ब्रश करते हुए जब बिना किसी वजह फट गई गले की नस: दुनियाभर में अब तक ऐसे सिर्फ़ 10 मामले

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- Author, विष्णुकांत तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"मैं सुबह ब्रश कर रहा था जब एक हिचकी सी आई. और फिर मुझे लगा जैसे गले के दाहिनी ओर भीतर कोई गुब्बारा तेज़ी से फूल रहा हो. कुछ ही मिनटों में मेरा गला पूरी तरह सूज गया, और मुझे इतना दर्द होने लगा कि आंखों के आगे अंधेरा छा गया."
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के राहुल कुमार जांगड़े को याद है कि एक दिसंबर को अचानक उठे असहनीय दर्द के दौरान उन्होंने अपनी पत्नी को बस इतना ही कहा था, "कुछ ठीक नहीं लग रहा है, अस्पताल चलना चाहिए."
इसके बाद जब उन्हें होश आया, तब वे रायपुर के डॉक्टर भीमराव आंबेडकर अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में थे.
डॉक्टरों ने अनुसार यह किसी चोट या बीमारी के कारण नहीं हुआ था बल्कि एक दुर्लभ घटना थी. इसमें गले में स्थित दिमाग तक रक्त पहुंचाने वाली नस (आर्टरी/ धमनी) अपने आप फट गई थी.
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इसे स्पॉन्टेनियस कैरोटिड आर्टरी रप्चर कहा जाता है और यह छत्तीसगढ़ में हुआ पहला मामला था.
भीमराव आंबेडकर अस्पताल के हार्ट, चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग के डॉक्टर लगभग 6 घंटे की जटिल सर्जरी के बाद राहुल की जान बचा पाए थे.
यह क्या होता है और जानलेवा क्यों है?

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इसी विभाग के एचओडी डॉक्टर कृष्णकांत साहू ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "गर्दन की नस फट जाना एक जानलेवा घटना होती है. अगर इसका इलाज़ न किया जाए तो कुछ ही मिनटों में मौत हो सकती है. लेकिन ऐसा ज़्यादातर गंभीर एक्सीडेंट वाले मामलों या फिर गले के कैंसर जैसी बीमारियों में होता है. यह बहुत रेयर मामला है कि अपने आप ही बिल्कुल साधारण आदमी के गले की नस फट जाए."
उन्होंने आगे बताया, "यह इतना रेयर है कि मेडिकल जर्नल्स के अनुसार दुनिया भर में अब तक इस तरह के केवल 10 केस दर्ज हैं."
40 साल के राहुल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पास भनपुरी इलाके में रहते हैं. वह महिलाओं के श्रृंगार से जुड़े सामान की छोटी सी दुकान चलाते हैं. उनके परिवार में उनकी पत्नी और तीन बच्चों समेत कुल पांच लोग हैं.
राहुल ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि उन्हें पहले कभी ऐसी दिक्कत नहीं हुई थी. लेकिन एक दिसंबर की उस सुबह जो हुआ, वह न सिर्फ राहुल के लिए, बल्कि डॉक्टरों के लिए भी असाधारण था.
मेडिकल जांच में सामने आया कि राहुल की दाहिनी कैरोटिड आर्टरी फट चुकी थी.
दरअसल, गले में मौजूद दाहिनी और बाईं कैरोटिड आर्टरी ही इंसान के दिल से दिमाग तक ऑक्सीजनयुक्त खून पहुंचाती है.
आपको यह भी बताते चलें कि शरीर में दिल से अन्य हिस्सों तक खून पहुंचाने वाली नसों को आर्टरी कहते हैं. इन नसों का जाल इंसानी शरीर में बहुत ही सुरक्षित ढंग से फैला हुआ होता है.
डॉक्टरों के अनुसार, ज़्यादातर मामलों में शरीर में कहीं भी कटना या फटना तभी जानलेवा होता है जब इस दौरान दिल से खून पहुंचा रहीं इन आर्टरीज या धमनियों को चोट पहुंचे और इनसे खून बाहर बहने लगे. क्योंकि दिल से अन्य हिस्सों तक रक्त ले जा रही इन आर्टरीज़ में काफ़ी ज़्यादा दबाव से रक्त बहता है इसलिए बहुत जल्द बहुत ज़्यादा रक्त शरीर से निकल सकता है.
इस सर्जरी का नेतृत्व डॉक्टर कृष्णकांत साहू कर रहे थे.
उन्होंने कहा, " स्पॉन्टेनियस कैरोटिड आर्टरी का बिना किसी चोट, संक्रमण, कैंसर या पहले से मौजूद बीमारी के इस तरह से फटना रेयर मामला है."
राहुल की गर्दन में दाहिनी कैरोटिड आर्टरी के फटने से गर्दन के भीतर तेज़ी से खून भर गया और आर्टरी के इर्द गिर्द खून भरने से एक गुब्बारे जैसी संरचना बन गई, जिसे मेडिकल भाषा में स्यूडोएन्यूरिज़्म कहा जाता है.
डॉक्टर साहू ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "दुनिया भर के मेडिकल साहित्य में ऐसे मामलों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है. अपने पूरे करियर में मैंने ऐसा मामला न तो कभी देखा था, न सुना था."
ऐसी घटना में जान बचा पाना कितना कठिन होता है?

