यूपी में ओवैसी की धमक वाया बिहार

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- Author, नवीन जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
साल 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से उत्तर प्रदेश के मुसलमानों का समर्थन पाते रहने वाले समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के चेहरे पर इधर चिंता की लकीरें हैं.
उनकी चिंता का विषय पीस पार्टी के अध्यक्ष डॉक्टर अयूब का वह बयान नहीं है जिसमें उन्होंने प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार के ख़िलाफ़ एक सौ रैलियां करके मुसलमानों के साथ उनकी वादाख़िलाफ़ी की पोल खोलने का कार्यक्रम घोषित किया है.
बल्कि मुलायम के माथे पर लकीरें डाली हैं असदुद्दीन ओवैसी के एक ताज़ा नारे ने.
ओवैसी ने हाल ही में बिहार के चुनावी संग्राम में उतरने का ऐलान करके लालू-नीतीश महागठबंधन के सामने बड़ी बाधा खड़ी की है और अब यूपी की तरफ़ मुंह करके मुसलमानों को नारा दिया है- ‘पहले भाई, फिर भाजपा हराई, उसके बाद सपाई.’
यानी मुसलमान वोटरों के लिए सबसे पहले अपना भाई यानी मुसलमान प्रत्याशी है, फिर वह जो भाजपा को हरा सकें और उसके बाद सपा प्रत्याशी.
मुलायम की परेशानी स्वाभाविक है. वे पिछले 23 वर्षों से मुसलमानों की पहली पसंद रहे हैं. अब ओवैसी कह रहे है कि उन्हें तीसरी पसंद बनाओ.
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सपा मुखिया ने पीस पार्टी के डॉक्टर अयूब के बयान को गंभीरता से नहीं लिया. वो जानते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों में एकाएक लोकप्रिय हुई पीस पार्टी अब अपना आधार खो चुकी है.
2012 के विधान सभा चुनाव में उसके चार विधायक जीते थे और वोट भी अच्छे मिले थे. जितनी तेज़ी से यह पार्टी उभरी उतनी ही जल्दी बिखर भी गई.
तीन विधायक डॉक्टर अयूब को छोड़कर इधर-उधर चले गए.
लेकिन असदुद्दीन ओवैसी? ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का अध्यक्ष और यह तेज़-तर्रार हैदराबादी सांसद हाल के दिनों में मुसलमानों में बहुत लोकप्रिय होकर उभरा है.
उनके आक्रामक भाषणों ने मुसलमानों की युवा पीढ़ी को विशेष रूप से प्रभावित किया है.
वो कहते हैं कि मुसलमानों की अपनी पार्टी और अपने नेता ही उनका असली भला कर सकते हैं.
बाकी पार्टियां मुसलमानों में भाजपा का डर पैदा कर, उनकी सुरक्षा के नाम पर उनके वोट से सत्ता का भोग करती रही हैं.
कर्नाटक, महाराष्ट्र के बाद बिहार

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कर्नाटक और महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में अच्छे वोट पाकर ओवैसी ने राजनीतिक दलों का ध्यान खींचा.
हाल में जब उन्होंने बिहार के मुस्लिम बहुल किशन गंज में सभा की तो बारिश के बावज़ूद जो भीड़ जुटी उसने लालू-नीतीश गठबंधन के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी.
मुसलमानों में ओवैसी के भाषणों की चर्चा है. सोशल साइटों पर मुस्लिम युवाओं के बीच वो बहुत लोकप्रिय हुए हैं.
फ़ेसबुक की उनकी वॉल पर दो सितम्बर की दोपहर तक पौने चार लाख लाइक्स थे और ट्विटर पर 79 हज़ार फॉलोअर. फैन क्लब सदस्यों की संख्या हज़ारों में है.
2014 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सपा सरकार ने ओवैसी को आज़मगढ़ समेत कुछ अन्य जगहों पर सभा करने की अनुमति नहीं दी थी.
मुलायम आजमगढ़ से भी चुनाव लड़ रहे थे. ज़ाहिर है तब सपा ओवैसी को मुस्लिम वोटरों से दूर ही रखना चाहती थी.
उस समय ओवैसी बहुत गुस्से में यूपी से लौटे थे. सोशल साइटों पर टिप्पणियों में उनका गुस्सा ज़ाहिर हुआ था, लेकिन वे गुस्से तक ही सीमित नहीं रहे.
यूपी अगला लक्ष्य

