मीट खाएँ या सब्ज़ी, सरकार क्यों बताए

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पिछले दिनों मैंने <link type="page"><caption> बीबीसी अंग्रेजी</caption><url href="(http://www.bbc.co.uk/news/magazine-34198390)" platform="highweb"/></link> न्यूज़ वेबसाइट पर एक ऐसे मुर्गे की कहानी पढ़ी, जो सिर कटने के बाद भी लगभग डेढ़ साल ज़िंदा रहा.
इस मुर्गे का नाम माइक रखा गया था और यह किस्सा अमरीका में 70 साल पहले पेश आया था.
लेकिन मैं इस कहानी की अहमियत 70 साल बाद भारत के संदर्भ में समझ रहा हूँ.
दाल नहीं, मीट

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डेढ़ साल पहले जब से मोदी सरकार बनी है, मांस, ख़ासकर गोमांस पर केवल चर्चाएं ही नहीं बढ़ी हैं, बल्कि इस पर प्रतिबंध भी लगाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं.
अगर यही हाल रहा तो कहीं ऐसा ना हो कि भारत में माइक की तरह कुछ अरसे बाद मांसाहारियों की आदत की छुट्टी हो जाए.
मुझे तो कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, क्योंकि मैं बीफ़ नहीं खाता और मटन कभी-कभी खा लेता हूँ. ना भी मिले तो इसे 'मिस' नहीं करता.
लेकिन मैं उन बेचारों के बारे में सोच रहा हूँ जो रोज़ बीफ़ खाते हैं, क्योंकि वो रोज़ दाल या सब्ज़ी नहीं खरीद सकते. मैं उनके बारे में सोच रहा हूँ जो बीफ़ बेच कर अपना परिवार चलाते हैं.
देश के आदिवासी हों या फिर ग़रीब हिंदू और मुस्लिम, जनता को पोषण आमतौर पर बीफ़ से मिलता है.
'मेरा खाना, मेरा फ़ैसला'

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मैं उनके बारे में सोच रहा हूँ जो क्या खाएं, क्या न खाएं, इसका फैसला ख़ुद करना चाहते हैं.
ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि सरकार कौन होती है ये बोलने वाली कि मीट नहीं सब्ज़ी खाओ या ख़ास दिनों पर मीट न बेचो?
क्या ये सवाल नरेंद्र भाई मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले उठाए जा रहे थे? क्या ये राष्ट्रीय बहस का मुद्दा थे?
जम्मू-कश्मीर में 1932 से गोहत्या पर पाबंदी लगाई गई थी, लेकिन अब अचानक वहां उस प्रतिबंध को लागू किया जा रहा है.
कश्मीर वादी के अधिकतर कश्मीरी मुसलमान भेड़ का मांस खाते हैं, लेकिन वे गोहत्या पर पाबंदी का विरोध कर रहे हैं.
विवाद क्यों?

मीट पर ताज़ा विवाद जैन समाज के एक त्योहार के दौरान कई स्थानों पर मीट के व्यापार पर लगाई गई पाबंदी के फ़ैसले से शुरू हुआ है.
इस त्योहार के दौरान पिछले कई सालों से ये पाबंदी लागू है. फ़र्क़ ये है कि इस साल ये प्रतिबंध दो दिनों के बजाय चार से आठ दिनों के लिए लगाया गया था.

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केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता निर्मला सीतारमण ने इस बात पर आश्चर्य जताया जताया कि ये पाबंदी जैन त्योहार के समय कई सालों से लगाई जा रही है, तो इसमें विवाद किस बात का और बीजेपी को बदनाम क्यों करें?
सतही तौर पर देखें तो फ़र्क़ केवल प्रतिबंध की अवधि का है. लेकिन अगर इसकी गहराई में जाएँ और इसके आसपास के कुछ और मुद्दों पर ध्यान दें तो एक पैटर्न नज़र आता है.
निर्मला सीतारमण ने जिस मासूमियत से इस मुद्दे पर अपनी पार्टी का पक्ष रखा उससे दाल में कुछ काला ज़रूर नज़र आता है.
मीट बिक्री पर रोक

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यह विवाद शुरू हुआ 4 सितंबर को मुंबई से सटे मीरा भयंदर में. उस दिन बीजेपी के पार्षदों के नेतृत्व में नगर निगम ने त्योहार के दौरान एक हफ़्ते के लिए मीट की बिक्री पर बैन लगाने का एक प्रस्ताव पारित किया.
इसके कुछ दिनों बाद मुंबई और नवी मुंबई की महानगर पालिकाओं में भी प्रतिबंध लगाए गए. इसके बाद महाराष्ट्र से बाहर राजस्थान और गुजरात में भी वैसे ही प्रस्ताव पास किए गए.
शिव सेना ने इस फ़ैसले को असंवैधानिक और ग़ैर क़ानूनी बताया है.
सोशल मीडिया पर विवाद

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हाल में कहीं पढ़ा था कि देश का दो तिहाई बहुमत मांसाहारी है. मान लीजिए कि आधी आबादी भी अगर मांस खाती है तो इस पर पाबंदी क्यों?
शिव सेना के नेता संजय राउत के अनुसार, अगर इस तरह की पाबंदियां बढ़ती गईं तो आगे चल कर समाज में फूट पड़ने का ख़तरा पैदा हो सकता है.
सोशल मीडिया पर यह फूट तो अभी से नज़र आने लगी है. मैं फेसबुक और ट्विटर पर शाकाहारियों और मांसाहारियों के बीच मीट पर बहस रोज़ देखता हूँ. उम्मीद करता हूँ कि यह विवाद सोशल मीडिया तक सीमित रहे.
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