गुजरात: 'कांग्रेस ने दंगा पीड़ितों को धोखा दिया'

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- Author, अंकुर जैन
- पदनाम, अहमदाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए
गुजरात में गुप्तचर विभाग के पूर्व प्रमुख ने कांग्रेस और पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी पर साल 2002 के दंगा पीड़ितों और जांच में सहयोग कर रहे 'व्हिसलब्लोअर्स' को धोखा देने का आरोप लगाया है.
आईपीएस अफ़सर आरबी श्रीकुमार ने अपनी किताब 'गुजरात: बिहाइंड द कर्टेन' में कांग्रेस पर धर्मनिरपेक्षता का दिखावा करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कांग्रेस पर नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ केस चलाने को लेकर अनिच्छुक होने के इल्ज़ाम भी लगाए हैं.
गुजरात में फ़रवरी 2002 में गोधरा में एक ट्रेन में सवार 58 हिंदू कारसेवकों के आग में झुलस जाने के बाद राज्य में दंगे भड़के थे और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक एक हज़ार लोग मारे गए थे जिनमें अधिकतर मुसलमान थे. राज्य की तत्तकालीन मोदी सरकार पर दंगे रोकने में विफल रहने और मुसलमानों के जानमाल की रक्षा न करने के आरोप लगे थे.
वर्ष 2002 में अप्रैल से सितंबर तक सीआईडी विभाग में एडीजी रहे श्रीकुमार अकसर संघ और गुजरात की मोदी सरकार पर दंगों के दौरान लोगों की जान न बचाने के आरोप लगाते रहे हैं.
इन दंगों के दौरान सेवा में रहे किसी आईपीएस अधिकारी की यह पहली किताब है, जिसमें उन्होंने कांग्रेस के राज्य और केंद्रीय नेतृत्व पर 'बेहद ढुलमुल और निंदनीय रवैया' अपनाने का आरोप लगाया है.

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उन्होंने लिखा है, ''खोखली धर्मनिरपेक्षता और हिंदू भावनाओं के लिए अति संवेदनशीलता के चलते दंगों के बाद हुए सोनिया के दौरे के समय कांग्रेस नेताओं ने उन्हें ज़किया जाफ़री के घर नहीं जाने दिया.. इसकी तुलना इंदिरा गांधी से कीजिए जिन्होंने ख़तरा मोल लेकर बिहार में जनता पार्टी की सरकार के दौरान दलित नरसंहार के बाद बेलची गांव का दौरा किया था..और यहां तक कि एक हाथी पर बैठकर उन्होंने गंगा पार की थी.''
वह लिखते हैं, "2004 में केंद्र में कांग्रेस सरकार की वापसी ने दंगा पीड़ितों की उम्मीदें काफ़ी बढ़ा दी थीं, लेकिन यूपीए सरकार ने दंगों में प्रमुख भूमिका निभाने वाले संघ परिवार के लोगों की कानूनी जांच की सलाह भी नज़रअंदाज़ कर दी. मनमोहन सिंह ने भी इस मामले में कुछ नहीं किया.''
इस किताब पर टिप्पणी करने से गुजरात कांग्रेस के नेता बच रहे हैं.
गुजरात प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भारत सोलंकी ने फ़ोन पर सिर्फ़ ये कहा कि वह किताब में पार्टी पर लगे आरोपों को लेकर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे और फ़ोन रख दिया.

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श्रीकुमार ने एक जगह लिखा है, "दंगा पीड़ितों ने मुख्यमंत्री और नौकरशाही की भूमिका की जांच के लिए एक अलग न्यायिक आयोग बनाने की मांग की थी. चूंकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुछ नहीं किया था, तो उनकी निष्क्रियता से चिढ़कर तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने गोधरा में ट्रेन अग्निकांड के पीछे के हालात की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग बनाया."
श्रीकुमार लिखते हैं कि कांग्रेस ने कभी उन पत्रों की प्रतियां जारी नहीं कीं, जो दंगों के बारे में तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भेजे थे.
वो लिखते हैं, "मीडिया में ऐसी आशंकाएं जताई गईं कि इस कार्रवाई से सिख दंगों के दौरान ज्ञानी जैल सिंह और राजीव गांधी के बीच हुए पत्राचार की मांग हो सकती थी."

