दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी के हत्यारे कौन?

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कौन हैं प्रमुख भारतीय विद्वान और जाने-माने तर्कवादी विचारक डॉक्टर एमएम कलबुर्गी के हत्यारे?
रविवार सुबह उनकी हत्या हुई थी. हत्यारों के बारे में अब तक कोई सुराग़ नहीं मिला है. हत्या की जाँच सीबीआई को सौंप दी गई है.
कर्नाटक के धारवाड़ में स्थित कलबुर्गी के घर पर दो नौजवान मोटरसाइकिल से आए.
एक ने उनके घर का दरवाज़ा खटखटाया. उसने ख़ुद को कलबुर्गी का छात्र बताया.
दोनों के बीच थोड़ी देर तक बात हुई. उसके बाद कलबुर्गी को गोली मार दी गई. और फिर हत्यारा मोटरसाइकिल पर इंतज़ार कर रहे अपने दोस्त के साथ वहाँ से निकल भागा.
कलबुर्गी की मृत्यु से पूरा देश स्तब्ध हो गया. एक कन्नड़ अख़बार ने उन्हें प्राचीन कन्नड़ साहित्य का स्पष्टवादी विद्वान बताया.
मौत का कारण

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पुलिस इस बात की जाँच कर रही है कि क्या उनकी मृत्यु का संबंध पिछले साल मूर्तिपूजा के विरोध में दिए गए बयान से है जिससे दक्षिणपंथी हिन्दू संगठनों में ग़ुस्सा था.
उनके बयान के बाद कुछ दक्षिणपंथी संगठनों ने उनके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किए थे. उसके बाद से हम्पी कन्नड़ विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस-चांसलर को पुलिस सुरक्षा मिली हुई थी.
इनमें से कुछ समूहों से जुड़े लोगों ने सोशल मीडिया पर उनकी हत्या के बाद ख़ुशी ज़ाहिर की.
बहुत से लोगों का मानना है कि डॉक्टर कलबुर्गी ने अपने लिंगायत समुदाय में ही कई दुश्मन बना लिए थे.
उन्होंने इस समुदाय की परंपराओं और विश्वासों की कई बार खुली आलोचना की थी.
कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत एक प्रभावशाली हिन्दू समुदाय है. कर्नाटक की कुल जनसंख्या में 12 से 14 प्रतिशत लिंगायत हैं.
राज्य के ज़्यादातर मुख्यमंत्री इसी समुदाय के रहे हैं. माना जाता है कि ये समुदाय अब राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) का मुख्य जनाधार है.
अंदरूनी कलह और राजनीति

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राज्य में लिंगायत समुदाय से जुड़े हुए क़रीब दो हज़ार मठ या संस्थान हैं जो कई प्रोफ़ेशनल कॉलेज चलाते हैं.
न्यूज़ वेबसाइट 'द वायर' पर <link type="page"><caption> रघु कर्नाड</caption><url href="http://thewire.in/2015/08/30/yesterday-basavanna-today-kalburgi-9597/" platform="highweb"/></link> ने लिखा है कि हो सकता है कि कलबुर्गी की हत्या का संबंध लिंगायत समुदाय की अंदरूनी जातीय कलह और राजनीतिक प्रभुत्व के संघर्ष का नतीजा हो.
कलबुर्गी वचन काव्य के विद्वान थे. ये काव्य लिंगायत समुदाय का आधार साहित्य माना जाता है. वचन दैनिक पूजा की तरह होते हैं जिनका प्रयोग आम लोग अपने रोज़ के जीवन में करते हैं.
वचनों की उनकी व्याख्या से "रूढ़िवादी लिंगायत अक्सर चिढ़ जाते थे." समुदाय के कट्टरपंथी सदस्यों ने कई बार उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी.
कन्नड़ साहित्य के एक विशेषज्ञ के अनुसार कलबुर्गी वचन काव्यों की ज़्यादा उदार व्याख्या करते थे जो आज के समावेशी और आधुनिक समाज के ज़्यादा अनुरूप था.
कर्नाड लिखते हैं, "उनकी व्याख्याओं का न केवल लिंगायतों की धार्मिक मान्यताओं बल्कि राजनीति और अर्थशास्त्र के लिए भी गहरे मायने रखता था."
नाराज़गी

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एक <link type="page"><caption> मानवाधिकार संगठन</caption><url href="http://www.pucl.org/from-archives/Media/freedom.htm" platform="highweb"/></link> के अनुसार 1989 में 12वीं सदी के संत पर लिखी उनकी किताब से कट्टरपंथी लिंगायत काफ़ी नाराज़ हुए थे. उन्होंने उनकी किताब को 'धर्मद्रोह' बताया था.
तब उन्हें पुलिस सुरक्षा दी गई थी. 43 स्थानीय लेखकों और विद्वानों ने एक समिति बनाकर उनका समर्थन किया था.
हाल ही में उन्होंने कट्टरपंथी लिंगायतों को ये कहकर नाराज़ कर दिया था कि लिंगायतों को हिन्दू नहीं कहा जा सकता.
कर्नाड के अनुसार उनकी मृत्यु के बाद रविवार को हुई एक शोक सभा में इस बात को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की गई कि "लिंगायत समुदाय में विचार-विमर्श और आलोचना की संस्कृति की जगह जानलेवा हिंसा की संस्कृति हावी हो सकती है."
कलबुर्गी की हत्या से क़रीब दो साल पहले पुणे में एक और तर्कवादी डॉक्टर <link type="page"><caption> नरेंद्र दाभोलकर की हत्या</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/news/world-asia-india-23776406" platform="highweb"/></link> हुई थी. उनके हत्यारों का आज तक पता नहीं चला है.
इस साल फ़रवरी में मराठी के प्रसिद्ध लेखक गोविंद पंसारे की भी सुबह-सबेरे गोली मारकर हत्या कर दी गई. हत्यारों का आज तक पता नहीं चला.
हत्या

कलबुर्गी की जिस तरह हत्या हुई उससे मुझे तमिल लेखक <link type="page"><caption> पेरुमल मुरुगन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/news/world-asia-india-30808747" platform="highweb"/></link> की याद आ रही है.
इस प्रसिद्ध तमिल लेखक और प्रोफ़ेसर ने इस साल की शुरुआत में हमेशा के लिए लिखना छोड़ देने की घोषणा की थी क्योंकि स्थानीय हिन्दू संगठनों और जातीय समूहों ने उनके एक उपन्यास मधोरुभगन के ख़िलाफ़ उग्र प्रदर्शन किए थे.
मुरुगन ने अपने फ़ेसबुक पेज पर लिखा था, "लेखक पेरुमल मुरुगन मर चुका है."
इस बार सचमुच एक विचारक की हत्या कर दी गई.
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