फ़र्स्ट क्लास एमए पर रिक्शा चलाने की मजबूरी

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, राँची से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
झारखंड में जनजातीय भाषाओं का बुरा हाल है. रांची समेत राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में जनजातीय भाषा विभाग में पार्याप्त शिक्षक नहीं हैं. इस कारण छात्रों की रुचि घट रही है.
रांची विश्वविद्यालय में इस विभाग के पहले बैच के छात्र एडवर्ड कुजूर पिछले कई सालों से रिक्शा चलाते हैं.
उन्होंने 1984 में कुड़ुख से एमए की परीक्षा फ़र्स्ट डिविज़न में पास की थी. कुड़ुख आदिवासियों की प्रमुख भाषा है.

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इसके दो साल बाद उन्होंने जे एन कॉलेज धुर्वा में अस्थायी शिक्षक की नौकरी मिली लेकिन कई साल पढ़ाने के बाद भी वेतन नहीं मिला. जब घर चलाना मुश्किल हुआ तो 1991 में उन्होंने कॉलेज जाना छोड़ दिया और रिक्शा चलाने लगे.
एडवर्ड कुजूर ने बीबीसी को बताया कि यह रिक्शा उन्हें नगर निगम ने दिया था. इससे 150-200 रुपये रोज़ की कमाई हो जाती है. इनकी कॉमर्स ग्रेजुएट पत्नी बतरिसिया कुजूर एक जगह साफ-सफाई का काम करती हैं.
जब हमने उनसे पूछा कि आपको सरकार से क्या चाहिए. उनका जवाब था- सरकार ई-रिक्शा दे देती, तो सहूलियत होती. साइकिल रिक्शा खींचने से घुटने में दर्द रहता है.

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एडवर्ड कुजूर ने बताया कि पीएचडी के लिए उन्होंने थीसिस तैयार की थी. सब दीमकों का निवाला बन गया. इसके बावजूद वे आदिवासियों से भाषा की पढ़ाई करने की अपील करते हैं.
कहते हैं कि जिसे बोलते हैं, उसे पढ़ना ज्यादा आसान और ज़रूरी है. भाषाएं मर गईं, तो सभ्यता और संस्कृति भी नहीं बचेगी.
रांची विश्वविद्यालय के उप कुलसचिव डॉ सुखी उरांव ने बताया कि जनजातीय भाषा विभाग में 18 की जगह सिर्फ चार शिक्षक हैं और तीन आदिवासी भाषाओं संथाली, नागपुरी और कुड़ुख की ही पढ़ाई हो पा रही है.
नियमानुसार यहां 9 भाषाओं की पढ़ाई होनी चाहिए. अभी कुरमाली, खोरठा, हो जैसी भाषाओं के शिक्षक मिल ही नहीं रहे.

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पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता शहरोज कमर ने बताया कि क्षेत्रीय भाषाओं के साथ सरकारों का रवैया कभी ठीक नहीं रहा. झारखंड की किसी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया. इस कारण एडवर्ड कुजूर जैसे लोग रिक्शा चलाने पर विवश हैं.
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