...तो गांधी मरता है तो मरने दो

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
सितंबर, 1931 को एक ठंडे, नम दिन खादी की धोती पहने और गोल फ़्रेम का चश्मा लगाए एक नाटा शख्स फ़ॉकेस्टोन बंदरगाह पर उतरा.
वहाँ पर कई प्रेस रिपोर्टर, सांसद और खुद कैंटरबरी के डीन उनके स्वागत में खड़े थे.
अगले ढ़ाई महीनों तक उनका गंजा सिर, नंगे पैर और ब्रितानी प्रेस के शब्दों में ‘उनका लॉएनक्लॉथ और शॉल’ लंदन की सड़कों का आमफ़हम दृश्य बना रहा.
अब तक गांधी विश्व स्तर की शख़्सियत बन चुके थे. नमक सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय प्रेस कवरेज ने उन्हें पूरी दुनिया में मशहूर बना दिया था.
जब वो यूस्टन रोड पर अपने दोस्त के घर रहने पहुंचे तो बारिश के बावजूद सैकड़ों लोग उनकी एक झलक पाने के लिए वहाँ मौजूद थे.
राजा ने चाय पर बुलाया

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वैसे तो गांधी दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में भाग लेने लंदन आए थे, लेकिन उन्होंने इस मौक़े का इस्तेमाल ब्रिटेन के आम लोगों से नज़दीकी के लिए किया.
वो लंकाशायर की उन कपड़ा मिल मज़दूरों से मिलने गए जिनके बारे में विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि अगर गांधी का बस चला तो जल्द ही उनको काम मिलने के लाले पड़ जाएंगे.
लेकिन इसके बावजूद उन मज़दूरों ने बहुत गर्मजोशी से गांधी का स्वागत किया.
'टाइम' पत्रिका ने इस यात्रा पर हल्की-फुल्की टिप्पणी करते हुए लिखा था, "महात्मा की इंग्लैंड यात्रा का एक ही ठोस परिणाम निकला है कि लंदन में बकरियों और उनके दूध के दाम बढ़ गए हैं."
गांधी मशहूर अभिनेता चार्ली चैपलिन से भी मिले और इंग्लैंड के राजा ने भी उन्हें बकिंघम पैलेस में चाय पर बुलाया था.
मशहूर इतिहासकार आर्थर हर्मन अपनी क़िताब 'गांधी एंड चर्चिल, द एपिक राइवेलरी' में लिखते हैं, "ये मुलाक़ात नए सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट ऑफ़ इंडिया सर सैमुएल होर के सौजन्य से हुई थी."
गांधी अड़े
पहले तो राजा ने इस ‘विद्रोही फ़कीर’ से मिलने से इनकार कर दिया था. गांधी भी इस बात पर अड़ गए थे कि वो राजा से मिलने धोती और अपनी खादी की शॉल में ही जाएंगे."

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"बाद में होर के ज़ोर देने पर ये बैठक हुई, लेकिन उन्होंने राजा को बुदबुदाते सुना कि ये ‘नाटा आदमी’ ‘पर्याप्त कपड़े’ भी नहीं पहने हुए था. चलते-चलते राजा गांधी से अपने आप को कहने से नहीं रोक पाए, ‘याद रखिए मिस्टर गांधी, मैं आपकी तरफ़ से अपने साम्राज्य पर किए गए किसी वार को बर्दाश्त नहीं करूँगा.’
गांधी ने मुस्कराकर जवाब दिया था, ’मैं आपके महल में, आपकी मेहमाननवाज़ी के बाद, आपसे किसी राजनीतिक बहस में नहीं उलझना चाहूँगा.’’
बाद में जब गांधी से पूछा गया कि क्या आप समझते हैं कि शाही मुलाक़ात के लिए आपका परिधान उपयुक्त था, उन्होंने छूटते ही जवाब दिया था, "राजा ने हम दोनों के हिस्से के कपड़े पहने रखे थे."
लॉर्ड इरविन भी प्रभावित

रॉबर्ट पेन अपनी क़िताब 'लाइफ़ एंड डेथ ऑफ़ महात्मा गांधी' में लिखते हैं, "इससे पहले भारत में ब्रिटेन के पूर्व वॉयसराय लॉर्ड इरविन जॉर्ज पंचम को बता चुके थे कि जब गांधी उनसे मिलने वॉयसराय हाउस आए थे, तब भी वो भवन के चमचमाते संगमरमरी हॉल में अटपटे से दिखाई दे रहे थे."
"लेकिन तब भी आप उनकी छोटी लेकिन तेज़ आँखों के पीछे की नैतिक शक्ति को महसूस कर सकते थे. उनका दिमाग़ तब भी बहुत अधिक स्फूर्तिवान था."
'राजद्रोही' गांधी

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लेकिन उस समय ब्रिटेन की कंज़रवेटिव पार्टी के उभरते नेता विंस्टन चर्चिल को गांधी-इरविन की वो मुलाक़ात बहुत नागवार गुज़री थी.
उन्होंने कहा था, "मिस्टर गांधी जैसे राजद्रोही, मिडिल टैंपिल वकील का अर्ध नग्न हालत में वॉयसराय के महल की सीढ़ियाँ चढ़ना और राजा के प्रतिनिधि से बराबर के स्तर पर बात करना बहुत ख़तरनाक और घृणास्पद था, ख़ासकर तब जब वो ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ असहयोग आँदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. इस तरह का दृश्य भारत में अशांति को बढ़ा सकता है और वहाँ पर काम कर रहे श्वेत लोगों को परेशानी में डाल सकता है."
जब गांधी को गोलमेज़ सम्मेलन में शामिल होने का न्योता दिया गया तब भी चर्चिल ने उसका ज़ोरदार विरोध करते हुए कहा, "गांधी ने अपना आन्दोलन वापस नहीं लिया है, उसे स्थगित भर किया है. इसको दोबारा शुरू करने के लिए उन्हें अपनी छोटी उंगली भर उठाने की देर है."
पानी के साथ ग्लूकोज़

