'अकादमी की गरिमा गिरी, मगर इस्तीफ़ा नहीं'

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    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली से

साहित्य अकादमी प्रमुख डॉक्टर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा है कि लेखकों के लगातार <link type="page"><caption> सम्मान लौटाने</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/10/151012_writers_returning_sahitya_akademi_du.shtml" platform="highweb"/></link> से अकादमी की गरिमा घटी है.

उन्होंने बताया कि अब तक 21 लेखक सम्मान लौटा चुके हैं.

गोरखपुर से फ़ोन पर बात करते हुए डॉक्टर तिवारी ने कहा, “ विरोध दर्ज कराने का लेखकों का तरीका सही नहीं है और लेखक अपनी ही संस्था का अपमान कर रहे हैं. वो अपनी संस्था की गरिमा घटा रहे हैं.”

(<link type="page"><caption> पूरी बातचीत के लिए क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/multimedia/2015/10/151014_akademi_head_vk.shtml" platform="highweb"/></link>)

ज्ञानपीठ के बाद साहित्य अकादमी देश का सबसे बड़ा साहित्य पुरस्कार है और सम्मान पाने वाले लेखकों की किताबें विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रकाशित की जाती हैं.

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हिंदी के चर्चित लेखक <link type="page"><caption> उदय प्रकाश</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150904_uday_prakash_return_sahitya_akademi_dil.shtml" platform="highweb"/></link> साहित्य अकादमी लौटाने वाले सबसे पहले लेखक थे. उन्होंने कन्नड़ साहित्यकार और विचारक एमएम कालबुर्गी की हत्या के विरोध में सम्मान लौटाया था.<link type="page"><caption> </caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150904_uday_prakash_return_sahitya_akademi_dil.shtml" platform="highweb"/></link>

उसके बाद मशहूर लेखिका और जवाहरलाल नेहरू की भांजी <link type="page"><caption> नयनतारा सहगल</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/10/151006_nayantara_returns_sahitya_akademi_pkp.shtml" platform="highweb"/></link> ने साहित्य अकादमी लौटाने की घोषणा की थी.

नयनतारा सहगल ने हाल की कुछ हिंसक घटनाओं का ज़िक्र करते हुए नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर भी सवाल उठाए थे.

डॉक्टर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि उन्होंने 23 अक्टूबर को अकादमी के बोर्ड की आपात बैठक बुलाई है जिसमें पुरस्कार लौटाने वालों पर फ़ैसला लिया जाएगा.

'अकादमी की सीमाएं'

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के आरोप पर डॉक्टर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा, “इसका एक लंबा इतिहास है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में हर लेखक विश्वास करता है, फिर साहित्य अकादमी क्यों नहीं विश्वास करेगी. साहित्य अकादमी की कुछ सीमाएँ हैं.”

डॉक्टर तिवारी ने कहा, “ इस्तीफ़ों का कारण अख़बार में ये आ रहा है कि मोदी जी की चुप्पी के विरोध में (इस्तीफ़े दिए गए). बाद में पता नहीं कि ये कैसे बदलकर साहित्य अकादमी की चुप्पी में बदल गया, ये समझ में नहीं आया.... साहित्य अकादमी सरकारी संस्था नहीं है. साहित्य अकादमी चुप नहीं रही है.”

क्या सरकार को और मुखर तौर पर इस बारे में बोलना चाहिए था, इस पर डॉक्टर तिवारी ने कहा, “ये मैं मानता हूं कि सरकार को और मुखर होना चाहिए, बोलना चाहिए लेखकों के पक्ष में.... (इस मामले में) देर हो गई. ना के बराबर बोला गया.”

नरेंद्र मोदी की चुप्पी के आरोप पर डॉक्टर तिवारी ने टिप्पणी करने से मना कर दिया और कहा, “बहुत बड़े लोग होते हैं, उनका रिएक्शन भी तुरंत नहीं आता है.... वो (मोदी) कब बोलेंगे, कब नहीं बोलेंगे, इसके लिए हम क्या कह सकते हैं.”

डॉक्टर तिवारी ने इन आरोपों से भी इनकार किया कि उन्हें पद का मोह है लेकिन उन्होंने कहा कि उन्होंने पद छोड़ने के बारे में नहीं सोचा क्योंकि उन्हें “लेखकों ने चुना है” और उन्हें “लेखकों द्वारा निर्विरोध चुना गया था”

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