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इस बीच, उन्होंने प्रदेश में पार्टी का तेज़ी से विस्तार किया.
पार्टी के यूपी संयोजक शौकत अली बताते हैं कि 45 ज़िलों में उनका संगठन अच्छी तरह खड़ा हो चुका है, कुल 66 ज़िलों में सदस्यता अभियान चल रहा है और अब तक साढ़े सात लाख पार्टी सदस्य बनाए जा चुके हैं.
रमज़ान के महीने में ओवैसी ने आगरा और मेरठ का दौरा किया था. शौकत अली के अनुसार, अगले कुछ महीनों में वे छह-सात दिन के लिए यूपी के दौरे पर आएंगे.
फिलहाल ओवैसी का ध्यान बिहार चुनाव पर है. चर्चा है कि वहां वे कोई 25 उम्मीदवार खड़े करेंगे, ख़ासकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में. किशनगंज की सभा ने संकेत दे दिए हैं कि वे बिहार में लालू-नीतीश के जातीय-धार्मिक आधार में सेंध लगा सकते हैं.
बिहार के बाद 2017 में यूपी की बारी होगी. पार्टी संयोजक के बताए आंकड़े कहते हैं कि ओवैसी ने यहां अच्छी तैयारी की है. पहले वे इस वर्ष के अंत में होने वाले पंचायत चुनाव में भागीदारी करेंगे.
मुस्लिम युवा की बेचैनी

बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद बड़ी हुई मुसलमानों की नई पीढ़ी भाजपा भय से उस तरह त्रस्त नहीं है जैसी उनकी पुरानी पीढ़ी रही. उसमें विकास की रफ़्तार से कदमताल करने की बैचैनी दिखाई देती है.
क्रमश: बढ़ते शिक्षा के प्रतिशत ने भी उनकी आंखें खोली हैं. वे समुदाय के लिए कुछ ठोस हुआ देखना चाहते हैं. मुसलमानों के लिए ओबीसी कोटे की मांग इधर इसीलिए बढ़ी है. उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने भी हाल में अपने भाषण में इस आशय का उल्लेख किया था.
नए हालात में मुस्लिम युवा अगर सपा नेतृत्व से इतर भी देखने लगें तो आश्चर्य नहीं. ओवैसी सिर्फ प्रखर वक्ता ही नहीं, वे संविधान से उद्धरण देते हैं और मुसलमानों के वर्तमान हालात के लिए राजनीतिक दलों को कटघरे में खड़ा करते हैं. युवा वर्ग को इसीलिए वे आकर्षित करते हैं.
आज़ादी के बाद से कांग्रेस ही मुसलमानों की पसंदीदा पार्टी रही. मुस्लिम राजनीतिक संगठन यूपी में जड़ें नहीं जमा सके.
1970 के दशक में अब्दुल फ़रीदी के नेतृत्व में मुस्लिम मजलिस नाम की पार्टी ने ज़रूर कुछ हलचल मचाई थी लेकिन वह लम्बी पारी नहीं खेल सकी.
बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद से मुस्लिम वोटों पर सपा का ही एकाधिकार बना हुआ है.
समाजवादी पार्टी में फिक्र

ऐसा नहीं है कि मुसलमानों में सपा के प्रति नाराज़गी नहीं है. पिछली बार सपा ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में मुसलमानों को नौकरियों में आरक्षण का वादा किया था जिसे पूरा नहीं किए जाने के आरोप लगते रहे हैं.
अक्सर कुछ मुस्लिम नेता और उलेमा वगैरह सपा के ख़िलाफ़ बयान भी देते हैं लेकिन सपा छोटी-मोटी रियायतों, निजी प्रलोभनों से और भाजपा का भय दिखाकर उन्हें अंतत: मना लेती रही है.
दो साल पहले हुए मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों ने भी सपा-मुस्लिम दोस्ती पर आंच डाली.
किसी प्रभावशाली मुस्लिम संगठन या नेता की आमद इस नाज़ुक रिश्ते में दरार पैदा कर सकती है. क्या ओवैसी यूपी में इतना प्रभाव छोड़ पाएंगे?

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एक बात तय है कि ओवैसी की राजनीतिक मौजूदगी हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कर देती है जो अंतत: भाजपा को लाभ पहुंचाता है.
ओवैसी पर सबसे बड़ा आरोप भी यही लगता रहा है कि वे चुनावों में भाजपा के मददगार साबित होते हैं.
ओवैसी इससे सहमत नहीं होते लेकिन तथ्य यही है कि उनके प्रत्याशी भले न जीतें वो भाजपा विरोधी वोटों का बंटवारा करा ही देते हैं.
यही फिक्र बिहार में लालू-नीतीश के सामने है और अब यूपी में मुलायम को सताने लगी है.
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