बसने से पहले उजड़ रही है अपराधी जनजातियां

कब्रिस्तान

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    • Author, विकास वाजपेयी
    • पदनाम, कानपूर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

सुनने में ये अजीब सा लगता है, लेकिन 72 साल की माया देवी को देश के आज़ाद होने के बाद भी खुली हवा में सांस लेने का मौका नहीं मिला है.

अंग्रेज़ हुकूमत में खुली हवा में सांस लेने के लिए किए गए मायादेवी के परिवार और जातीय लोगों का आंदोलन भारत के स्वत्रंत होने के बाद भी बदस्तूर जारी रहा.

ये कहानी है एक ऐसी जनजाति की जिसे अपराधी होने का तमगा पैदा होते ही दे दिया जाता है.

आज़ाद भारत में भी राहत नहीं

माया देवी का कहना है कि ब्रिटिश हुकूमत में तो कम से कम रहने और खाने का ठिकाना नसीब था, लेकिन हमारी खुद की सरकारों और लोगों की निगाहें अब अंग्रेजों की दी गई इस ज़मीन पर पड़ने लगी है.

माया देवी

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कानपुर की 159 एकड़ ज़मीन पर क्रिमिनल ट्राइब सेटलमेंट प्लान, सीटीएस कॉलोनी को ब्रितानी हुकूमत ने 1922 में पैदाइशी अपराधिक कही जाने वाली जनजातियों के लिए बसाया था.

उत्तर भारत में अपराध के लिए कुख्यात हबूडा, भातू, धतुरिया जैसी जातियों के लिए शहर के बाहरी हिस्सों में चार शहरों में ऐसी व्यवस्था की गई थी.

मुरादाबाद, गोरखपुर, पलिया और कानपुर में 1871 के अपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत इन्हें बसाया गया था.

इन कॉलोनियों को एक खुली जेल की शक्ल दी गई थी, जिसमें ठगी और अपराध की तरफ रुझान रखने वाली जनजातियों के सदस्यों और उनके परिवार के लोगों को क़ैद रखने की व्यवस्था थी और रात में गेट के पास बनी पुलिस चौकी में इन्हें तीन बार सूचना देनी पड़ती थी.

1947 को भारत आज़ाद हुआ तो इस जनजाति के लोगों ने भी पहरेदारी की इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाई.

सरकारें उदासीन

कॉलोनी के एक बुज़ुर्ग बताते हैं कि 1951 में इस व्यवस्था और पहरेदारी को समाप्त कर इन परिवारों को मिले मकानों को नियमित करने का फ़रमान तो दिया, लेकिन ये सिर्फ़ काग़जों तक रहा.

सरदार पटेल (फ़ाइल फोटो)

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1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने हर परिवार के मुखिया को एक एकड़ ज़मीन देने की घोषणा की, लेकिन वो भी हक़ीक़त से दूर रही और सरकारी अभिलेखों में कोई नाम नहीं चढ़ाया गया.

इस जनजाति के लोगों के अधिकारों के लिए लड़ रहे कार्यकर्ता रवि शुक्ला बताते हैं कि शहर के फैलाव के साथ ही सीटीएस कॉलोनी की ज़मीन के दाम भी बढ़े हैं और अब इस पर भूमाफ़िया की नज़र है.

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एक और सामाजिक कार्यकर्ता बॉबी शर्मा बताते हैं कि धीरे-धीरे 159 एकड़ ज़मीन में से लगभग 30 एकड़ जमीन पर लिंक रोड और सरकारी छात्रावास बन गया है. अब 25 एकड़ जमीन पर अस्पताल बनने के प्रस्ताव ने यहाँ के लोगों की बेचैनी बढ़ा दी है.

इस जनजाति को खेती के लिए दी गई ज़मीन पर अब दुकानें खोल ली गई हैं.

ज़मीन का ग़लत इस्तेमाल

कानपुर की ज़िलाधिकारी डॉक्टर रोशन जैकब कहती हैं, "काफी समय से यहाँ के परिवारों को दी गई खेती की ज़मीन का गलत इस्तेमाल हो रहा है.”

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उन्होंने कहा कि यहाँ के लोगों को जिस उद्देश्य से ये ज़मीन दी गयी थी उस पर दुकानें खोलकर और उन्हें किराये पर उठाकर उसका नाजायज़ उपयोग हो रहा है और भू माफ़िया इसका फायदा उठाकर अवैध निर्माण कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि जहाँ तक 25 एकड़ में अस्पताल बनने की बात है तो ये प्रस्ताव अभी शासन स्तर पर लंबित है.

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