15 महीने में ही ख़त्म हुए बाज़ार के अच्छे दिन?

- Author, दिनेश उप्रेती
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तारीख़ 26 मई 2014: नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री का पद संभाला
सेंसेक्स का स्तर 24717, डॉलर के मुक़ाबले रुपया 58.69
उम्मीदों को पंख
तारीख 4 मार्च 2015: सेंसेक्स की ऊँचाई 30024
मोदी शासन के लगभग 15 महीने बाद
सेंसेक्स का स्तर 24894, डॉलर के मुकाबले रुपया 66.82
यानी मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ‘शेयर बाज़ार के अच्छे दिन’ तो आए, लेकिन 15 महीने में ही ख़त्म होते नज़र आ रहे हैं.
शेयर बाज़ार की खुमारी की उतरने की वजहें?

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वजहें अंतरराष्ट्रीय भी हैं और घरेलू भी.
कमज़ोर मॉनसून, अनुमान से कम आर्थिक विकास और आर्थिक सुधारों में सुस्ती निवेशकों का मन खट्टा होने की प्रमुख घरेलू वजहें हैं.
क्या है अमरीका से डर?
अमरीका का सेंट्रल बैंक फ़ेडरल रिजर्व इसी महीने अपनी समीक्षा बैठक में ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है. अमरीका में बेरोज़गारी दर अप्रैल 2008 के बाद सबसे निचले स्तर पर है.

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फेडरल रिजर्व ने जुलाई 2006 के बाद से ब्याज दरों में बढ़ोतरी नहीं की है. जुलाई 2006 में इसमें एक चौथाई प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई थी और यह 5.25% थी.
सितंबर 2007 से अमरीका में ब्याज दरों में कमी आने का सिलसिला शुरू हुआ और जनवरी 2009 में ये 0.25 प्रतिशत के स्तर पर चली गई और अब भी इसी स्तर पर है.
अमरीका में ब्याज दरें बढ़ने का मतलब है विदेशी संस्थागत निवेशकों का भारत और दूसरे उभरते देशों से पैसा निकालकर अपने देश ले जाना.
रुपये पर डॉलर की मार?

लोकसभा चुनावों के दौरान अपने चुनाव प्रचार में मोदी ने कहा था कि रुपया तो ‘सीनियर सिटीजन’ हो गया है. लेकिन मोदी के अब तक कार्यकाल में डॉलर के मुक़ाबले रुपया लगभग 12 प्रतिशत टूट गया है और सुपर सीनियर सिटीजन बनने की ओर अग्रसर है.
दरअसल, विदेशी संस्थागत निवेशक अपना मुनाफ़ा डॉलर में गिनते हैं और रुपये की कमज़ोरी उनके लिए भी परेशानी का सबब है. पिछले पाँच साल में डॉलर रुपये से 44 प्रतिशत महंगा हुआ है.
पिछले चार में से तीन महीनों में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने बाज़ार में भारी बिकवाली की है.
चीन की मुश्किल से कितना फ़ायदा?

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चीन के शेयर बाज़ारों में गिरावट है और इसका सीधा मतलब है कि निवेशक (कम के कम अस्थाई तौर पर) चीन की आर्थिक शक्ति पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं.
चीन पिछले कुछ समय से लगातार 7 प्रतिशत से अधिक की आर्थिक वृद्धि दर्ज करता आया है. लेकिन अब चीन से एक्सपोर्ट गिर रहा है और मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां धीमी पड़ रही हैं.

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इसीलिए भारत के पास मौका है, निवेशकों को अपने यहाँ आकर्षित करने का. मोदी सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्किल्ड इंडिया’ का नारा भी दिया है, लेकिन इसे ज़मीन पर उतारने के लिए आधारभूत ढाँचे में निवेश बढ़ाना होगा.
मौजूदा स्थितियों में निवेश आकर्षित करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है.
आर्थिक विश्लेषक सुदीप बंद्योपाध्याय ने बीबीसी को बताया, "चीन की सुस्ती का तत्काल तो भारत को कोई फ़ायदा नहीं मिलेगा, लेकिन यदि लंबी अवधि में भारत में आर्थिक सुधार हुए तो फ़ायदा मिल सकता है."
मोदी के सुधारों में अड़ंगा

मोदी सरकार ने जब देश की बागडोर संभाली थी तो उम्मीद जताई जा रही थी कि 30 साल बाद देश में बनी एक दल की स्पष्ट बहुमत की सरकार राजनैतिक बाधाओं को पार कर आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाएगी.
लेकिन ज़मीन अधिग्रहण बिल और गुड्स और सर्विसेज़ टैक्स (जीएसटी) बिल जिस तरह से अधर में लटके हुए हैं, उससे निवेशकों के भरोसे को धक्का लगा है.
विनिवेश को धक्का

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चीन के संकट और भारतीय शेयर बाज़ार पर हुए असर से मोदी सरकार को सबसे बड़ा धक्का विनिवेश के मोर्चे पर लगा है.
मोदी सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत कई सार्वजनिक उपक्रमों में सरकार की हिस्सेदारी बेचकर रकम जुटाई जानी थी.
लेकिन शेयर बाज़ार में मचे हाहाकार के बाद इन उपक्रमों के शेयरों के भाव 20 से 30 प्रतिशत तक टूट गए हैं, मतलब अभी इनमें हिस्सा बेचने का मतलब होगा भारी नुक़सान.
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