1965: जब पाक फ़ौज ने घुसपैठ कर छेड़ी जंग

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- Author, एम इलियास ख़ान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
अगस्त 1965 में अंदरूनी असंतोष दिखने वाली स्थिति भारत और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में जंगल में आग की तरह फैल गई.
एक महीने बाद भारत ने पाकिस्तान पर हमला किया जिसे पाकिस्तानियों ने 'बिना उकसावे वाला' क़दम बताया.
बिना हार जीत के ख़त्म हुई इस लड़ाई के बाद से ही पाकिस्तान हर साल छह सितंबर को जीत का जश्न मनाता है.
उसका कहना है कि वो अपने कहीं ज़्यादा बड़ी सेना को धकेलने में कामयाब रहा.
लेकिन क्या भारत प्रशासित कश्मीर में उपजी बग़ावत वाक़ई अंदरूनी थी?
पढ़िए विस्तार से

71 वर्षीय क़ुरबान अली उन 'चरमपंथियों' में से एक हैं जो अगस्त 1965 में भारतीय सैनिकों से लड़े थे.
लेकिन वो रहने वाले पाकिस्तानी प्रशासित कश्मीर के हैं और वो कोई चरमपंथी नहीं थे. वो पाकिस्तानी सेना की आज़ाद कश्मीर रेजीमेंट के एक सैनिक थे.
वो कहते हैं, "मैं उस वक़्त एक नया रंगरूट था. मुश्किल से मेरी उम्र 20 साल होगी. मैंने रेजीमेंट की ट्रेनिंग पूरी की ही थी कि हम जिब्राल्टर फ़ोर्स में शामिल हो गए."
पाकिस्तान ने अभी तक आधिकारिक तौर पर ये स्वीकार नहीं किया है कि कभी उसने कोई ऐसी फ़ोर्स बनाई थी.
लेकिन पाकिस्तानी सेना के एक पूर्व मेजर, सुरक्षा विशेषज्ञ और लेखक इकराम सहगल ने एक लेख में कहा कि "ये एक मिली-जुली फ़ोर्स थी. इसमें सेना के वॉलेंटियर और नए रंगरूट शामिल थे जिनमें से ज़्यादातर का संबंध पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से था."
"इन नए रंगरूटों को ट्रेनिंग भी बहुत आनन-फ़ानन में दी गई थी और उन्होंने जुलाई के आख़िर और अगस्त की शुरुआत में घाटी (भारत प्रशासित कश्मीर) में भेज दिया गया."
पाकिस्तानी और अन्य सैन्य इतिहासकारों के अनुसार इस योजना को 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' नाम दिया गया और इसका ख़ाका उस क्षेत्र के तत्कालीन कमांड अधिकारी मेजर जनरल अख़्तर हुसैन मलिक ने तैयार किया था.
योजना ये थी कि हथियारबंद गुरिल्ला लड़ाकों के ज़रिए भारत के संचार तंत्र को ध्वस्त किया जाए और भारतीय सेना के अहम ठिकानों पर हमला किया जाए.
मुश्किल और लंबा सफ़र

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क़ुरबान अली और उनके साथियों को भारत प्रशासित कश्मीर में घुसपैठ करने के लिए लंबा और मुश्किल रास्ता तय करना पड़ा.
वो कई दिनों तक चलते रहे, उनकी कमर पर मेवों का राशन, हथियार, गोला बारूद लदे थे.
वो कहते हैं, "कभी पहाड़ों पर चढ़ना पड़ा तो कभी उतरना. और कभी-कभी तो बर्फ़ से ढके पहाड़ों पर फिसल भी जाते थे."
उन्होंने कुपवाड़ा ज़िले में चोकीबल क़स्बे के पास एक जंगल में छिपने का ठिकाना बनाया.
वो कभी अपने दिन और रात पेड़ों के खोखले ठूंठों के अंदर बिताते तो कभी उन्हें चट्टानों के पीछे छिपकर रहना पड़ता था.
लगभग एक महीना उन्होंने वहां बिताया और इस दौरान उन्होंने एक पुल को उड़ाया और भारतीय सेना को सामान की आपूर्ति करने वाले मुख्य बिंदुओं को निशाना बनाया.
क़ुरबान बताते हैं कि उनके समूह में 180 लोग थे और उनमें से ज़्यादातर आम लोग थे.
उनका कहना है, "हमारे समूह में हर 10 लोगों में से छह आम लोग थे." इसी तरह अन्य समूहों ने कश्मीर में दूसरी तरफ़ से घुसपैठ की थी.
'बहुत सारे बच्चे थे'