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अपनी किताब में वे यहां तक कहते हैं, ''यहां तक कि यूपीए सरकार ने केंद्रीय जांच एजेंसियों की रिपोर्ट दंगा जांच एजेंसियों को नहीं सौंपी.''
उन्होंने यह आरोप भी लगाया है कि यूपीए सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने में भी देरी की, जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट को एसआईटी का गठन करना पड़ा.
अपनी किताब में वे कहते हैं कि कांग्रेस मोदी विरोधी रुख़ को लेकर काफ़ी उधेड़बुन में थी कि इससे हिंदुओं का एक तबक़ा उससे अलग हो जाएगा जो मुसलमान विरोधी तो है लेकिन भाजपा समर्थक नहीं है.

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उन्होंने कांग्रेस की तरह समाजवादी पार्टी पर भी आरोप लगाए हैं. उन्होंने लिखा, "उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने गोधरा ट्रेन में अयोध्या से कारसेवा करके लौट रहे रामभक्तों की सुरक्षा में लगे पुलिसवालों से अग्निकांड की चश्मदीद गवाही पाने की कोशिश नहीं की.''
श्रीकुमार कहते हैं कि पूर्व सीबीआई डायरेक्टर डॉ. आरके राघवन को एसआईटी का प्रमुख बनाया गया जिन्होंने गोधरा के बाद हुए दंगों में गुजरात के मुख्यमंत्री को किसी भी भूमिका से मुक्त कर दिया.
श्रीकुमार ने केंद्रीय जांच एजेंसी में डेप्युटेशन के दौरान राघवन के साथ काम किया था. श्रीकुमार ने उन पर हितों के टकराव और अनुचित नीतियां अपनाने के आरोप मढ़े हैं. वह वास्तव में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम को स्पेशल इम्यूनाइज़ेशन टीम कहते हैं.

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उधर आरके राघवन से जब बीबीसी हिंदी ने इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया मांगी तो उन्होंने कहा, "इन आरोपों का मुझ पर कोई असर नहीं है. मैं इन आरोपों पर कुछ नहीं कहना चाहता हूँ."
यही नहीं, श्रीकुमार ने गुजरात के कुछ वरिष्ठ नौकरशाहों और दो मुस्लिम आईपीएस अधिकारियों पर भी दंगाइयों के पक्ष में होने का आरोप लगाया है.
उनके मुताबिक आईपीएस अधिकारी ख़ुर्शीद अहमद और एक अन्य अधिकारी ने नरोदा पाटिया के 500 मुसलमानों को दंगों के दौरान उनके 'लिखित आदेश' के बावजूद शरण मुहैया कराने में ढुलमुल रवैया अपनाने का आरोप लगाया है.

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श्रीकुमार यह भी लिखते हैं कि ख़ुर्शीद अहमद और उनकी आईएएस पत्नी शमीना हुसैन को बाद में बेहतर तैनाती और मेडल से नवाज़ा गया.
आईपीएस अधिकारी खुर्शीद अहमद कहते हैं, "मुझे नहीं पता कि किताब में क्या लिखा है. मैं जानना भी नहीं चाहता और न कोई टिप्पणी करना चाहता हूँ."
खुर्शीद अहमद इस वक़्त वडोदरा में पुलिस प्रशिक्षण स्कूल के प्राचार्य हैं. वहीं ख़ुर्शीद की पत्नी और आईएएस अधिकारी शमीना हुसैन फिलहाल गुजरात ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड में निदेशक हैं.

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वह कहती हैं, "मेरे और मेरे पति पर लगाए गए सभी आरोप निराधार हैं. श्रीकुमार ऐसा सिर्फ़ प्रचार पाने के लिए कर रहे हैं. उस दिन (28 फरवरी 2002 को) क़रीब 500 मुसलमानों ने एसआरपीएफ़ परिसर में शरण ली थी. श्रीकुमार तो मेरे पति के संपर्क में भी नहीं थे. हम उनके ख़िलाफ़ मानहानि का दावा करेंगे."
बीबीसी हिंदी से बातचीत में श्रीकुमार ने कहा, ''कांग्रेस मेरी किताब पढ़ने के बाद बचाव का रास्ता खोजेगी क्योंकि इसमें सब कुछ सच लिखा है. पिछले साल राज्य सरकार को सौंपी गई नानावटी आयोग की रिपोर्ट को गुजरात विधानसभा में टेबल कराने के लिए कोई कांग्रेस विधायक अब तक आगे नहीं आया है. यह बताता है कि वो कहां खड़े हैं.''
फिलहाल श्रीकुमार गांधीनगर में रहते हैं. वो 2007 में रिटायर हुए और उसके बाद वो आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए. हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के एक अधिकारी के ख़िलाफ़ सीबीआई छापे के बाद उन्होंने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था.
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