रूहानी अहसास कराता है यह वाद्य यंत्र

तांती साज़, सरबजीत

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    • Author, रविंदर सिंह रॉबिन
    • पदनाम, बीबीसी हिंदीडॉटकॉम के लिए

सिखों के सामाजिक-धार्मिक संगठन चीफ़ ख़ालसा दीवान (सीकेडी) के द्वारा चलाए जा रहे खालसा अनाथालय की ओर से परंपरागत वाद्य यंत्र 'तांती साज़' की विरासत को बचाने की क़वायद की जा रही है.

संगठन सिख युवाओं को इस वाद्य यंत्र को बजाने का प्रशिक्षण भी दे रहा है.

पश्चिमी वाद्य यंत्रों की वजह से इस परंपरागत वाद्य यंत्र को चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

'तांती साज़' का उपयोग धार्मिक पदों को उनके मूल राग में गाने के लिए किया जाता है.

ख़ुदा की रहमत

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माना जाता है कि सिखों के पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब के भजनों को उनके मूल स्वरूप में जैसा कि सिख गुरुओं ने गाया है, सिर्फ़ इस 'तांती साज़' की मदद से गाया जा सकता है.

सीकेडी 'तांती साज़' के पुराने वैभव को वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं और अनाथालय में पुराने सिख वाद्य यंत्र की एक संग्रहालय भी तैयार करवाई है.

तांती साज़ सीखने वाले एक छात्र सरबजीत सिंह का कहना है, "सभी के लिए इस वाद्य यंत्र को सीखना आसान नहीं है लेकिन साथ ही इसे समझना बहुत आसान है अगर आपके पास अच्छे गुरु और ऊपर वाले की रहमत हो तो. सुरों की पहचान उसकी कृपा से ही होती है."

उन्होंने बताया कि देवी सरस्वती, नारद मुनि और भाई मरदाना जो कि गुरु नानक देव के सखा थे, इस वाद्य यंत्र को बजाया करते थे.

संगीतशास्त्र में एमफ़िल करने वाले सरबजीत का कहना है, "ये वाद्य यंत्र आपको सीधे ईश्वर के नज़दीक ले जाता है. ये दूसरे वाद्य यंत्रों की तरह नहीं हैं जो केवल शोर पैदा करते हैं."

जागरूकता

सरोध

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एक दूसरे छात्र गुरदीप सिंह ने बताया कि संगठन केवल वाद्य यंत्रों को बजाना नहीं सिखाता बल्कि वे तार और बेतार वाले संगीत वाद्य यंत्रों को संरक्षित करने के लिए भी जागरूकता पैदा करता है.

उन्होंने बताया, "सारंगी, ताउस, सारांदा, दिलरुबा, सरस्वती वीणा, सितार, तानपुरा और सरोद जैसे ढेर सारे वाद्य यंत्रों को यहां संरक्षित किया जा रहा है."

एक और छात्र सिमरजीत सिंह ने बताया कि वे गुरुबानी सुना करते है.

सिमरजीत कहते हैं कि यह बहुत मधुर है और जब वाद्य यंत्र सीखना उन्होंने शुरू किया तो इसने ईश्वर के साथ जुड़ने में उनकी काफ़ी मदद की.

लोक संगीत के वाद्य यंत्र बीगल, काटो, ढाड, घारा, अलगोज़, चिमटा, डफ़ली, तुंबी (एकतारा), नगाड़ा, ढोलकी और ढोल भी यहां मौजूद हैं.

संग्रहालय में गुरु ग्रंथ साहिब में वर्णित 31 रागों को प्रदर्शित करती तस्वीरें भी लगी हुई हैं.

इसके अलावा मशहूत संगीतकारों की तस्वीर भी संग्रहालय की दीवारों पर सजी हुई हैं.

ख़तरा

डॉक्टर आशा सिंह

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इमेज कैप्शन, डॉक्टर आशा सिंह ने बताया कि ये वाद्य यंत्र आध्यात्मिक अनुभवों को हासिल करने में मदद करती है.

खालसा कॉलेज से संगीत शिक्षिका के रूप में सेवानिवृत हुई हेड टीचर डॉक्टर आशा सिंह ने बताया कि ये वाद्य यंत्र आध्यात्मिक अनुभवों को हासिल करने में मदद करती है.

उन्होंने कहा, "ये वाद्य यंत्र भावनाओं का इज़हार करती हैं ना कि आधुनिक वाद्य यंत्रों की तरह ताल और शोर पैदा करती हैं. लेकिन ये परंपरागत यंत्र आज ख़तरे में है. कुछ ही लोग ऐसे हैं जो आज इसकी सुध ले रहे हैं."

उनका कहना है कि ये वाद्य यंत्र गुरु के समय के हैं और इन्हें हर स्कूल और कॉलेज में सिखाना चाहिए.

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