अनुमान है कि जिब्राल्टर फ़ोर्स में सात हज़ार से लेकर बीस हज़ार तक लोग शामिल थे.
इन्हीं में से एक थे मोहम्मद नज़ीर, जो अब 64 साल के हो गए हैं.
जब उन्हें भर्ती किया गया तो वो स्कूल में पढ़ते थे और उनकी उम्र 14 साल थी.
वो एक ऐसी टीम का हिस्सा थे जिसने पुंछ में भारतीय सेना की एक दर्जन से ज़्यादा चौकियों को निशाना बनाया.
वो बताते हैं, "जब वे हमें ट्रेनिंग कैंप से ले जा रहे थे तो हम नहीं जानते थे कि हम कहां जा रहे हैं. हमने सोचा कि ये भी ट्रेनिंग का हिस्सा है."
वो फ़ॉरवार्ड कहुता की तरफ़ से घुसे और पुंछ ज़िले के आसपास सक्रिय हुए.
वो बताते हैं कि उनके समूह में 'बहुत सारे लोग बच्चे थे, मेरे ही तरह'.
इतनी कम उम्र में उन्होंने बहुत ख़ून-ख़राबा देखा, लेकिन उनका मनोबल ऊंचा था.
वो बताते हैं, "जब भी कोई गोलीबारी या एक्शन होता था, तो हमारा हौसला बढ़ जाता था. लेकिन जब शांति होती थी, तो मन उचटने लगता था. उसके बाद शायद ही हमने कभी मौत और ज़िंदगी के बारे में सोचा हो."
क्यों नहीं भड़की बग़ावत?

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ऑपरेशन जिब्राल्टर इस धारणा पर आधारित था कि गुरिल्ला हमलों के बाद भारतीय प्रशासित कश्मीर में बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी बग़ावत कर देगी क्योंकि जब 1947 में भारत का विभाजन हुआ था तो बहुत से कश्मीरी पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहते थे.
ये दिखाया गया कि कश्मीर के भीतर कहीं पर विद्रोहियों का एक रेडियो स्टेशन क़ायम किया गया है, लेकिन असल में वो पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर से काम कर रहा था.
इस पर बग़ावत को हवा देने वाली रिपोर्टें प्रसारित की जाती थीं.
लेकिन कश्मीर के आम लोग न सिर्फ़ इतने बड़े पैमाने पर बग़ावत करने के लिए तैयार नहीं थे, बल्कि घुसपैठियों ने उनका शोषण भी करना शुरू कर दिया.
सैन्य इतिहासकार कई ऐसे उदाहरण देते हैं जब आम लोगों को मारा गया या उन्हें नुक़सान पहुंचाया गया.
भारत ने भी कश्मीर में अपने सैनिकों की तैनाती बढ़ा दी, घुसपैठ वाली जगहों को रोक दिया और उन पहाड़ियों पर क़ब्ज़ा कर लिया जहां से पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजधानी मुजफ़्फ़राबाद को ख़तरा पैदा होने लगा.
भारत पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तानी सैनिकों ने सितंबर के पहले हफ़्ते में जम्मू की तरफ़ बढ़ना शुरू किया ताकि भारतीय सेना की आपूर्ति की लाइन को काट सकें.
इसे देखते हुए भारत ने लाहौर और सियालकोट पर हमला किया.
'हम ख़तरे में थे'

