पुरुष जीडीपी बढ़ाने करेंगे घर का काम?

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भारत में अगर पुरुषों की तरह महिलाओं को पेशेवर कामकाज के पूरे मौक़े मिलें तो इससे दस साल बाद देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में 16 फ़ीसद का इज़ाफ़ा हो सकता है.
व्यवसाय और आर्थिक क्षेत्र में शोध करने वाले संस्थान ग्लोबल मैकेंज़ी इंस्टीट्यूट की ताज़ा रिपोर्ट में ये बात कही गई है.
रिपोर्ट कहती है कि कामकाजी क्षेत्र में लैंगिक समानता के मामले में भारत अपने कई पड़ोसी देशों से भी पीछे है.
रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में महिलाओं की आबादी 61.2 करोड़ है. लेकिन देश के श्रम शक्ति में उनकी हिस्सेदारी केवल 24 फ़ीसद है जबकि वैश्विक स्तर पर ये औसत 40 फ़ीसद के आसपास है.
इस रिपोर्ट की लेखिका अनु मडगावकर कहती हैं, "अगर ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं काम करेंगी तो अर्थव्यवस्था का उत्पादन बढ़ेगा."
इसका एक मतलब यह भी है कि भारतीय पुरूषों को पहले से ज़्यादा घर का काम करना होगा.
असमानता की वजह
एशिया विकास बैंक की एक हालिया रिपोर्ट में भी कहा गया है कि महिलाओं को श्रम शक्ति का हिस्सा बना कर आर्थिक विकास दर को बढ़ाने की संभावनाएं बेहतर बनाई जा सकती हैं.

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वैसे श्रम शक्ति में इस तरह की लैंगिक असमानता की एक वजह महिला और पुरुष की परिवार और समाज में पारंपरिक भूमिकाओं से जुड़ी धारणाओं को भी माना जाता है.
मैकेंज़ी की रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि उन्होंने सर्वे में पूछे गए इस सवाल के जवाबों का भी विश्लेषण किया कि 'अगर मां बाहर काम करती है तो इससे बच्चों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. क्या आप इस बात से सहमत हैं?'
उनका कहना है कि इस सवाल के जवाब में बड़ी संख्या में पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी इस बात से सहमति जताई.
भारत में जहां सर्वे में ऐसी सहमति जताने वाली महिलाओं की संख्या 71 फ़ीसद थी तो वहीं ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, जापान, नीदरलैंड्स, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, स्पेन और स्वीडन में सहमति जताने वाले पुरुषों और महिलाओं की संख्या 29 फ़ीसद थी.
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