तो फ़िलहाल प्रदूषण पर क़ाबू नहीं पा सकती सरकार?

भारत सरकार ने प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए एक अप्रैल 2020 से प्रदूषण उत्सर्जन मानक बीएस-6 लागू करने की घोषणा की है.
सरकार ने मौजूदा बीएस 4 नॉर्म्स के बाद बीएस 5 नॉर्म्स की जगह सीधे बीएस 6 नॉर्म्स लाने का फैसला लिया है. पहले 2021 से बीएस 5 नॉर्म्स आने वाले थे.
सरकार के इस फ़ैसले से ऑटो कंपनियों और रिफ़ायनरियों पर क्या असर पड़ेगा, ऑटो एक्सपर्ट मुदित श्रीवास्तव बीबीसी से बातचीत में इसके बारे में विस्तार से बताते हैं.
भारत में बीएस मनी या फिर यूरोप में यूरो गजट लागू किए जाते हैं प्रदूषक तत्वों के उत्सर्जन के ऊपर.
सरकार ने 2000 में यूरोप के तर्ज पर उत्सर्जन मानक से जुड़ी नीति बनाई. भारत ने 2002 में बीएस-1 लागू किया.
इसमें बहुत सारी बातों को शामिल किया गया था जैसे जो गाड़ियां बन रही थीं उनको इस मानक के हिसाब से बनाना.
जो ईंधन इस्तेमाल किया जा रहा था वो भी इस मानक को पूरा नहीं कर पा रहा था.

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इस मानक को चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया. 2005 में बीएस-2 लागू किया गया फिर 2010 में बीएस-3 लागू किया गया.
2010 में ही सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में बीएस 4 लागू किया. जो आंकड़े मेरे पास हैं उसके हिसाब से 33 जगहों पर अभी बीएस-4 ईंधन मिल रहा है.
2020 तक बीएस-6 लागू करना मुझे नहीं लगता कि व्यावहारिक हो पाएगा. इसके लिए बड़े पैमाने पर तकनीक और रिफ़ायनरी के स्तर पर निवेश की ज़रूरत होगी.
हालांकि सरकार ने रिफ़ायनरी के लिए 30 हज़ार करोड़ रुपए के निवेश की बात की है.

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जहां तक ऑटो कंपनियों का सवाल है तो बड़ी गाड़ियों में तो तकनीकी तब्दीली लाना आसान है लेकिन छोटी गाड़ियों में यह मुश्किल है.
इसके लिए काफी शोध और तकनीकी विकास की जरूरत होगी. आशंका है कि कहीं इससे देश में ऑटो मोबाइल के क्षेत्र में होने वाला निवेश वापस ना हो जाए. क्योंकि इसे लेकर ऑटो निर्माता कंपनियां चिंतित हैं.
(ऑटो एक्सपर्ट मुदित श्रीवास्तव से बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय की बातचीत पर आधारित)
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