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अगस्त के अंत तक, ज़्यादातर घुसपैठिए या तो पकड़े गए या फिर मार दिए गए. जो बच रहे, उनसे लाहौर पर भारत के हमले के बाद लौट आने को कहा गया.
क़ुरबान अली कहते हैं, "हमें बताया गया कि वो हमें ज़रूरी चीज़ें नहीं भेज सकते हैं, और अब हमें ही अपना इंतज़ाम करना है."
वो याद करते हैं, "ये हमारे मिशन का सबसे मुश्किल समय था. हमारे पीछे जो पहाड़ियां थीं उन पर भारत का क़ब्ज़ा हो चुका था. हम ख़तरे में थे."
मोहम्मद नज़ीर वापस पाकिस्तानी पोस्ट की तरफ़ चले गए और अपने एक साथी मोहम्मद यूसुफ की लाश को भी घसीटते हुए ले गए जो उनके गांव का ही रहने वाले थे.
वो बताते हैं, "पोस्ट पर तैनात संतरी ने कहा कि इस शव को वापस गांव में भेजने के लिए कोई वाहन नहीं है. फिर कुछ ठेकेदार आए और उन्होंने यूसुफ के शव को उनके परिवार तक पहुंचाने में मेरी मदद की."
यूसुफ़ लंबे क़द के थे और उस वक़्त उनकी उम्र 23 साल थी. उनकी शादी को एक ही साल हुआ था कि उन्हें जिब्राल्टर फ़ोर्स में शामिल किया गया.

उनकी पत्नी निशा बेगम उस समय सात महीने की गर्भवती थी जब उनके पति की लाश उनके सामने थी.
वो बताती हैं, "जब वो दूर थे, तो मैं उनकी हिफ़ाज़त के साथ वापसी की दुआ मांगती थी. लेकिन फिर एक दिन वो उनके शव को लेकर आए तो..."
यह कहते हुए वो एक दम भावशून्य हो जाती हैं.
लेकिन वो कहती है कि भगवान ने इसकी भरपाई कर दी.
"उन्होंने मुझे एक बेटा दिया, और उसे शिक्षित करने की ताक़त दी और मौक़ा दिया कि मैं उसकी शादी और उसके बच्चों को देख सकूं."
'एक झूठ'

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लगता है कि ये लड़ाई निशा बेग़म को तोड़ पाने में नाकाम रही, लेकिन बहुत से लोग कहते हैं इस लड़ाई ने पाकिस्तान के पहले सैन्य शासक अयूब ख़ान को ज़रूर तोड़ दिया, जिन्होंने ऑपरेशन जिब्राल्टर का आदेश दिया था.
लड़ाई के बाद जल्द ही सत्ता उनके हाथ से चली गई. तीन साल बाद भारी असंतोष के बाद उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी. उनका 1974 में निधन हुआ.
एयर मार्शल (रिटायर्ड) नूर ख़ान 1965 में पाकिस्तानी वायु सेना के प्रमुख थे.
उन्होंने पाकिस्तानी अख़बार डॉन को दिए इंटरव्यू में कहा, "सेना ने एक बड़े झूठ के ज़रिए राष्ट्र को गुमराह किया."
और वो झूठ ये था कि लड़ाई पाकिस्तान ने नहीं, बल्कि भारत ने शुरू की थी और इस लड़ाई में पाकिस्तान को 'शानदार जीत' मिली.
वो कहते हैं कि तब से अब तक इस झूठ को ठीक नहीं किया गया है. एयर मार्शल नूर ख़ान के अनुसार, ''इसका नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान की सेना अपनी ही बनाई काल्पनिक कहानी में यक़ीन करने लगी और तब से उसका अवांछित लड़ाइयां लड़ना जारी है.''
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