क्या यादव वोट बचा ले गए लालू?

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- Author, नीरज सहाय
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बिहार में चुनाव मुद्दों से ज़्यादा भावनाओं पर लड़े जाते हैं इसलिए दलों या गठबंधनों के स्टार प्रचारक धार्मिक, जातीय या क्षेत्रीयता की भावनाएं उभारकर वोटों का ध्रुवीकरण कराने की कोशिश करते हैं.
महागठबंधन के नेता लालू प्रसाद ने जब हिंदुओं के भी गोमांस खाने की बात कह दी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे हिंदुओं और खासकर गोपालक यादवों की भावनाएं आहत करने का मुद्दा बनाया.
<link type="page"><caption> क्या लालू केवल यादवों के नेता हैं?</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/10/151006_boojhiye_bihar_ko_lalu_yadav_sr" platform="highweb"/></link>
इस चुनाव में राजनीतिक विरोधियों के लिये डीएनए, पिशाच, शैतान, ब्रह्मपिशाच जैसे शब्दों से भी परहेज नहीं किया गया है. वहीं, आरक्षण और जंगलराज पर बहस जारी है.
लालू प्रसाद के गोमांस से संबंधित बयान से, पहले तो यादव समाज को भी ठेस लगी, लेकिन जैसे-जैसे लालू पर प्रधानमंत्री का जुबानी हमला तेज़ हुआ, इसकी प्रतिक्रिया में यादव समाज फिर लालू के पक्ष में ही गोलबंद होता दिखता है.
यादव एकजुट!

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राघोपुर के प्रदीप कुमार यादव बताते हैं कि यादव समाज लालू के बीफ़ वाले बयान को ग़लत मानता है फिर भी वह महागठबंधन और लालू के साथ ही है.
वो कहते हैं कि लालू पर लगातार हो रहे हमले से, विभाजित यादव वोट बैंक एकजुट हो रहा है.
रोहतास के आरबी सिंह यादव और पटना के उपेंद्र यादव का भी यही मानना है.
पटना के प्रोफेसर डीएम दिवाकर का कहना है कि चुनाव प्रचार में शब्दों के गिरते स्तर का इस्तेमाल एनडीए की हताशा और दलित-पिछड़े लालू प्रसाद के पक्ष में एकजुटता को दिखा रहा है.
हालाँकि उनका मानना है कि एनडीए को इस विवाद से फ़ायदा भी हुआ है. कुशवाहा, धानुक, वैश्य आदि समाज का एक हिस्सा एनडीए की ओर जाता दिख रहा है.
गोलबंदी की वजह

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इस गोलबंदी की वजह क्या है? खगड़िया के अंगद कुशवाहा कहते हैं, "लालू यादव के बीफ़ संबंधी बयान से कुशवाहा समाज आहत हुआ है. इसका खामियाजा लालू को चुनाव में भुगतना पड़ेगा."
मोकामा के नरेश महतो भी बताते हैं कि धानुक समाज में लालू के बयान की चर्चा है.
वरिष्ठ पत्रकार मिथिलेश कुमार के अनुसार, पहले चरण के चुनाव के बाद पीएम के लगातार ज़ुबानी हमले से जो यादव वोट बिखरे थे वो लालू के पक्ष में एकजुट होते जान पड़ रहे हैं.
लेकिन, अन्य पिछड़ी और अति-पिछड़ी जातियों का बड़ा समूह उनसे दूर जाता भी दिख रहा है.
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