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डॉक्टर साहू बताते हैं, "आम भाषा में समझाया जाए तो कैरोटिड आर्टरी में रुकावट आने से स्ट्रोक हो सकता है. लेकिन राहुल के केस में समस्या इससे भी ज़्यादा खतरनाक थी. आर्टरी खुद फट चुकी थी. अगर वहां बना खून का छोटा सा थक्का भी दिमाग तक पहुंच जाता, तो लकवा मारने की संभावना बहुत ज़्यादा थी."
खून के ज़्यादा बड़े थक्के या ज़्यादा मात्रा में थक्के दिमाग तक पहुंचने पर पूरा दिमाग क्षतिग्रस्त हो सकता था या मरीज़ ब्रेन डेड भी हो सकता था.
उन्होंने यह भी बताया कि सर्जरी से पहले और उसके दौरान दोनों ही समय आर्टरी के दोबारा फटने का खतरा बना हुआ था. ऐसा होने पर अनियंत्रित रक्तस्राव से कुछ ही मिनटों में मरीज़ की मौत हो सकती थी.
डॉक्टरों के अनुसार, राहुल को जब अस्पताल लाया गया, तब उनकी हालत अस्थिर थी. गर्दन के भीतर इतना खून जमा हो चुका था कि सर्जरी के दौरान आर्टरी को पहचानना भी बेहद मुश्किल था.
डॉक्टर साहू बताते हैं, "गर्दन के इस हिस्से में बोलने, हाथ पैर चलाने और दिल की धड़कन नियंत्रित करने वाली कई अहम नसें होती हैं. अगर हमसे ज़रा सी भी चूक होती तो मरीज़ के लिए यह जीवन भर की अपंगता या मौत की वजह भी हो सकती थी."
डॉक्टरों के मुताबिक, उन्हें करीब डेढ़ घंटे सिर्फ आर्टरी को ढूंढने और उस पर नियंत्रण पाने में लग गए.
पूरी सर्जरी पांच से छह घंटे चली. फटी हुई आर्टरी को ठीक करने के लिए गाय के हृदय की झिल्ली यानी कि बोवाइन पेरीकार्डियम पैच का इस्तेमाल किया गया.
डॉक्टरों ने बताया कि सर्जरी के बाद राहुल को 12 घंटे वेंटिलेटर पर रखा गया.
डॉक्टर साहू ने कहा. "राहुल को होश आने के बाद सबसे पहले हमने उनसे बात करके उनकी आवाज जांची. फिर हाथ पैर की हरकत और फिर चेहरे की हरकत जांची ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि खून का कोई थक्का दिमाग तक नहीं पहुंचा है और सर्जरी के दौरान किसी अहम नस को चोट नहीं पहुंची है."
राहुल की पत्नी लक्ष्मी जांगड़े ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से फ़ोन पर बातचीत में कहा कि शुरुआती दिन उनके लिए बेहद डरावने थे. डॉक्टरों ने साफ़ कहा था कि स्थिति बहुत गंभीर है.
वह कहती हैं, "अब जब उन्हें ठीक होते देखती हूं, तो यकीन नहीं होता कि उनकी गर्दन की आर्टरी फट गई थी."
राहुल खुद कहते हैं कि जब डॉक्टरों ने बताया कि यह छत्तीसगढ़ में अपनी तरह का पहला मामला है, तो उन्हें बहुत डर लगा. लेकिन अस्पताल में डॉक्टरों और स्टाफ ने जिस तरह से उन्हें संभाला, उससे उन्हें हिम्मत मिली.
अब वह घर लौटने और अपने बच्चों से मिलने की तैयारी कर रहे हैं. खासकर अपनी बेटी से, जिससे वे पिछले एक महीने से ज़्यादा समय से नहीं मिल पाए हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












