'भैंस का दूध पीकर गाय बचाने के नारे'

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- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गाय राजनीति का मुद्दा बन गई है.
नोएडा के दादरी इलाके में गोमांस खाने के संदेह में अख़लाक़ अहमद की हत्या के बाद गायों के सवाल पर शुरु हुई बहस हर दिन गर्म होती जा रही है.
श्री गोपाल गोवर्धन गोशाला ट्रस्ट पथमेड़ा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और ट्रस्ट से जुड़े पथमेड़ा पंचगव्य के चेयरमैन जगदीश परिहार ने बीबीसी से बातचीत में आगाह किया, "सिर्फ़ राजनीति करने से गाय नहीं बचेगी".
राजस्थान के जालौर ज़िले में स्थित श्री गोपाल गोवर्धन गोशाला ट्रस्ट का दावा है कि वह एक लाख 28 हज़ार लावारिस गायों की देखभाल करता है. परिहार ट्रस्ट के अध्यक्ष रहे हैं और अब भी उसके साथ सक्रिय तौर पर जुड़े हुए हैं.
'नहीं बचेगी गाय'

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परिहार ने कहा कि अगर गायों और गाय पालने वाले किसानों की दशा पर ध्यान नहीं दिया गया तो चार दशकों में ही गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं.
वो चेतावनी देते हैं, "चालीस से पचास साल बाद गाय की पूजा के लिए फोटो तो मिलेगी लेकिन गाय नहीं मिलेगी".
दादरी की घटना के बाद गायों को लेकर शुरु हुई राजनीति पर परिहार कहते हैं, "सिर्फ़ बयान देने से गायों की दशा नहीं सुधरेगी. वो कहते हैं लोग अपने स्वार्थ के लिए राजनीतिक रोटियां सेकने में जुटे हैं".
परिहार कहते हैं, "जो माइक पर तो बोलते हैं, गाय की जय हो. गाय के लिए टीवी पर बोलते हैं. आंदोलन करते हैं. बहस में बैठते हैं, उनसे पूछो गाय का दूध और घी घर में इस्तेमाल में करते हो? वो दूध तो पीते हैं भैंस का और बहस करते हैं गाय के लिए."
नीयत पर सवाल

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परिहार मानते हैं कि गायों को मां कहा जाता है लेकिन उसकी देखभाल मां की तरह नहीं की जाती. गायों को बचाने के लिए उन पर ध्यान देना ज़रूरी है.
वो कहते हैं,"जितने आदमी गाय के लिए बोलते हैं अगर वो गाय की सेवा में लग जाएं तो दूसरे दिन कहीं गौशाला की ज़रूरत नहीं रहेगी. किसान को अगर दूध का मूल्य पूरा मिल जाए तो वो गाय क्यों छोड़ेगा? गोमूत्र का पैसा मिले तो वो गाय क्यों छोड़ेगा? दूध न देने वाली गाय भी वो अपने घर रखेगा."
वर्षों से गायों की देखरेख में जुटे परिहार का दावा है कि गायों के नाम पर राजनीति करने वाले ज़्यादातर लोग घर में गाय नहीं रखते.
शेर बनाम गाय

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वो सरकार के रवैए से भी निराश हैं.
परिहार कहते हैं, "शेरों के लिए करोड़ों खर्च करने वाली सरकार गाय के लिए खर्च नहीं करती. वजह ये है कि गाय की बात सांप्रदायिक हो जाती है."
परिहार के मुताबिक श्री गोपाल गोवर्धन गोशाला ट्रस्ट 1993 से निराश्रित गायों की देखभाल में जुटा है.
उनका दावा है कि ट्रस्ट जिन गायों की देखभाल कर रहा है उनमें से सिर्फ़ दो फ़ीसदी ही दूध देती हैं. ये संस्था 'एक परिवार, एक गाय' नियम से गायों को बचाने की मुहिम चला रही है.
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