पर आरोप नहीं लगाया.

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रोहित ने अपील की है कि उसकी मौत का सामना शांति और धीरज से किया जाए.
वजह साफ़ है जो रोहित को खुदकुशी की ओर ले गई, वो है ‘राष्ट्रवादी दहशत’ के आगे शिक्षित समुदाय का आत्मसमर्पण.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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