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1942 में जब ये पता चला कि गांधी अनशन पर जाने वाले हैं तो चर्चिल की वार कैबिनेट ने तय किया कि गांधी को मरने दिया जाएगा.
लेकिन लिनलिथगो को शक़ था कि इस मसले पर वॉयसराय काउंसिल के कुछ भारतीय सदस्य शायद इस्तीफ़ा दे सकते हैं.
जब चर्चिल को ये पता चला तो उन्होंने वायसराय को लिखा, "अगर कुछ काले लोग इस्तीफ़ा दे भी दें तो इससे फ़र्क क्या पड़ता है. हम दुनिया को बता सकते हैं कि हम राज कर रहे हैं. अगर गांधी वास्तव में मर जाते हैं तो हमें एक बुरे आदमी और साम्राज्य के दुश्मन से छुटकारा मिल जाएगा. ऐसे समय जब सारी दुनिया में हमारी तूती बोल रही हो, एक छोटे बूढ़े आदमी के सामने जो हमेशा हमारा दुश्मन रहा हो, झुकना बुद्धिमानी नहीं है."
जब गांधी का अनशन कुछ लंबा खिच गया तो चर्चिल ने वॉयसराय लिनलिथगो को पत्र लिखा, "मैंने सुना है कि गांधी अपने अनशन के ड्रामे के दौरान पानी के साथ ग्लूकोज़ ले रहे हैं. क्या इस बात की जाँच कराई जा सकती है? अगर इस जालसाज़ी का भंडा फूटता है तो ये हमारे लिए बेशक़ीमती होगा."
मार्टिन गिलबर्ट अपनी किताब 'रोड टू विक्ट्री' में लिखते हैं कि लिनलिथगो ने बाकायदा इसकी जाँच करवाई और चर्चिल के आरोप ग़लत पाए गए.
अब तक मरे क्यों नहीं?

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गांधी के अनशन से चर्चिल इतने चिढ़ गए कि उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका के प्रधानमंत्री जनरल स्मट्स को पत्र लिखा, "मैं नहीं समझता कि गांधी के मरने की कोई इच्छा है. मेरा मानना है कि वो मुझसे बेहतर खाना खा रहे हैं."
जब बंगाल के सूखे के दौरान लार्ड वेवल ने भारत को तुरंत अनाज भेजे जाने की मांग की तो चर्चिल इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने वेवल को एक तार भेजा कि "गांधी अब तक मरे क्यों नहीं हैं?"
जब गांधी ने भारत की आज़ादी के आश्वासन के बदले ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों में मदद की पेशकश की तो चर्चिल ने कहा, "वॉयसराय को इस देशद्रोही से बात नहीं करनी चाहिए और उसे दोबारा जेल में डाल देना चाहिए."
सालों बाद चर्चिल ने स्वीकार किया कि उनके चुनाव हारने से सिर्फ़ एक अच्छी बात ये हुई कि भारत को आज़ादी देने का फ़ैसला जब हुआ तब वो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री नहीं थे.
पाँच साल पहले जिस शख़्स ने सार्वजनिक रूप से ये ऐलान किया था कि हम अनिश्चित काल तक भारत पर राज करते रहेंगे, ये फ़ैसला लेना सबसे बड़ा अपमान होता.
गांधी का चर्चिल को पत्र

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17 जुलाई, 1944 को गांधी ने चर्चिल को एक पत्र में लिखा था, "मैंने सुना है कि आप एक साधारण ‘नंगे फ़कीर’ को कुचल देना चाहते हैं. मैं बहुत लंबे समय से फ़क़ीर होने की कोशिश कर रहा हूँ. नंगा होना और भी मुश्किल काम है. आपने मेरे लिए जिस शब्द का इस्तेमाल किया है, उसको मैं अपनी तारीफ़ के तौर पर लेता हूँ, हालांकि ऐसा करने का शायद आपका इरादा नहीं था. मेरी दिली इच्छा है कि आप मुझ पर भरोसा रखें और अपने और हमारे लोगों के लिए मेरा इस्तेमाल करें."
चर्चिल के क़रीब जाने की ये गांधी की आख़िरी कोशिश थी. लेकिन चर्चिल को ये पत्र नहीं मिला.
दो महीने तक अपने पत्र के जवाब का इंतज़ार करने के बाद गांधी ने वॉयसराय के निजी सचिव से संपर्क किया. उन्होंने उन्हें बताया कि वो पत्र लंदन पहुंचा ही नहीं.

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गांधी ने उस पत्र को दोबारा भेजने का आग्रह किया, लेकिन तब तक चर्चिल के साथ सुलह करने का मनोवैज्ञानिक क्षण बीत चुका था. चर्चिल ने गांधी के ख़त का जवाब नहीं दिया.
अगर वो जवाब देना भी चाहते थे, तब भी वो कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं थे क्योंकि 26 जुलाई, 1945 को ब्रिटेन की जनता ने दूसरे विश्व युद्ध में ऐतिहासिक जीत दिलवाने वाले विंस्टन चर्चिल को सत्ता से बेदख़ल कर दिया था.
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