महिला ब्रह्मचारी: कैसा जीवन, कैसे आदर्श

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- Author, संजीव चंदन
- पदनाम, नागपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
सत्तर साल से भी ऊपर की, लेकिन अब भी दुबली-पतली, लंबे क़द वाली गंगा बहन से जब मैंने पूछा, "आप तो बहुत खूबसूरत हैं, कभी किसी को प्यार किया!"
उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया, "सारे संसार से."
नागपुर से 70 किलोमीटर दूर विनोबा के पवनार आश्रम में रह रहीं इन औरतों के लिए आश्रम में रहने का मतलब है ऐसी ज़िंदगी जहां आप ब्रह्मचारी हैं, मिलजुल कर काम करते हैं और मिलजुल कर फैसले लेते हैं. पर कितना मुश्किल रहा होगा इनके लिए ताउम्र ब्रह्मचर्य जीवन तय कर पाना!"
कैसा होता है ये जीवन?
सुबह 4 बजे से ही दिनचर्या शुरू जाती है. उपनिषद, विष्णुसहस्रनाम और शाम में गीता पाठ के साथ सामूहिक रसोई, फिर खेती और जानवरों को पालने-पोसने का काम.
गंगा बहन के पास एक और ज़िम्मेदारी है- मासिक पत्रिका 'मैत्री' का संपादन करना.
आज़ादी की लड़ाई

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यहाँ रहने वाली 30 औरतें जब आश्रम में आई थीं तब जवान थीं, शायद सपनों से भरी हुई.
सभी किसी न किसी गांधीवादी परिवार या आजादी की लड़ाई से जुड़े परिवार की बेटियाँ थीं, जिन्होंने विनोबा भावे के आंदोलन भूदान से जुड़ने और ब्रह्मचर्य जीवन जीने का संकल्प लिया और पवनार आश्रम को अपना ठिकाना बना लिया. विनायक नरहरि विनोबा ने तब ही ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया था जब वे किशोर उम्र के थे.
विनोबा ‘पुरुष और स्त्री होने के भाव से मुक्त होने को ब्रह्मचर्य’ की कसौटी मानते थे, जिसे वे ‘नपुंसक’ होना कहते थे.
कटती गईं समाज से

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साल 1959 में जब विनोबा ने यह आश्रम बनाया था, तो उनके साथ काम करने के लिए लड़कियाँ देश के अलग-अलग राज्यों से आई थीं.
इस आश्रम में रह रही 30 में से लगभग 20 औरतें 70-75 की उम्र के पार हैं. ये औरतें एक निश्चित रूटीन वाला जीवन जी रही हैं.
आश्रम से बाहर सामाजिक जीवन से जुड़ना इनके लिए मना है. हालांकि वो कहती हैं कि इन्होंने स्वयं तय कर रखा है. हालांकि वो अपने परिवार वालों से कभी–कभी मिलने जाती हैं.
आंदोलनों में भागीदारी

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विनोबा के जीवन काल में उन्होंने आश्रम के बाहर आंदोलनों में कई बार शिरकत की है. भूदान आंदोलन (1951) में भागीदारी के अलावा आश्रम की शुरुआत (1959) के तुरंत बाद 1961 में बिहार के सहरसा जिले में बीघा–कट्ठा आंदोलन में आश्रम की महिलाओं ने भाग लिया.
1978-79 में गोहत्या-बंदी आंदोलन में आश्रम की औरतें शामिल हुई थी और 1973 में गीता के प्रचार के लिए विनोबा ने उन्हें मुंबई भेजा.
1982 में विनोबा की मृत्यु के बाद महिलाएं आश्रम की रूटीन जीवन (जिसे वे आध्यात्मिक उन्नति के लिए जरूरी बताती हैं) में सीमित हो गईं.
नहीं आ रही नई लड़कियाँ

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15 साल की उम्र से ही यहां रह रहीं शांति कृपलानी कहती हैं, "ब्रह्मचर्य जीवन कठिन नहीं है, लेकिन हमारी चिंता का विषय है कि नई लड़कियाँ यहाँ नहीं आ रही हैं, हममें से कई 80 की उम्र पार कर चुकी हैं, हमारे बाद आश्रम का क्या होगा!"
प्रवीना देसाई इसके लिए आश्रम जीवन की नीरसता और समाज से अलगाव को कारण बताती हैं. हाल के दिनों में ओडिशा की 50 साल की नलिनी आश्रम में दाखिल हुई हैं.
प्रवीना कहती हैं , "हमारा नियम रहा है 25 से 30 के बीच की लड़कियों को सदस्य बनाने का, ब्रह्मचर्य एक कठोर व्रत है, जो 50 साल तक गृहस्थ जीवन में रहते हुए कठिन है."
गाय, गीता और हिन्दू जीवन

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'कामहा, कामकृत कान्त, काम–कामप्रद प्रभु’ - विष्णु सहस्रनाम की इस पंक्ति यहाँ हर रोज पाठ किया जाता है. यह पंक्ति विष्णु के हजार नामों में उनके ‘काम-देवता’ नाम के जाप के लिए है.
यहाँ रहने वाली ब्रह्मकुमारियों का समय इनके कमरे में ही बीतता है. एक छोटा बिस्तर, एक या दो कुर्सियां और कुछ धार्मिक किताबें- इनके कमरों का कुल दृश्य यही है. ज्यादातर औरतें एक कमरे में अकेले रहती हैं, लेकिन कुछ कमरों में दो–दो औरतें भी साथ रहती हैं.
खबरों के लिए आश्रम में आने वाले हिन्दी और मराठी के अख़बार हैं. कई के पास रेडियो है और कइयों ने मोबाइल भी रखा है लेकिन उसका इस्तेमाल मुख्यत: घर से सम्पर्क तक सीमित है.

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देश में कई दूसरे हिस्सों में भी ब्रह्मकुमारी आश्रम हैं.
इस धार्मिक आंदोलन का मानना है कि एक ऐसा समय होगा, जब बच्चे भी मानसिक शक्ति से पैदा किए जा सकेंगे.
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