दम तोड़ता मुंबई का 'काला घोड़ा'

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मुंबई के सांस्कृतिक केंद्र माने जाने वाले काला घोड़ा में मौजूद, प्रतिष्ठित म्यूज़िक स्टोर 'रिदम हाउस' अगले साल के शुरुआत में बंद होने जा रहा है. लेखक और मुंबई निवासी सिद्धार्थ भाटिया शहर के सबसे पुराने म्यूज़िक स्टोर के अंतिम घड़ियों में पुराने वक़्त को याद कर रहे हैं और बता रहे हैं कि काला घोड़ा पर बुरा समय कैसे आया.
सत्तर के दशक के समाजवादी रुझान वाले भारत में पश्चिमी लोकप्रिय और क्लासिक म्यूज़िक सुनना आसान नहीं था.
आयात के कड़े नियंत्रण की वजह से कुछ ही विदेशी चीज़ें भारत पहुंच पाती थीं जिसमें एक विनाइल रिकॉर्ड्स भी शामिल था.
सरकार के द्वारा नियंत्रित रेडियो हफ़्ते में बमुश्किल एक दिन पॉप म्यूज़िक का कार्यक्रम सुनवाते थे.
रॉक सुनने वाले नौजवानों के लिए उस वक्त के बॉम्बे का रिदम हाउस किसी छोटे से स्वर्ग से कम नहीं था.

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रिदम हाउस सात दशकों से एक ही परिवार, कर्मलियों, के द्वारा चलाया जा रहा है. रिदम हाउस जैज़ से लेकर बॉलीवुड के नए गानों और पॉप के विशाल संग्रह के लिए जाना जाता है.
यहां सिर्फ नौजवान लोगों के पसंद का संगीत ही नहीं रहता बल्कि फिल्मों के दिग्गज संगीत निर्देशक यहां अंतरराष्ट्रीय संगीत जगत में होने वाले नए बदलावों को जानने भी आते थे.
लेकिन 75 सालों से ग्राहकों की कई पीढ़ियों को संगीत का लुत्फ मुहैया करवाने वाला रिदम हाउस अब बंद होने की कगार पर खड़ा है.
पाइरेसी और तकनीकी विकास के कारण बहुत कम ग्राहक अब ऐसे रह गए है जो सीडी खरीद रहे हैं.
अब जब एमपी3 सीधे मोबाइल फोन पर ऑफनेट उपलब्ध है तो किसी नौजवान को क्या ज़रूरत पड़ी है कि वे सीडी पर गाना सुने?

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रिदम हाउस के बंद होने की घोषणा पर वे लोग काफी निराश हैं जो अभी भी विनाइल रिकॉर्ड को याद करते हैं और जिनके लिए रिदम हाउस सिर्फ एक दुकान नहीं है बल्कि काला घोड़ा की तरफ़ जाने पर एक आरामगाह की तरह होता था.
मुंबई के दक्षिणी हिस्से में स्थित काला घोड़ा एक बेहद मनमोहक जगह है.

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प्रिंस ऑफ वेल्स एडवर्ड VII की मूर्ति जिसपर यहां का नाम पड़ा, यहां से पहले ही 1965 में उपनिवेशवाद विरोधी भावनाओं के कारण हटा दी गई हैं.
लेकिन जिस चौराहे पर मूर्ति खड़ी थी, उसके चारों तरफ मौजूद इमारतें ख़ुद में इतिहास समेटे हुए हैं.
रिदम हाउस के सामने मौजूद है एस्प्लेनेड मैंशन जो कि किसी जमाने में भव्य वाटसन होटल हुआ करता था.

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यहां पर लूमयार भाइयों ने अपनी नई खोज सिनेमैटोग्राफी को केवल यूरोपीय दर्शकों को 1896 में दिखाया था.
इसे पार करते वेसाइड इन मौजूद है जहां भीमराव अंबेडकर हर दिन खाना खाते थे और नोट्स तैयार करते थे जो बाद में भारतीय संविधान का हिस्सा बना.
1940 के दशक में अरुण कोलहातकर ने काला घोड़ा पर अपनी कविताएं लिखी थीं. उन्होंने गलियों की रोजमर्रा की ज़िंदगी, आवारा कुत्तों, भिखारी औरतों और वेसाइड इन जहां वे सालों बैठते रहे, पर लिखा है.
म्यूज़िक शॉप को पार करने के बाद जो दूसरी गली पड़ती है उसमें मशहूर जहांगीर आर्ट गैलरी मौजूद है.
यहां भारत के अग्रणी कलाकार अपनी प्रदर्शनी लगा चुके है.

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वेनिस गोथिक स्टाइल की डेविड सैसून लाइब्रेरी 1870 में बनी थी. इसका नामकरण बग़दाद के एक यहूदी व्यापारी और दानकर्ता के नाम पर किया गया था.
यह आज भी वैसे ही मौजूद है और इन सबके अलावा 19वीं सदी का गोथिक एलफिंस्टन कॉलेज भी मौजूद है जहां से कई प्रतिष्ठित छात्र पास कर निकले हैं.
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि इतनी समृद्ध विरासत और इतिहास के कारण ही अक्सर काला घोड़ा को मुंबई की आत्मा कहा जाता है.
लेकिन अब धीरे-धीरे इसकी रौनक़ ख़त्म होती जा रही है. एक-एक करके पुराने प्रतिष्ठान या तो बंद होते जा रहे हैं या ख़राब हालत में हैं.
एस्प्लेनेड मैंशन पूरी तरह से ख़ाली कर दिया गया है क्योंकि इसके गिरने का डर है. इसे फिर से ठीक करने की सारी कोशिशें नाकामयाब रही हैं.

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कुछ साल पहले वेसाइड इन के मालिक ने फ़ैसला लिया कि पुराने तरीके के टेबलक्लॉथ और पश्चिमी खानों के दिन अब लद गए हैं तो उन्होंने इसे एक एशियाई ढंग वाले रेस्टॉरेंट में तब्दील कर दिया. लेकिन इस जैसे रेस्तरां शहर मेें पहले से भरे पड़े हैं.
इस साल के मार्च महीने में आर्ट गैलरी स्थित सैमोवर कैफे को 50 साल बाद किराए की जगह खाली करवा दी गई जहां अक्सर फिल्म निर्माता, कलाकार, लेखक और छात्र आया करते थे.
बीस सालों से यहां कुछ नागरिक समूहों के द्वारा काला घोड़ा फेस्टिवल चलाया जाता रहा है. इस फेस्टिवल में आर्ट, क्राफ्ट, म्यूज़िक और लिटरेचर पर ज़ोर रहता है जो कि इस जगह के स्वभाव से मेल खाती है.
लेकिन अभी एक साल पहले से इस पर भी ख़तरा मंडराने लगा है.
इसके आस-पास का इलाक़ा जल्द ही सिर्फ ना लालची भवन निर्माताओं के हाथ में आ सकता है बल्कि अति-महत्वकांक्षी राजनेता इसे टाइम्स स्कावयर जैसी जगह बनाने का भी सपना देख रहे हैं.

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हो सकता है ये सब ना हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि इस जगह को 'आधुनिक' बनाने के नाम पर भविष्य में इसमें बड़े बदलाव हों.
यहां के दुकानों के मालिक इस पर भले ही कुछ ना कहे लेकिन जो कुछ भी बदलाव होंगे वे कई पीढ़ियों की पुरानी यादों को यहां हमेशा के लिए दफ़न कर देंगी.
(सिद्धार्थ भाटिया 'इंडिया साइकेडेलिक' क़िताब के लेखक और द वायर इन के संपादक हैं.)
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