'दूसरे देश के राजनयिक को हाथ भी नहीं लगा सकते'

नेपाली महिलाएं

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सउदी अरब के एक राजनयिक पर नेपाल की दो महिलाओं को <link type="page"><caption> बंधक बनाकर बलात्कार करने के आरोप</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150909_saudi_diplomat_alleged_rape_sdp.shtml" platform="highweb"/></link> लगे हैं.

दिल्ली से सटे गुड़गांव इलाक़े से पुलिस ने दोनों महिलाओं को छुड़ाया है लेकिन इस मामले में किसी की गिरफ़्तारी नहीं हो पाई है क्योंकि उस फ़्लैट में रहने वाले लोगों को राजनयिक संरक्षण हासिल है.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी का कहना है कि बिना राजनयिक संरक्षण हटे कोई देश, दूसरे देश के राजनयिक को हाथ भी नहीं लगा सकता.

विस्तार से पढ़िए राजनयिकों के लिए क्या हैं नियम

अंतरराष्ट्रीय क़ानून

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1961 में वियना संधि हुई थी. इसके तहत विदेशी राजनयिकों को राजनयिक संरक्षण दिया गया था.

इस संधि के अनुच्छेद संख्या 29 में कहा गया है कि किसी भी राजनयिक को हिरासत में नहीं लिया जा सकता है.

उसे गिरफ़्तार भी नहीं किया जा सकता और ना ही उसके ख़िलाफ़ कोई ऐसी कार्रवाई की जा सकती है जिससे उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचे.

इस संधि के अनुच्छेद संख्या 31 में ये भी कहा गया है कि किसी राजनयिक को आपराधिक मुकदमे से भी छूट हासिल है.

अगर भारत सउदी राजनयिक पर कोई कार्रवाई करना चाहता है तो उसे सबसे पहले सउदी अरब से राजनयिक संरक्षण को हटाने के लिए कहना पड़ेगा.

अगर अंतरराष्ट्रीय क़ानून को नज़रअंदाज़ कर भारत कोई कार्रवाई करता है तो सउदी अरब भी भारत के राजनयिकों के साथ ऐसा ही कर सकता है.

अमरीका और रूस के बीच ऐसा कई बार होता रहा है कि उन्होंने एक राजनयिक को गिरफ़्तार कर लिया तो दूसरे देश ने दो को गिरफ़्तार कर लिया.

पूछताछ भी नहीं कर सकते

गुड़गांव

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हालांकि ऐसा कई बार हो चुका है कि एक देश के कहने पर दूसरे देश ने अपने अधिकारी से राजयनिक संरक्षण हटा ली.

ऐसे वाक़ये अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन में भी हुए हैं.

भारत और पाकिस्तान के बीच इतना तनाव रहता है लेकिन कोई भी किसी दूसरे देश के राजनयिक को हाथ तक नहीं लगा सकता.

सउदी अरब के मामले में भारतीय जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि वो राजनयिक को पूछताछ के लिए भी नहीं बुला सकते.

उनके ख़िलाफ़ तब तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकती जब तक उन्हें राजनयिक संरक्षण हासिल है.

यहां तक कि उन्हें बदनाम भी नहीं किया जा सकता और भारत का फ़र्ज है कि उनकी हिफ़ाजत की जाए.

(वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी से बीबीसी संवाददाता विनीत खरे की बातचीत पर आधारित)

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